neeche chupkar
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मुझे हमेशा लगता था कि मैं अपनी बेटी राधिका को अच्छी तरह जानती हूँ।
13 साल की राधिका शांत, समझदार और जिम्मेदार लड़की थी। तलाक के बाद हम दोनों ही एक-दूसरे का सहारा बन गए थे।

हम पुणे के एक शांत फ्लैट में रहते थे जहाँ मुझे सब कुछ सामान्य और सुरक्षित लगता था।

लेकिन एक सुबह मेरा सब कुछ बदल गया।

मैं ऑफिस जाने के लिए निकल ही रही थी कि सामने वाली पड़ोसन रूबी आंटी ने मुझे आवाज़ दी।

अदिति… एक बात पूछूं? उन्होंने थोड़ा झिझकते हुए कहा।

हाँ आंटी, बोलिए।

उन्होंने धीरे से पूछा—

क्या मेनिका आज स्कूल नहीं गई?

मैं हैरान रह गई।

क्यों? अभी तो गई है, मैंने जवाब दिया।

रूबी आंटी ने अजीब शक की नज़रों से मुझे देखा।

अरे… लेकिन मैं तो उसे कई बार दोपहर में घर आते देखती हूँ। कभी-कभी उसके साथ और बच्चे भी होते हैं।

मेरे दिल में अचानक एक अजीब सा डर बैठ गया।

नहीं आंटी… शायद आपने किसी और को देखा होगा, मैंने जल्दी से बात खत्म कर दी।

लेकिन उनके शब्द मेरे दिमाग में घूमते रहे।

शाम को जब राधिका स्कूल से लौटी, तो मैंने casually पूछा—

आज स्कूल कैसा था?

ठीक था, उसने छोटा सा जवाब दिया।

मुझसे रहा नहीं गया और मैने पूछ डाला, तुम दिन में घर तो नहीं आई थीं?

वह एक पल के लिए रुक गई।

फिर मुस्कुराकर बोली—

नहीं मम्मा… शायद रूबी आंटी ने किसी और को देखा होगा।

उसकी मुस्कान अजीब थी… जैसे वह मुझसे कुछ छुपा रही हो।

उस रात मैं सो नहीं पाई।

राधिका हाल के दिनों में सच में बदल गई थी।

वह कम बोलती थी… कम खाती थी… और हमेशा थकी हुई ही लगती थी।

अगली सुबह मैंने सच जानने का फैसला कर लिया।

मैंने दिखावा किया कि मैं ऑफिस जा रही हूँ।

लेकिन जैसे ही राधिका स्कूल के लिए निकली…

मैं चुपचाप वापस घर में आ गई।

और उसके कमरे में जाकर बिस्तर के नीचे छिप गई।

मुझे नहीं पता था कि कुछ ही मिनटों में…

मैं ऐसा सच सुनने वाली हूँ…

जिसके लिए मैं बिल्कुल तैयार नहीं थी।

बिस्तर के नीचे छिपना जितना आसान लगा था, उतना था नहीं।

जगह तंग थी… धूल भरी… और पूरी तरह अंधेरी।

मेरी सांसें तेज़ चल रही थीं।

मैंने मोबाइल की स्क्रीन बंद कर दी ताकि कोई रोशनी बाहर ना जाए।

समय धीरे-धीरे बीत रहा था।

9:00…

फ्लैट में पूरी खामोशी थी।

9:20…

तभी अचानक…

क्लिक…

मुख्य दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।

मेरा दिल जोर से धड़कने लगा।

कदमों की हल्की आहट अंदर आई।

और फिर मैंने मेनिका की आवाज़ सुनी।

जल्दी अंदर आओ… कोई देख न ले।

मैं चौंक गई।

उसके साथ कोई और भी था।

फिर मैंने एक और आवाज़ सुनी…

लेकिन वो बच्चों जैसी बिल्कुल नहीं थी।

किसी बड़े आदमी की भारी आवाज़।

डरो मत… तुम्हारी मम्मी ऑफिस चली गई है शयाम से पहले नहीं आएगी।

मेरी सांस जैसे रुक गई।

एक आदमी… मेरे घर में?

फिर मैंने और कदमों की आवाज़ सुनी।

ऐसा लग रहा था जैसे दो या तीन लोग अंदर आए हों।

वे लोग सीधे मेनिका के कमरे की तरफ आ रहे थे।

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

कदमों की आवाज़ अब मेरे बिल्कुल पास थी।

फिर अचानक…

मेरे ठीक ऊपर बिस्तर पर कोई बैठ गया।

गद्दा मेरे चेहरे के इतना पास दब गया कि मुझे लगा मेरी सांस बंद हो जाएगी।

फिर वही आदमी बोला—

सब तैयार है?

मेनिका ने धीमी आवाज़ में कहा—

हाँ… बस जल्दी करना होगा।

मेरे दिमाग में हजार सवाल घूम रहे थे।

ये लोग कौन थे?

और मेरी बेटी… इनके साथ क्या कर रही थी?

तभी उस आदमी ने कहा—

ठीक है… आज से सब शुरू होगा।

मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं।

लेकिन अगले ही पल मेनिका ने जो कहा…

उसे सुनकर मेरे शरीर में खून जम गया।

उसने कहा—

मम्मी को पता नहीं चलना चाहिए… कि वो अब इस घर में अकेली नहीं रहती।

और तभी…

किसी के पैर धीरे-धीरे बिस्तर के नीचे झुकने लगे।

जैसे ही किसी के पैर बिस्तर के नीचे झुकने लगे, मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
मैंने तुरंत अपनी सांस रोक ली।

अगर किसी ने मुझे देख लिया… तो क्या होगा?

अंधेरे में मुझे बस जूतों की परछाईं दिखाई दे रही थी।

वह आदमी झुककर नीचे देखने ही वाला था कि अचानक मेनिका ने जल्दी से कहा—

रुको… अभी नहीं।

वह आदमी सीधा खड़ा हो गया।

क्यों? उसने पूछा।

मेनिका की आवाज़ हल्की सी काँप रही थी।

क्योंकि… अगर मम्मी सच में घर पर होंगी… तो वो डर जाएंगी।

मेरे अंदर एक अजीब सा झटका लगा।

अगर मैं सच में घर पर हूँगी?

मतलब… मेनिका को शक था?

आदमी हल्का सा हँसा।

तुम्हारी मम्मी ऑफिस में हैं। तुमने खुद देखा है उन्हें जाते हुए।

कुछ सेकंड के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।

फिर मैंने और आवाज़ें सुनीं।

लग रहा था जैसे दो और लोग कमरे में घूम रहे हों।

मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ने लगे।

तभी मेनिका धीरे से बोली—

हमें जल्दी करना होगा… इससे पहले कि वो वापस आएं।

आदमी ने पूछा— सभी आ गए क्या?

दूसरी आवाज़ आई—

हाँ… बस एक बाकी है।

मेरी धड़कनें और तेज़ हो गईं।

कौन बाकी है?

तभी अचानक कमरे का दरवाज़ा फिर से खुला।

किसी के कदम अंदर आए।

और उस नई आवाज़ ने धीमे से कहा—

माफ करना… मुझे आने में देर हो गई।

वह आवाज़ सुनकर मेरा दिल जैसे रुक गया।

क्योंकि…

वह आवाज़ मेरे पति रोहन की थी।

लेकिन… यह कैसे हो सकता था?

रोहन की मौत तो दो साल पहले हो चुकी थी।

मेरे शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

मैं बिस्तर के नीचे जमी हुई पड़ी थी।

रोहन की आवाज़…?

यह नामुमकिन था।

मैंने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं।

शायद मैं गलत सुन रही थी।

लेकिन अगले ही पल मैंने मेनिका की खुश आवाज़ सुनी—

पापा… आप आ गए!

मेरी सांस अटक गई।

पापा…?

नहीं… यह सपना नहीं हो सकता।

मैंने हिम्मत करके बिस्तर के नीचे से थोड़ा सा सिर बाहर किया।

कमरे की फर्श पर मुझे कई पैरों की परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

उनमें से एक जोड़ी जूते… बिल्कुल वही थे…

जो रोहन अक्सर पहनता था।

मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा।

तभी वह आदमी बोला—सब तैयार है?

दूसरी आवाज़ आई—हाँ… आज से यह घर हमारा होगा।

मैंने डरते हुए फिर सुना।

मेनिका धीरे से बोली—लेकिन… मम्मी?

कुछ पल के लिए कमरे में खामोशी छा गई।

फिर वही आवाज़… जो रोहन की थी…

धीरे से बोली—

तुम्हारी मम्मी को अभी कुछ पता नहीं चलना चाहिए।

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

फिर वह और भी धीरे बोला—

वो अभी भी समझती है कि मैं मर चुका हूँ।

मेरे हाथ कांपने लगे।

मतलब… रोहन जिंदा है?

या…

कुछ और?

तभी किसी ने कमरे की लाइट बंद कर दी।

पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

और अंधेरे में मैंने साफ सुना—

मेनिका की धीमी आवाज़।

पापा… क्या आज मम्मी को भी हमारे बारे में बता देंगे?

कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

फिर रोहन की आवाज़ आई—

और वह पहले से भी ज्यादा ठंडी थी।

नहीं…

आज रात… उन्हें भी हमारे जैसा बनाना है।

और तभी…

मुझे महसूस हुआ कि किसी का हाथ धीरे-धीरे बिस्तर के नीचे मेरी तरफ बढ़ रहा है।

बिस्तर के नीचे मेरी तरफ बढ़ता हुआ हाथ अचानक रुक गया।

मेरा दिल इतना तेज़ धड़क रहा था कि मुझे लगा बाहर तक उसकी आवाज़ सुनाई दे रही होगी।

फिर किसी ने धीरे से कहा—

वो यहीं है।

मेरी सांस रुक गई।

अगले ही पल बिस्तर अचानक ऊपर उठा दिया गया।

मैं चीखते हुए बाहर खिसक गई।

मेरे सामने राधिका खड़ी थी… और उसके पीछे रोहन।

लेकिन उसे देखकर मेरे शरीर में ठंडक दौड़ गई।

वह बिल्कुल वैसा नहीं था जैसा मुझे याद था।

उसका चेहरा पीला था… आँखें अजीब तरह से खाली थीं… जैसे उनमें कोई भावना ही न हो।

मैंने कांपती आवाज़ में कहा—

रोहन…? तुम… जिंदा हो?

वह धीरे से मुस्कुराया।

लेकिन उसकी मुस्कान ठंडी थी।

जिंदा? उसने हल्की हंसी के साथ कहा।

नहीं अदिति… मैं जिंदा नहीं हूँ।

मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।

राधिका ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

उसकी पकड़ बर्फ जैसी ठंडी थी।

मम्मा… डरिए मत, उसने कहा।

मैंने डरते हुए पूछा—

ये सब क्या है?

रोहन धीरे-धीरे मेरे पास आया।

तुम्हें सच जानना चाहिए।

कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई।

जिस रात मेरी मौत हुई थी…

उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा—

मैं अकेला नहीं मरा था।

मेरे दिमाग में जैसे बिजली कौंध गई।

मतलब?

रोहन की आँखों में अजीब चमक थी।

उस रात… इस घर में और भी लोग मरे थे।

तभी कमरे के कोने में खड़े बाकी लोग धीरे-धीरे आगे आए।

और जब मैंने उनके चेहरे देखे…

तो मेरे शरीर से जैसे खून ही सूख गया।

क्योंकि…

वे सभी लोग वही थे जिनकी मौत इस बिल्डिंग में पिछले कुछ सालों में हुई थी।

और अब वे सब…

मेरे घर में खड़े थे।

मेरे सामने खड़े लोग धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगे।

उनके चेहरे पीले थे… आँखें खाली… और उनकी चाल अजीब थी।

मैंने डरकर राधिका का हाथ झटक दिया।

मेनिका… ये लोग कौन हैं?

लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया।

बस मुझे अजीब सी मुस्कान से देखती रही।

रोहन मेरे बिल्कुल सामने आकर रुक गया।

तुम्हें पता है अदिति… लोग मरने के बाद कहाँ जाते हैं?

मेरी सांसें तेज़ हो गईं।

मैं पीछे हटने लगी।

दूर रहो मुझसे…

लेकिन तभी मेनिका ने दरवाज़ा बंद कर दिया।

अब मैं कमरे में उन सबके बीच फंस चुकी थी।

रोहन ने धीरे से कहा—

कुछ लोग मरने के बाद चले जाते हैं…

और कुछ… यहीं रह जाते हैं।

कमरे की हवा और ठंडी हो गई।

हम सब… यहीं रहते हैं।

मेरे दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था।

लेकिन… मेनिका?

मेनिका धीरे-धीरे मेरे पास आई।

उसकी आँखों में अब वह मासूमियत नहीं थी।

मम्मा… आपको सच में याद नहीं?

मेरे दिल की धड़कन रुकने जैसी हो गई।

क्या?

राधिका की आवाज़ अब बहुत धीमी थी।

उस रात… जब पापा की मौत हुई थी…

आप भी वहीं थीं।  मेरे दिमाग में अचानक कुछ टूटी-फूटी यादें चमकने लगीं।

एक तेज़ ब्रेक…

एक जोरदार टक्कर…

और फिर अंधेरा।

राधिका की आँखों में आँसू आ गए। मम्मा… उस एक्सीडेंट में… उसकी आवाज़ काँप गई।

आप भी मर चुकी हैं। मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।

रोहन ने धीरे से कहा— हम पिछले दो साल से तुम्हारा इंतज़ार कर रहे थे… ताकि तुम्हें सच याद आ जाए।

कमरे में खड़े सभी लोग एक साथ मुस्कुराने लगे और तभी…

मुझे पहली बार एहसास हुआ— मैं कभी ऑफिस जाती ही नहीं थी।

क्योंकि…

मैं दो साल पहले ही मर चुकी थी।

 

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