उस अजनबी की ख़ुशबू

सुबह की बस में कुछ लोग रोज़ चढ़ते हैं, कुछ रोज़ उतरते हैं —
और इसी उतार चडाव में कुछ चेहरे हमें ऐसे दिख जाते हैं जो उतरते ही नहीं…
दिमाग में बैठ जाते हैं।

राहुल को नहीं पता था कि उसकी ज़िंदगी की सबसे अहम कहानी,जिसे वो ना भुला पाएगा और ना कभी उसपर विशवास कर पाएगा
एक सरकारी बस की, खिड़की वाली सीट से शुरू होगी।

वो लड़की हर रोज़ वहीं बैठती थी।
हल्के रंग का दुपट्टा, खुले लेकिन सधे हुए बाल,
और आँखें…
ऑखे जैसे किसी ने चुप्पी को देखना सिखा दिया हो।

ना वो मुस्कुराती थी,
ना किसी से बात करती थी,
लेकिन उसकी मौजूदगी बस को अलग ही बना देती थी।

राहुल उसे रोज़ देखता था।
देखना कहना आसान है —
असल में वो उसकी मौजूदगी को महसूस करता था।

पहले हफ्ता बस यूँ ही बीत गया।
दूसरे हफ्ते उसकी नज़रें खिड़की से हटकर
एक पल के लिए राहुल पर ठहरने लगीं।

तीसरे हफ्ते…
वो नज़रें रुकने लगीं।

बिना शब्दों के,
बिना इज़हार के,
कुछ ऐसा बनने लगा था जो
नाम माँगता था।

राहुल के दिल में अजीब सी बेचैनी रहने लगी।
ना भूख, ना नींद —
बस वो बस, वो सीट, और वो लड़की… इन्ही चीज़ो का इंतज़ार उसे हर सुबह बस में चढने से पहले रहता था।

उसे डर था —
अगर वो एक दिन नहीं आई तो?

यही सोचकर, एक रात राहुल ने काग़ज़ उठाया।
और लिखा नहीं…
उतार दिया।

मैं नहीं जानता तुम्हारा नाम।
लेकिन जब तुम बस में नहीं होती,
तो रास्ता छोटा नहीं लगता।
अगर ये ख़त तुम्हें अजीब लगे —
तो मुझे माफ़ कर देना।
पर अगर ये तुम्हें छू जाए…
तो समझ लेना, कोई रोज़ तुम्हें
बिना जाने चाहने लगा है।

अगली सुबह वो खत देने के लिए बहुत चेहक रहा था लेकिन जब देने का समय आया तो उसके हाथ काँप रहे थे।
बस में चढ़ा तो दिल की धड़कन बहुत तेज़ होने लगी, उसने सीट पर रखा ख़त, और चुपचाप बस से उतर गया।

अगले दिन जब वो सीट पर चड़ रही थी तो वो बहुत धबरा रहा था और ड़रा हुआ था, कई सवाल उसके मन में चल रहे थे। लेकिन कुछ एसा हुआ जिसके बारे में वो बिलकुल अंजान था।

वो पहली बार…
मुस्कुराते हुए चड़ी आज से पहले राहुल ने उसे कभी मुस्कुराते हुए देखा ही नहीं था।

राहुल का दिल जैसे किसी ने कसकर पकड़ लिया हो, उसका सीना खुशी से चौड़ा हो गया।

वो लड़की बस में चड़ते ही बैठी नहीं बल्कि उसके पास आई,
और धीरे से बोली —

मैं जानती थी तुम लिखोगे।

राहुल चौंक गया।

वो बोली,
तीन साल पहले, मैंने भी एक ख़त रखा था। तुम्हारी ही सीट पर। पर तुम उस दिन नहीं आए।

उसकी आवाज़ काँप रही थी,
लेकिन आँखें स्थिर थीं।

मैं रोज़ इंतज़ार करती रही।
तुम्हें देखने लगी।
और फिर…
आज तुमने लिखा।

राहुल को उसकी बाते सुनकर एसा लगा जैसे वो कोई खूबसुरत सपना देख रहा हो, इतने में बस चल पड़ी बहुत लोग थे, बस में शोर बड़ने लगा।

लेकिन उनके बीच तो प्यार की –
एक अलग ही दुनिया बन चुकी थी।

उसकी उँगलियाँ काँपते हुए
राहुल की हथेली से टकराईं।

एक सेकंड का स्पर्श —
पर ऐसा लगा
जैसे किसी ने नसों में आग भर दी हो।

वो पीछे नहीं हटी। ऐसा लग रहा था जैसे राहुल से ज्यादा उसे इन पलो का इंतज़ार था लेकिन राहुल भी पीछे नहीं हट रहा था क्योकि वो भी यही चाहता था।

उस पल में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी,
बस तीन साल की अधूरी धड़कनें थीं, जो एक दूसरे को करीबी से सुन रही थी।

ये सब चल ही रहा था की तभी वो मिठी अवाज़ में बोली मेरा नाम अनाया है, और राहुल एसे चेहका जैसे उसने नाम नहीं, कोई दुआ सुन ली हो।

अनाया बोली, और तुम्हारा?

राहुल।

अनाया मुस्कुराई —
नाम अच्छा है।
इंतज़ार जैसा।

उस दिन दोनों आख़िरी स्टॉप पर उतरे।

ना प्लान था, ना सवाल, बस दोनों को एक दूसरे के साथ चलना था बहुत दूर तक। 3 साल का इंतज़ार एक ही दिन खत्म कर देना चाहते थे।

चाय की दुकान,
बारिश की हल्की बूँदें,
और दो लोग
जो एक-दूसरे से देर से मिले
पर सही वक़्त पर।

अनाया ने कहा —
कुछ रिश्ते छूने से नहीं,
रुकने से गहरे होते हैं।

राहुल ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में वो डर था
जो किसी को खोने से पहले आता है।

वो पास बैठे थे।
बहुत पास।

इतना कि
साँसें सुनाई दे रही थीं।

लेकिन कोई सीमा टूटी नहीं।
क्योंकि कुछ चाहतें
रोकने में और भी
तेज़ हो जाती हैं।

राहुल ने सिर्फ़ इतना कहा —
मैं भागना नहीं चाहता।

अनाया ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।

तो रुको,
उसने कहा।

दोनों ने रोज़ मिलने का वादा किया और अगले कई हफ्तों तक
वो मिलते भी रहे और कई सारी बाते भी करते रहे।

धीरे-धीरे। हाथ थामना भी
एक वादा बन गया।

उनके बीच कोई जल्दबाज़ी नहीं थी,
क्योंकि जो रिश्ता
तीन साल रुका हो,
उसे टूटने की जल्दी नहीं होती।

एक रात अनाया ने कहा —
अगर तुम उस दिन बस में होते…
तो शायद हम आज यहाँ न होते।

राहुल मुस्कुराया।

और बहुत प्यार से बोला शायद कुछ कहानियाँ देर से शुरू होती हैं
ताकि गहरी बन सकें।

पहली नज़र में नहीं होते।
कुछ ख़त
पहली बार में नहीं पढ़े जाते।

लेकिन जब वक़्त आता है —
तो अजनबी भी
अपनी ही ख़ुशबू लगने लगते हैं।

…और यही सोचते हुए राहुल ने बस की खिड़की से बाहर देखा।

उस रात बस कुछ ज़्यादा ही ख़ामोश थी, हम दोनों अपने रास्ते चल दिए

अगली सुबह राहुल तय समय से पहले बस स्टॉप पहुँच गया।
आदत जो बन चुकी थी—
अनाया से मिलने की।

लेकिन उस दिन
वो बस में नहीं थी।

खिड़की वाली सीट
खाली थी।

राहुल ने सोचा—
शायद देर हो गई होगी।

दूसरे दिन भी
वही सीट
खाली।

तीसरे दिन भी।

राहुल को ड़र लगने लगा उसे खोने का, उसने उसे कॉल किया।
फ़ोन स्विच ऑफ़।

मैसेज किए।
सीन नहीं हुआ।

एक अजीब-सी बेचैनी
उसके सीने में घर करने लगी।

चौथे दिन, वो समय से पहले अनाया के स्टेशन पर ही जा पहुचॉ ये सोचकर ना जाने वो किस समय पर बस में चड़े। सुबह से शयाम हो गई पर वो नहीं आई।

पॉचवे दिन,

जब थक हार के निराश होकर वो बस स्टॉप पर खड़ा था,
उसकी नज़र
एक पुराने पोस्टर पर पड़ी।

पीला पड़ा हुआ,
आधा फटा हुआ।

उस पर एक तस्वीर थी।

एक लड़की की।

हल्के रंग का दुपट्टा,
खुले लेकिन सधे हुए बाल…

राहुल की साँस अटक गई।

नीचे लिखा था—

मीरा वर्मा (उम्र 24)
तीन साल पहले लापता
अंतिम बार इसी बस रूट पर देखी गई।

राहुल को लगा,
ज़मीन खिसक गई… वो बहुत खबराया… उसके पसीने छूटने लगे।

उसने तस्वीर को गौर से देखा।
वही आँखें।
वही चुप्पी।

बस नाम अलग था।

अनाया…
नहीं, मीरा?

उस रात राहुल सो नहीं पाया।

सुबह होते ही
वो उसी गली में गया
जहाँ अनाया रहती थी। जब वो मिलते थे तो राहुल उसे घर तक छोड़कर आता था।

तीसरी मंज़िल।
वही दरवाज़ा।

उसने बेल बजाई।

कोई जवाब नहीं।

पड़ोस की एक बूढ़ी औरत
दरवाज़े से झाँकी।

किसे ढूँढ रहे हो बेटा?
उसने पूछा।

अनाया…
यहीं रहती थी,
राहुल ने काँपती हुई आवाज़ में पूछा।

बूढ़ी औरत का चेहरा
एकदम सख़्त हो गया।

यहाँ कोई अनाया नहीं रहती,
वो बोली।
तीन साल पहले
यहाँ एक लड़की रहती थी—
मीरा।

राहुल की धड़कन रुक-सी गई, क्योकि उसने कई बार अनाया को उस घर तक छोड़ा था।

आंटी ने कहा, एक दिन बस से लौटी ही नहीं।
ये कमरा तब से ही बंद है।

राहुल धीरे-धीरे
पीछे हटा।

उसी रात
वो फिर बस में बैठा।

वही खिड़की।
बस चल पड़ी।

और तभी
उसे अपनी बगल में
हल्की-सी खुशबू महसूस हुई।

वही जानी-पहचानी खुशबू।

राहुल ने धीरे से
सर घुमाया।

अनाया
वहीं बैठी थी।

उसी तरह।
शांत।
खामोश।

तुम आ गई?
राहुल की आवाज़ काँप गई।

अनाया मुस्कुराई।

मैं कभी गई ही कहाँ थी?
उसने कहा।

बस की लाइट
एक पल को झपकी।

और अगले ही पल
सीट
खाली थी।

राहुल की हथेली में
एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था।

उसी लिखावट में—

कुछ प्यार
पहली नज़र में नहीं होते।
कुछ ख़त
पहली बार में नहीं पढ़े जाते।

लेकिन कुछ लोग
सिर्फ़ इंतज़ार करने आते हैं—

ताकि कोई
उन्हें आख़िरी बार
देख सके।

बस अगले स्टॉप पर रुकी।

राहुल उतर गया।

उसने पीछे मुड़कर देखा।

खिड़की वाली सीट पर
अब कोई नहीं था।

बस आगे बढ़ गई। और राहुल समझ गया—

कुछ कहानियाँ
मुलाक़ात से नहीं,
याद बनकर
ज़िंदा रहती हैं।

क्योंकि कुछ अजनबी
सिर्फ़ दिल में नहीं…
रास्तों में भी
रह जाते हैं।

 

 

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