उसने मेरी रूह में उतरकर मुझे बदल दिया।

कभी-कभी डर सिर्फ़ हमारे सामने नहीं होता।
वो हमारी आंखों में, हमारे दिल में, हमारे दिमाग में, हमारे कमरे में, हमारे अंदर ही अंदर छुपा होता है और सामने आने से कतराता है।

मुझे नहीं पता था कि उस काली रात होने वाली घटना मेरी ज़िंदगी को इस तरह बदल देगी।
और एक आईना — सिर्फ़ एक आईना — मेरे लिए सबकुछ सच्चा कर देगा।

आज मेरे नए घर में मेरा पहला दिन था, शयाम हो चुकी थी। बारिश की बूंदें खिड़की पर धीरे-धीरे टपक रही थीं।
मैं — 27 साल की नीलम शर्मा,  — हाल ही में, मैने शहर के पुराने कॉलोनी में एक नया अपार्टमेंट लिया था।

घर पुराना था, लेकिन बहुत आकर्षक था जब मैने उस घर को पहली बार देखा तो लगा उस घर की चीज़ो ने मुझपर कोई जादू चलाया हो।
दीवारों पर हल्की दरारें, पुराने लकड़ी के दरवाजे, और खिड़कियों की लोहे की रेलिंग। सब कुछ इतना पुराना सा था फिर भी मुझे बहुत आकर्षक कर रहा था।

जब मैंने अपनी बिल्डिंग के कॉरिडोर में कदम रखा, लगा कि हर दीवार की एक अपनी कहानी है।

लेकिन सबसे डरावना था पहला कमरा — जो मैंने अपने बेडरूम के लिए चुना था।
कोई खास कारण नहीं था, बस एक अजीब-सी ठंडक और खामोशी जो कमरे में हमेशा रहती थी वो मुझे ड़राते थी लेकिन फिर भी मुझे अच्छी लगती थी और मुझे उस कमरे में ही रहना था। जैसे कोई मुझे वहां रोक रहा हो।

मेरे कमरे में एक पुराना स्टैंड वाला आईना पड़ा हुआ था।
वो मेरे से बड़ा था, लकड़ी का बना हुआ था, और किनारे पर हल्की बारीकी की नक़्क़ाशी हुई थी। जो पुराना होने के बावजूद भी अच्छा लग रहा था।

आज नए घर में मेरी पहली रात थी, मैं बहुत थक चुकी थी तो समय पर सो गई। लेकिन आधी रात को अचानक से मेरी नींद खुली। मै उठकर बैठ गई।

मेरे सामने ही आईना था और आईने से —
अजीब सा प्रतिबिंब आया।
मैंने खुद को देखा — लेकिन कुछ अलग सा था।

मेरे पीछे की दीवार पर — मुझे दिखा की कोई सफ़ेद साया था।
एक औरत का।
धीरे-धीरे चलती हुई, बिना पैर की आवाज़, आखो में शांती जिसने बहुत कुछ देखा हो।

मैंने सोचा, शायद नींद का भ्रम है। लेकिन अगले पल कुछ एसा हुआ जिसपर यकीन कर पाना मेरे लिए बहुत मुशकिल था, अचानक उसने मेरी तरफ देखा —
और आईने में मेरी आंखों के अंदर घुसती उसकी नजरें थीं। मैने खुदको ज़ोर से झिंझोड़ा और सब गायब हो गया जिसके बाद दिल में एक अलग सा ड़र लेकर मै चुपचाप सो गई।

अगली रात मैं अपने कमरे में अकेली थी।
बाहर बहुत तेज़ तूफ़ान और बारिश की आवाज़ आ रही थी।
लेकिन मेरे कमरे में, मेरे कानो में — कोई और ही आवाज़ आ रही थी।

नीलम…

धीमी, कड़क आवाज़, जैसे बिलकुल मेरे कान के पास आकर कोई बुला रहा हो।
मैं डर के मारे पानी पानी हो गई, इतने ठंड़े मौसम में मेरे पसीने छूट रहे थे जब वो आवाज़ बंद ही नहीं हुई तो मै पलंग से कूद पड़ी, नीचे गिरते ही मैने ड़र डरकर चारो तरफ देखा, लेकिन कमरे में कोई नहीं था।

उसके बाद धीरे धीरे बहुत हिम्मत जुटाकर मैने आईने की तरफ देखा —
वो औरत, जो पहली रात दिखी थी वो आज भी आईने में खड़ी थी, ठीक मेरे पीछे। मै भाग कर बिस्तर पर गई और कंबल के अंदर घुस गई।

लेकिन कमरे में — वास्तव में कोई नहीं था। लेटे लेटे मैने सोचा की कल सुबह इस आईने को फेक दूंगी।

सुबह हो गई और पड़ोस की एक बुज़ुर्ग महिला, शांति देवी से मेरी पहली मुलाकात हुई।
मैंने उससे अपार्टमेंट और आईने के बारे में पूछा।

उसकी आँखों में डर झलक उठा।
वो आईना… इसे मत देखो।
उसने कहा, जो लोग इसमें घंटों देखते हैं, वो खुदको ही खो बैठते हैं।

मैंने सोचा, ये बुज़ुर्ग महिला का डरावना विश्वास है।
लेकिन रात को आईना मुझे भी बार-बार अपनी तरफ खींच रहा था।

उस औरत की ये बात सुनकर मैने उस आईने को फेकने का प्लान बदल दिया जो मुझे खुद समझ नहीं आया क्योकि उस औरत की बात सुनकर तो मुझे ड़र लगना चाहिए था लेकिन एसा कुछ नहीं हुआ।

कुछ दिनों में मैंने ध्यान दिया —
जब भी मैं आईने में देखती, मेरे अंदर की खामोशी और डर वहां साफ साफ झलकता।
लेकिन धीरे-धीरे — आईना मुझे बदलने लगा।

यानी उस बुढिया की बातें सच होने लगी-

मैं अकेली घंटो बैठकर अपने अतीत की यादें देखती
वो छोटे डर जो मैंने कही दबाए थे, अब सामने आने लगे
और हर रात को आईने की औरत मुझे बुलाने लगी…

एक रात — 11:11 बजे — मैं आईने के सामने बैठी थी।
औरत धीरे-धीरे निकली।

उसने कहा, तुमने मुझे बुलाया है, नीलम…

मैं चौंकी।
मैंने… नहीं…
लेकिन आईना झूठ नहीं बोलता।

वो औरत मेरा अतीत, मेरा डर, मेरी खामोशी थी।
और अब वह मेरी जगह लेने आई थी।
हर रात — अब मुझे भी उसका इंतजार रहता था और सच तो ये था की मै उसे बिना बोले बुलाने भी लगी थी,

आईने के प्रतिबिंब में मैं अलग नजर आने लगी
मेरे हाथ — कभी मेरे नहीं लगते
मेरी आवाज़ — आईने से अलग गूंजती

और वो औरत— हर बार करीब आती,
धीरे-धीरे मेरे शरीर का हिस्सा बनने लगी।
अब तो मै उस शीशे से और उस औरत की आवाज़ से भी नहीं ड़रती बल्कि मुझे वो अपने लगने लगे।

अंतिम रात, तूफ़ान सबसे ज़्यादा था।
और क्योकि अब मुझे ड़र नहीं लगता था तो मुझे रात का इंतज़ार रहता था।
मैंने आईने को कमरे के बीच में रखा, और खुद को आईने में देखा।

वो औरत सामने खड़ी थी।
लेकिन इस बार —
उसका चेहरा मेरा ही चेहरा था, मेरी ही मुस्कान, लेकिन निगाहें मृत। जैसे उसने मुझे मुझसे छीन लिया हो।

वो धीरे-धीरे बोली:
तुमने जितनी रातें मुझे बुलाया… मैं आ गई।
अब तुम्हारे भीतर रहती हूँ।
तुम जो सोचती हो, जो डरती हो… वो सब अब मेरी हक़ीकत बन गई है।

मैं चिल्लाई,
लेकिन आवाज़ मेरे ही मुंह से नहीं निकली।
आईने में मेरी जगह अब वो औरत खड़ी थी।
और मैं — आईने के अंदर घुस गई,
वो औरत — मेरा शरीर पहन चुकी थी।
एसा लग रहा था बस शरीर मेरा है पर काबू उसने कर लिया है।

सुबह पड़ोसियों ने देखा —

नीलम का शरीर बेहोश, आईने के सामने पड़ा है
आईने में — वह औरत मुस्कुरा रही थी,
लेकिन अब उसके चेहरे पर नीलम की जान नहीं थी।

हर रात, तूफ़ान, बारिश, और आईना —
सिर्फ़ वही औरत अब सत्य और डर का मालिक थी।

और मेरी आवाज़ —
कहीं खो चुकी थी।

कभी-कभी डर सिर्फ़ बाहर नहीं होता।
वो अंदर आता है।
और जब अंदर आता है —
तुम खुद को ही नहीं पहचान पाते।

 

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