जुर्म जो दीवारों में दफ़्न था

हर जुर्म खून से नहीं होता। कुछ जुर्म ऐसे होते हैं, जो सालों तक सांस लेते रहते हैं— दीवारों के भीतर, फाइलों के नीचे, और सबसे ज़्यादा… क़ातिल के भीतर। हर रात ठीक 2:17 AM। ना 2:16 ना 2:18 ठीक 2:17 पर आरव मल्होत्रा की नींद उसी सेकंड टूटती थी। उसका फोन vibrate नहीं करता … Read more

एक लाश, तीन क़बूलनामा — सच जो किसी एक का नहीं था

 कहानी क्यों लिखी गई? हर क़त्ल में खून ज़रूरी नहीं होता। हर अपराध में हथियार ज़रूरी नहीं होता। कुछ अपराध धीरे-धीरे होते हैं— इतने धीरे कि जब तक सच सामने आता है, तब तक सब अपने-अपने सच के साथ खड़े हो चुके होते हैं। यह कहानी उसी तरह के एक क़त्ल की है। रामनगर पुलिस … Read more