प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 पर कोई इंतज़ार करता है

रेलवे स्टेशन सुबह-सुबह किसी ज़िंदा शहर जैसा होता है—
घड़ियों की टिक-टिक, चाय की केतली, ट्रेन की सीटी, और भागते हुए क़दम।

लेकिन इस स्टेशन पर एक प्लेटफ़ॉर्म ऐसा भी था जिसका नाम लोग लेते तो थे, पर उस पर रुकते बहुत कम थे।

प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4।

वहाँ भी पटरियाँ थीं, वहाँ भी ट्रेनें रुकती थीं, लोग चढ़ते-उतरते थे—
फिर भी वहाँ कुछ अधूरा सा लगता था।

जैसे कोई कहानी बीच में ही छोड़ दी गई हो।

सुबह की धुंध
यहीं आकर ज़्यादा देर तक ठहरती थी। आवाज़ें जैसे टकराकर यहीं कहीं पर खो जाती थीं।

अद्वैत रोज़ यहीं से ट्रेन पकड़ता था।
उसके लिए ये बस ऑफिस जाने का रास्ता था—
ना कोई लगाव, ना कोई सवाल।

वही समय— 6 बजकर 40 मिनट।
वही ट्रेन। वही कोना जहाँ खड़े होकर वो प्लेटफ़ॉर्म को आधी नज़र से देखता था।

धीरे-धीरे
उसने महसूस किया कि प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 भीड़ में भी कुछ अकेला सा लगता है।

यहाँ लोग कम बोलते थे।
कम हँसते थे।
और ज़्यादा देर तक कहीं और देखते रहते थे। जैसे किसी से नज़रे चुरा रहे हो।

मानो वो जगह सिर्फ़ ट्रेन के लिए नहीं, किसी और के लिए बनी हो। जिसे महसूस करके दिल में एक अलग हलचल होती हो।

एक दिन अद्वैत की नज़र बीच में रखी एक पुरानी स्टील की बेंच पर पड़ी।
जंग खाई हुई, रंग उखड़ा हुआ— लेकिन अब भी मज़बूत।

जब वो बेंच खाली होती, तो खालीपन साफ़ दिखाई देता था। उसके पास खड़े होकर अद्वैत को अक्सर लगता— जैसे कोई अभी-अभी उठकर वहा से गया हो।प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 पर समय धीमा चलता था। कम से कम उसे तो ऐसा ही लगता था।

यहाँ खड़े होकर वो कई बार
समय से पहले ट्रेन का इंतज़ार करने लगता—
जैसे डर हो कि अगर न देखा, तो कुछ छूट जाएगा।

और उसे नहीं पता था कि वो क्या ढूँढ रहा है।

कभी-कभी उसके मन में अजीब-सा सवाल उठता—

क्या जगहें भी
किसी का इंतज़ार करती हैं?

प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 ऐसा ही लगता था। जैसे वो किसी को जानता हो। किसी नाम को अब भी याद रखता हो। लोग आते, दो-चार क़दम चलते, और बिना वजह दूसरे प्लेटफ़ॉर्म की ओर मुड़ जाते। जैसे यहाँ रुकना उन्हें भारी पड़ता हो। लेकिन अद्वैत हर रोज़ यहीं रुकता था। शायद आदत से। शायद अनजाने में।उसे तब नहीं पता था कि प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 सिर्फ़ एक जगह नहीं है— वो एक याद है।
एक अधूरी कहानी।
और एक सवाल
जिसका जवाब बहुत जल्द उसकी ज़िंदगी देने वाली थी। अद्वैत ने उसे पहली बार प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 पर देखा। वो उसी पुरानी स्टील की बेंच पर बैठी थी—
सफ़ेद सूट, हल्का दुपट्टा, और हाथों में नीली काँच की चूड़ियाँ।

आती-जाती ट्रेनें, घोषणाएँ, भागते लोग—

कुछ भी उसे छूता नहीं था। क्योंकि वो ट्रेन नहीं देख रही थी। उसकी नज़र पटरियों पर नहीं, उस खाली जगह पर थी
जहाँ लोग किसी का इंतज़ार करते हैं।

अद्वैत ने सोचा—
शायद आज ट्रेन नहीं पकड़नी होगी। लेकिन अगले दिन भी वो वहीं थी।

उसी समय। उसी खामोशी के साथ।

तीसरे दिन अद्वैत ने जानबूझकर उसे नहीं देखा—और तब भी उसे पता था कि वो वहाँ है। कुछ मौजूदगियाँ देखे बिना भी महसूस हो जाती हैं।वो कभी फोन नहीं निकालती। कभी समय नहीं देखती। ट्रेन आने पर भी उसकी नज़र नहीं उठती।

भीड़ उठती, दौड़ती, छूँट जाती— और वो वहीं बैठी रहती।

जैसे वो किसी एक पल के लिए आती हो। रोज़ाना उसी समय।

एक सुबह
अद्वैत ने देखा— धुंध के बावजूद उसकी परछाईं पटरियों पर नहीं थी।

दिल बिना वजह ज़रा तेज़ धड़क गया।

जो लड़की कभी ट्रेन नहीं देखती—
वो यहाँ आती ही क्यों है? और उसी सवाल के साथ अद्वैत ने महसूस किया— कि वो अब उसे रोज़ देखने लगा है।

ट्रेन के लिए नहीं।
उसके होने के लिए।

शुरुआत में ये बस एक इत्तेफ़ाक़ था। एक सुबह उसकी नज़र उठी— और अद्वैत की नज़र उससे टकरा गई।

कोई मुस्कान नहीं। कोई हैरानी नहीं। बस एक शांत-सी नज़र— जैसे वो पहले से जानती हो।

अद्वैत ने नज़र हटा ली। दिल थोड़ा तेज़ धड़का।

अगले दिन वही हुआ। और फिर उसके अगले दिन भी। अब नज़रे इत्तेफ़ाक़ नहीं रहीं। अद्वैत अनजाने में ट्रेन से पहले उसे देखने लगा। और वो भी ठीक उसी पल नज़र उठा लेती। कुछ रिश्ते शब्दों से पहले खामोशी में बनते हैं। उन नज़रों में बातें होने लगी थीं। जब वो देर से आती, अद्वैत बेचैन हो जाता। जब वो पहले से बैठी होती, उसे सुकून मिलता। भीड़ चाहे कितनी भी हो— वो नज़र उसे ढूँढ ही लेती। और उस दिन अद्वैत समझ गया—ये अब संयोग नहीं। ये आदत है। एक ऐसी आदत जो पूछती नहीं, बताती भी नहीं—बस ज़रूरी हो जाती है। उसकी नज़र अब डराती नहीं थी। वो सुकून देने लगी थी। और उसी सुकून में अद्वैत ने अपने दिल में एक साफ़-सा डर महसूस किया—

अगर एक दिन
वो नज़र नहीं मिली…
तो कुछ बहुत ज़रूरी
छूट जाएगा।

और प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 अब सिर्फ़ एक जगह नहीं रहा था— वो दो नज़रों के बीच खिंची हुई एक खामोश डोर बन चुका था।

एक सुबह, जब प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 पर धुंध कुछ ज़्यादा ही गहरी थी, नैना ने अचानक अपनी जगह से उठकर अद्वैत के पास आकर बैठने का इशारा किया—जैसे वो ये फैसला पहले ही कर चुकी हो। पहली बार उसके होंठ खुले और उसने धीमी-सी आवाज़ में कहा,

आप रोज़ मुझे देखते हैं…

और सोचते हैं कि मैं ट्रेन क्यों नहीं देखती।”

अद्वैत चौंका, क्योंकि उसने कभी माना ही नहीं था कि वो पकड़ा जा चुका है; उसने मुस्कुराकर कहा कि कुछ इंतज़ार ट्रेन के लिए नहीं होते, और उसी पल नैना ने अपना नाम बताया—ऐसे जैसे कोई राज़ सौंप रही हो। अब उनकी मुलाक़ातें बस देखने तक सीमित नहीं रहीं; वो साथ बैठते, देर तक चुप रहते, और कभी-कभी उँगलियाँ इतनी पास आ जातीं कि हवा में भी धड़कन सुनाई देती।

प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 अब एक जगह नहीं, एक वादा बन चुका था—हर सुबह का, हर खामोश पल का।

एक दिन नैना ने हँसते हुए कहा, “अगर मैं अचानक गायब हो जाऊँ तो?” अद्वैत ने बिना हँसे जवाब दिया, तो मैं ढूँढूँगा… क्योंकि अब ये इंतज़ार मेरा भी है। उस दिन नैना की आँखों में पहली बार डर उतरा, और जाते-जाते उसने बहुत धीरे से कहा—“कुछ इंतज़ार पूरे नहीं होते… बस सौंप दिए जाते हैं।

अगले दिन, उसी बेंच पर सिर्फ़ सन्नाटा था; न नैना, न उसकी चूड़ियों की आवाज़, और पहली बार प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 अद्वैत को चुभने लगा—जैसे किसी ने उसकी आदत छीन ली हो।

तीसरे दिन, जब अद्वैत बेंच के पास खड़ा होकर बार-बार घड़ी देख रहा था, उसकी नज़र प्लेटफ़ॉर्म के आख़िरी सिरे पर लगे पुराने नोटिस बोर्ड पर पड़ी—वही बोर्ड जिसे लोग बरसों से नज़रअंदाज़ करते आए थे।

धूल से ढके, फटे-पुराने पोस्टरों के बीच एक तस्वीर थी, और उस तस्वीर ने उसे जकड़ लिया। वही आँखें… वही सुकून… वही खामोशी।

लेकिन नीचे लिखा था उसे पड़कर अद्वैत के होश उड़ गए—नैना शर्मा, उम्र 22, पाँच साल पहले इसी स्टेशन से लापता। अद्वैत के पैरों तले ज़मीन खिसक गई; उसे समझ नहीं आया कि वो साँस ले रहा है या यादों में डूब रहा है। उसे याद आया कि नैना कभी भीड़ में नहीं रहती थी, कभी ट्रेन नहीं देखती थी, और न उसकी परछाई दिखती थी, हमेशा उसी समय आती थी जब प्लेटफ़ॉर्म सबसे शांत होता था। अचानक उसे नैना का वो सवाल याद आया—अगर मैं न आऊँ तो क्या आप ढूँढेंगे? शायद वो इंतज़ार इसलिए कर रही थी… कि कोई उसे ढूँढे।

उसी रात, आख़िरी ट्रेन के बाद, अद्वैत फिर प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 पर खड़ा था—और बेंच पर नैना बैठी थी, वैसी ही शांत, वैसी ही पास। उसने मुस्कुराकर कहा,

आप आ गए…

इसलिए मैं लौट सकी। अगले ही पल प्लेटफ़ॉर्म की लाइट झपकी, और नैना गायब थी—बस अद्वैत की हथेली में एक मुड़ा हुआ काग़ज़ रह गया, जिस पर लिखा था:

कुछ लोग मिलने नहीं आते… वो बस ये जानने आते हैं कि उनका इंतज़ार अभी ज़िंदा है या नहीं।

उस दिन अद्वैत समझ गया कि प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 किसी का इंतज़ार नहीं करता—वो इंतज़ार को ज़िंदा रखता है।

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