प्यार से पहले सज़ा

छाया की बदकिस्मती ने बचपन में ही दस्तक दे दी थी जब वो सिर्फ आठ साल की थी, उसकी माँ हमेशा के लिए चली गई।
पिता ज़िंदा थे, फिर भी छाया को अपने पास नहीं रखा। उसे चाचा-चाची के घर छोड़ दिया — यह कहकर कि यहीं अच्छा रहेगा।

पर वो घर, घर नहीं लगता। वहाँ ताने थे, मार थी, और हर दिन यह एहसास कि वो बोझ है।छाया हर रात एक ही सपना देखती —
पापा आएँगे… और मुझे यहाँ से ले जाएँगे।

सालों बाद पिता की खबर आई। लेकिन इस बार वो खुद नहीं आए… बल्कि उनकी मौत आई थी।

अंतिम संस्कार के बाद चाचा-चाची की आँखों में आँसू नहीं थे, सिर्फ एक सवाल था —अब इससे फ़ायदा कैसे उठाया जाए?

और उसी रात, छाया की ज़िंदगी एक सौदे में बदलने वाली थी…

पिता की मौत के बाद घर की हवा बदल गई थी। अब छाया को बेटी नहीं, खर्च समझा जाने लगा। चाचा-चाची फुसफुसाकर बातें करते, और छाया हर बार अनसुना करने की कोशिश करती।

एक रात दरवाज़े पर दस्तक हुई। सफेद गाड़ी… और उसके साथ एक अजनबी। चाचा ने कहा, काम है, लड़की शहर जाएगी।

छवि को कुछ समझ नहीं आया। बस वो इतना समझ गई थी, कि उसकी मर्ज़ी किसी को चाहिए ही नहीं थी।

काग़ज़ों पर दस्तख़त हुए। पैसे गिने गए और उसी पल, छवि बेची जा चुकी थी और चौंकाने वाली बात ये थी कि उसके खुदके चाचा ने उसे बेच डाला।

गाड़ी चल पड़ी। खिड़की से बाहर अंधेरा भाग रहा था। छाया ने चीखना चाहा… लेकिन आवाज़ गले में ही मर गई क्योकि उसे आवाज़ तबाने की आदत हो गई थी। पीछे छूट गया वो घर, और आगे — एक ऐसी दुनिया, जहाँ ज़िंदा रहना ही सबसे बड़ा जुर्म था…

गाड़ी रुकी तो चारों तरफ़ सन्नाटा था। ऊँची दीवारें, लोहे का गेट, और अंदर जाती सीढ़ियाँ।
छवि समझ चुकी थी — ये कोई नौकरी की जगह नहीं हैं।

अंदर कई लड़कियाँ थीं किसी की आँखों में डर, किसी की आँखों में हार। तभी एक आदमी बोला, यहाँ रोने की इजाज़त नहीं है। छाया ने पहली बार आवाज़ उठाई। उसने भागने की कोशिश की। जवाब में उसे ज़मीन पर गिरा दिया गया। दर्द था… लेकिन डर से ज़्यादा गुस्सा था।

उस रात छाया सोई नहीं। अंधेरे में छत को देखते हुए उसने एक वादा किया —या तो मैं यहाँ से निकलूँगी… या ये जगह टूटेगी। उसी पल दरवाज़े के बाहर किसी के कदमों की आहट हुई और छवि को नहीं पता था — वो कदम दुश्मन के थे या उसकी ज़िंदगी बदलने वाले किसी अपने के…

अगली सुबह उस अंधेरी जगह में हलचल थी। दरवाज़े खुले, लोग दौड़ने लगे। छवि ने देखा—एक नया आदमी लाया गया था। लंबा कद, शांत चेहरा, लेकिन आँखों में अजीब सी गहराई। वो डरा हुआ नहीं लग रहा था, बल्कि हालात को पढ़ रहा था। छाया की नज़र उससे टकराई, और उसने तुरंत नज़र फेर ली। यहाँ भरोसा करना मौत को बुलाने जैसा था।

थोड़ी देर बाद छाया को बाहर ले जाया गया। वहीं वही अजनबी खड़ा था। जब एक आदमी ने छाया का हाथ ज़ोर से पकड़ा, उस अजनबी ने पहली बार आवाज़ उठाई—शांत, लेकिन सख़्त। माहौल में सन्नाटा छा गया। किसी ने उसे घूरा, किसी ने चेतावनी दी। छाया हैरान थी—यह आदमी यहाँ होकर भी डर क्यों नहीं रहा?

रात को, जब छाया को बंद कमरे में धकेला गया, दरवाज़ा अचानक फिर खुला। वही अजनबी था। उसने बिना कुछ कहे छाया के हाथ खोल दिए। छाया ने गुस्से में फुसफुसाकर कहा, मदद क्यों? जवाब छोटा था—क्योंकि तुम यहाँ की नहीं हो।

उसके कदमों की आहट दूर जाती गई। छाया वहीं खड़ी रह गई। पहली बार उसे महसूस हुआ—इस अंधेरे में कोई है, जो शायद दुश्मन नहीं… लेकिन दोस्त भी नहीं।

अजनबी अब छाया के लिए सिर्फ़ एक चेहरा नहीं था। उसका नाम था वीर—कम से कम यही उसने बताया। वो ज़्यादा बोलता नहीं था, लेकिन हर बार जब मुसीबत पास आती, वीर किसी न किसी तरह सामने आ जाता। छाया को ये अजीब लगता था। इस जगह पर बिना मतलब कोई किसी की मदद नहीं करता था। हर एहसान के पीछे एक सौदा छुपा होता है।

दिनों के साथ दोनों की बातें बढ़ने लगीं। वीर ने बताया कि वो यहाँ फँसा हुआ है, बाहर निकलने का रास्ता ढूँढ रहा है। छाया ने अपनी कहानी कभी पूरी नहीं सुनाई, लेकिन उसकी आँखें सबकुछ खुद ही कह देती थीं। पहली बार उसे लगा कि उसका दर्द कोई सुन रहा है। भरोसा धीरे-धीरे जन्म ले रहा था—और यही सबसे खतरनाक था।

एक रात वीर ने फुसफुसाकर कहा, आज मौका है। अगर निकलना है तो अभी। दिल ज़ोर से धड़कने लगा। दोनों भागे। गलियारों, सीढ़ियों, अंधेरे दरवाज़ों से होते हुए आज़ादी बस कुछ कदम दूर थी। तभी अचानक सायरन बज उठा।

किसी ने धोखा दिया था। गोलियाँ चलीं। छाया किसी तरह छुप गई… लेकिन वीर को पकड़ लिया गया।

छाया अंधेरे में काँपती खड़ी थी। आज़ादी सामने थी, पर पहली बार उसका दिल पीछे छूट गया था।

छवि बाहर निकल चुकी थी। खुली हवा, आज़ादी की पहली साँस… लेकिन उसका दिल भारी था। हर कदम के साथ उसे वीर की आँखें याद आ रही थीं—वो पल जब उसे पकड़ लिया गया था। छवि जानती थी, अगर वो चली गई, तो वीर कभी बाहर नहीं आएगा। और शायद ज़िंदा भी नहीं रहेगा।

पहली बार छाया ने अपने दिल की सुनी। उसे समझ आ गया—ये सिर्फ़ एहसान नहीं था। ये सिर्फ़ साथ नहीं था। ये प्यार था। वो प्यार, जो दर्द में जन्म लेता है और डर से नहीं डरता।

छाया वापस उसी अंधेरी जगह की तरफ़ लौटी, जहाँ से निकलने के लिए उसने जान की बाज़ी लगाई थी। उसने सुना कि वीर को सज़ा दी जा रही है, क्योंकि उसने क़ायदे तोड़े थे। छाया ने दीवारों के पीछे छुपकर हर रास्ता याद किया, हर पहरेदार की चाल देखी। अब वो डरी हुई लड़की नहीं थी—अब वो सोच रही थी।

रात के सन्नाटे में छाया ने ज़मीन से एक बंदूक उठाई। हाथ काँप रहे थे, पर नज़र साफ़ थी। उसने खुद से कहा— मैं इंतज़ार नहीं करूँगी…मैं लड़ूँगी। और उसी पल, अंधेरी दुनिया में बदले की पहली गोली चलने वाली थी…

गोली की आवाज़ ने सन्नाटे को चीर दिया। पहरेदार संभल पाते, उससे पहले छाया ने दूसरा फायर किया। डर अब उसके अंदर नहीं था—डर अब सामने खड़ा था। वो गलियारों से दौड़ती रही, हर मोड़ पर वही चेहरा याद करती रही जिसे बचाने वो लौटी थी। आज वो सिर्फ़ किसी के लिए नहीं, खुद के लिए लड़ रही थी।

वीर को एक अंधेरे कमरे में बाँधकर रखा गया था। चोटों से भरा शरीर, लेकिन नज़र अब भी ज़िंदा थी। जब छाया ने दरवाज़ा खोला, वीर को यक़ीन नहीं हुआ।

तुम क्यों लौटी? उसने पूछा।छाया ने बस इतना कहा—क्योंकि कुछ क़र्ज़ बिना चुकाए नहीं छोड़े जाते। उसने उसकी रस्सियाँ खोलीं।और भागने की कोशिश में सबसे बड़ा सच सामने आया। इस सब के पीछे वही आदमी था, जिसने छाया को खरीदा था— और सौदे में शामिल थे उसके चाचा-चाची। पैसों के बदले रिश्ते बेच दिए गए थे। जैसे ही छाया को सच पता चला वो वीर के साथ पुलिस चौकी पहुची और अपने चाचा-चाची और सौदे वाले आदमी के खिलाफ FIR लिखवई।

जिसके बाद अंतिम टकराव में पुलिस सायरन गूँजे। गिरोह टूट चुका था। चाचा-चाची की नज़रें ज़मीन पर थीं। छाया ने उन्हें देखा और कहा— आज तुमने मुझे नहीं खोया… आज तुमने इंसान होना खो दिया।

रात खत्म हो रही थी। पर कहानी अभी बाकी थी…

सुबह की रोशनी जब उस अंधेरी जगह पर पड़ी, तो सब कुछ बदल चुका था। पुलिस की गाड़ियाँ, टूटा हुआ गिरोह, और हथकड़ियों में वो चेहरे—जिन्होंने इंसानियत का सौदा किया था। छाया चुपचाप खड़ी थी। उसके चेहरे पर न डर था, न आँसू। पहली बार उसकी आँखों में सुकून था।

वीर घायल था तो उसे एम्बुलेंस में ले जाया जा रहा था। जाते-जाते उसने छाया का हाथ थाम लिया। अब सब खत्म हो गया, उसने कहा। छाया मुस्कुराई—हल्की, सच्ची मुस्कान। नहीं, उसने जवाब दिया, अब तो सब शुरू हुआ है वीर। उस पल दोनों समझ गए—ये साथ किसी मजबूरी से नहीं, दिल के कनैक्शन से है।

केस बंद हुआ, पर एक सच खुला जिसने सबको हिला दिया। वीर कोई आम आदमी नहीं था। वो इसी नेटवर्क को तोड़ने के मिशन पर था— और छाया की गवाही ने पूरे सिस्टम को बेनकाब कर दिया। एक लड़की, जिसे बेचा गया था… अब वही सबसे बड़ा सबूत बन चुकी थी। लेकिन वीर का सच जानने के बाद छाया के दिल में जो प्यार था उसने उसे मन में ही दबा दिया क्योकि उसने सोचा वीर उससे शादी क्यों ही करेगा।

कुछ महीनों बाद, एक नई जगह। छाया एक बच्चों के शेल्टर में खड़ी थी—अब वो वहाँ काम करती थी। दरवाज़े पर वीर आया। छाया ने उसकी तरफ देखा और नज़रे चुरा ली लेकिन वीर ने उससे करीबी बड़ाई और उसे अपनी बाहों में ले लिया और अपने प्यार का इज़हार कर दिया… और छाया की आखों से आसू छलकने लगे क्योकि उसे इसी प्यार का इंतज़ार था। छाया ने भी इस बार बिना कुछ सोचे समझे वीर को ज़ोर से पकड़ लिया और उसके प्यार का इंतज़ार खत्म हो गया।और वीर मुस्कुरा दिया।

तो कभी-कभी… प्यार मिलने से पहले, किस्मत को हारना भी पड़ता है जैसे छाया ने अपनी बुरी किस्मत को हराया।

 

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