मुस्कान… नाम सुनते ही जैसे किसी खुशमिज़ाज, हँसमुख लड़की की तस्वीर उभरती है। लेकिन उसकी कहानी उतनी सरल नहीं है।
मुस्कान 24 साल की एक साधारण-सी दिखने वाली लड़की थी, जो दिल्ली के एक छोटे-से किराए के फ्लैट में अकेली रहती थी अपने परिवार से दूर,। दिन में वह एक प्राइवेट कंपनी में ग्राफिक डिज़ाइनर का काम करती थी—रंगों, चेहरों और मुस्कुराते पोस्टर्स के बीच। लेकिन उसकी अपनी ज़िंदगी में रंग कम और सन्नाटा ज़्यादा था।
बचपन से ही मुस्कान थोड़ी अलग थी। वह भीड़ में रहकर भी अकेली महसूस करती थी। स्कूल में दोस्त थे, पर कोई बहुत करीबी नहीं। घर में माँ-पापा अपने काम में व्यस्त रहते। जब भी उसे डर लगता या दिल भारी होता, वह आईने के सामने खड़ी हो जाती। आईने में दिखने वाली अपनी ही आँखों में झाँककर वो खुद से बातें करती—जैसे सामने कोई और हो, जो उसे समझता हो।
धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि आईने वाली मुस्कान उससे ज़्यादा मजबूत है। ज़्यादा निडर। जहाँ असली मुस्कान डर जाती, आईने वाली मुस्कान बस मुस्कुरा देती। वही मुस्कान… जो कभी नहीं काँपती थी।
रात के ठीक 3:17 बजे रिया का फोन बजा।
कमरे में घना सन्नाटा था। बाहर सड़क पर दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। घड़ी की टिक-टिक दीवार से टकराकर जैसे उसके कानों में चुभ रही थी।
फोन की स्क्रीन अंधेरे कमरे में चमक रही थी।
नंबर नहीं था।
सिर्फ एक शब्द लिखा था— Unknown।
रिया आधी नींद में थी। उसने करवट बदलते हुए कॉल उठा ली।
हेलो…?
कुछ सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई। सिर्फ हल्की साँसों की ध्वनि।
फिर अचानक उसने कहा—
रिया… दरवाज़ा मत खोलना।
रिया का दिल धड़क उठा। आवाज़… उसकी अपनी थी। बिल्कुल वही टोन, वही सांसों का उतार-चढ़ाव।
कौन? उसने घबराकर पूछा।
दूसरी तरफ से फुसफुसाहट आई—
मैं… तुम ही हूँ। पाँच मिनट बाद कोई दरवाज़ा खटखटाएगा। मत खोलना… वरना मैं अंदर आ जाऊँगी।
और कहकर कॉल कट गई।
रिया कुछ सेकंड तक फोन को घूरती रही क्योकि उसे कुछ समझ नहीं आया की ये क्या हुआ । उसने खुद को समझाया— सपना है… सिर्फ एक बेबुनियाद सपना।
लेकिन तभी—
ठक… ठक… ठक…
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
ये आवाज जैसे उसकी दिल की धड़कनों को बड़ा रही हो, उसका गला बिल्कुल सूख गया।
रिया… दरवाज़ा खोलो, मैं मम्मी हूँ।
आवाज़ बिल्कुल मम्मी जैसी थी। वही स्नेह, वही चिंता।
लेकिन मम्मी तो दो दिन पहले ही गाँव गई थीं।
रिया के हाथ काँपने लगे।
फोन फिर बजा।
3:22 AM.
उसने ना चाहते हुए भी काँपते हाथ से कॉल रिसीव की।
अगर तुमने दरवाज़ा खोला… तो मैं तुम्हारी जगह ले लूँगी।
दस्तक तेज़ हो गई।
रिया… दरवाज़ा खोलो!
उसकी आँखों में आँसू आ गए। क्या सच में बाहर मम्मी होंगी? क्या वो डर की वजह से कुछ गलत सोच रही है?
डर और उम्मीद के बीच फँसी रिया धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गई।
उसने आई-होल से झाँका—
और उसकी सांस वही रुक गई।
बाहर…
वो खुद ही खड़ी थी।
उसी की नाइट ड्रेस। वही चेहरा। लेकिन आँखें पूरी काली।और होंठों पर अजीब मुस्कान।वो बहुत ड़रावनी लग रही थी कि कोई भी ड़र जाए।
धीरे से उसने सिर झुकाकर कहा—
मैं अंदर आ चुकी हूँ…
उसी क्षण पीछे से जोरदार आवाज़ आई—
आईने के टूटने की।
रिया ने पलटकर देखा। बेडरूम का बड़ा आईना फर्श पर बुरी तरह चकनाचूर पड़ा था। लेकिन दीवार पर उसका प्रतिबिंब अब भी दिख रहा था।
और उस प्रतिबिंब में खड़ी लड़की मुस्कुरा रही थी। और इस मुस्कान में खुशी नहीं शौतानी थी।
कमरे की लाइट झपकी… फिर बंद हो गई।
अंधेरा।
फोन की स्क्रीन फिर चमकी।
3:23 AM – Unknown Calling
अब रिया बहुत ड़र चुकी थी उसने काँपते हुए हाथो से कॉल उठाई।
अब उसने तुम्हें देख लिया है, दूसरी तरफ से आवाज़ आई।
कौन…?
जो हर आईने में रहता है। हर परछाईं में। तुम्हारा वो हिस्सा जिसे तुमने सालों से दबा रखा है।
रिया की सांसें बहुत तेज़ हो गईं।
तभी उसे दीवार पर अपना साया दिखा।
एक नहीं… दो दो।
पहला उसकी हर हरकत दोहरा रहा था।
दूसरा… धीरे-धीरे अलग दिशा में सिर घुमा रहा था।
दरवाज़े की दस्तक अचानक बंद हो गई।
पूरा घर चुप।
फिर पीछे से धीमी फुसफुसाहट—
तुम हमेशा अकेली महसूस करती थी ना? जब कोई नहीं सुनता था? तब मैं सुनती थी…
ये सुनते ही रिया का दिमाग तेजी से पीछे भागा। बचपन की वो रातें जब वो आईने के सामने खड़ी होकर खुद से बात करती थी। जब उसे लगता था कि आईने वाली रिया ज्यादा मजबूत है। और ज्यादा निडर है।
मैं तुम्हारा डर हूँ, वो आवाज़ बोली।
मैं तुम्हारी वो इच्छा हूँ… जो तुम कभी बन नहीं पाई।
अचानक बेडरूम का दरवाज़ा अपने-आप ही बंद हो गया।
ये देखकर रिया ज़ोर से चीख पड़ी।
आईने के टूटे हुए टुकड़ों में हर टुकड़े में उसका चेहरा था— लेकिन हर चेहरा अलग भाव में। कोई हँस रहा था। कोई रो रहा था। कोई गुस्से में था।
और एक… पूरी तरह काला भी था., मत्लब हर एक ईमोशन उन बिखरे टुकड़ो में दिख रहे थे।
फोन फिर बजा।
इस बार स्क्रीन पर सिर्फ समय था— 3:17 AM।
समय कभी आगे बढ़ा ही नहीं, आवाज़ हँसी।
तुम अभी भी उसी पल में फँसी हुई हो।
रिया को अचानक याद आया— 3 साल पहले इसी समय वो एक्सीडेंट में बची थी। कार बुरी तरह पलट गई थी। डॉक्टर ने कहा था— कुछ मिनट की बात थी।
कुछ मिनट।
3:17 AM.
तुम उस रात मर चुकी थी, आवाज़ ने कहा।
मैं बच गई थी।
रिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
नहीं… ये सच नहीं…
अचानक उसके सामने अंधेरे में वही काली आँखों वाली लड़की खड़ी थी। बिल्कुल पास।
उसने धीरे से रिया के गाल को छुआ।
हाथ बर्फ जैसा ठंडा।
अब हम जगह बदलेंगे।
उसके ये रहते ही कमरे में सब सामान घूमने लगा।
रिया ने खुद को चीखते महसूस किया— लेकिन आवाज़ नहीं निकली।
अचानक सब शांत हो गया।
सुबह की हल्की धूप खिड़की को छानकर खिड़की से अंदर आ रही थी।
कमरा बिल्कुल सामान्य था। आईना सही-सलामत दीवार पर लगा था। दरवाज़ा बंद। सब कुछ जैसे कभी टूटा ही नहीं।और ना ही यहॉ कभी कुछ हुआ हो।
रिया बिस्तर पर बैठी थी।
शांत। स्थिर।
उसने धीरे से मुस्कुराया।
उसका फोन बजा।
स्क्रीन पर लिखा था— Unknown।
उसने कॉल उठाई।
दूसरी तरफ से घबराई हुई आवाज़ आई—
रिया… दरवाज़ा मत खोलना…
लेकिन इस बार मुस्कान उसके चेहरे पर थी।
उसकी आँखें… पूरी काली थीं।
और वह धीरे से बोली—
मैं अंदर आ चुकी हूँ।
यानी की मुस्कान की एक गलती ने उसका जीवन बदल दिया और उसकी गलत आत्मा अंदर आने में कामयाब हो गई।

