नैना को अपनी शादी की तस्वीरें हमेशा अजीब लगती थीं। लाल जोड़े में सजी एक छोटी सी बच्ची… और उसके पास खड़ा एक दस-ग्यारह साल का लड़का।
लोग कहते थे — बचपन की रस्म थी… बस परंपरा निभाई गई थी।
पर नैना जानती थी — वो सिर्फ रस्म नहीं थी। उसका नाम किसी के नाम से जोड़ दिया गया था, जिसे वो न अच्छे से जानती थी और न पहचानती थी।
शादी के बाद उसे ससुराल नहीं भेजा गया। उसके ससुराल वालों ने साफ कहा था,पहले इसे पढ़ाएँगे-लिखाएँगे… अपने पैरों पर खड़ा करेंगे।
नैना अपने मायके में ही पली-बढ़ी। पढ़ाई में तेज थी, सपने बड़े थे।
साल बीत गए। वह अब 21 साल की हो चुकी थी। उसे आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर भेज दिया गया।
जाते वक्त माँ ने बस इतना कहा,
“रिश्ते मज़ाक नहीं होते, नैना। कुछ फैसले हमसे पहले हो जाते हैं। क्योकि उसकी माँ को ड़र था कि कही जवान बेटी बहक ना जाए और बच्पन में निभाई रस्त एक मजाक ना बन जाए।
नैना ने मुस्कुराकर बात टाल दी। उसके लिए वो शादी बस एक पुरानी तस्वीर थी… जिसे वो पहचानती तक नहीं थी और जिससे उसका कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं था।
नया शहर। नया कॉलेज। नई ज़िंदगी।
पहले ही दिन उसे एहसास हुआ — कोई उसे लगातार देख रहा है।
कॉरिडोर में, लाइब्रेरी में, कैंटीन में…
एक लड़का।
गहरी आँखें। हल्की सी मुस्कान। और अजीब सा सुकून उसके चेहरे पर।
नैना ने खुद से कहा —
मुझे किसी झंझट में नहीं पड़ना।
उसे नहीं पता था…
ये झंझट नहीं, उसकी किस्मत थी।
और शायद… उसका अतीत भी।
कॉलेज का एक हफ्ता बीत चुका था।
और वो लड़का — आरव — हर जगह मौजूद था, बस दूर से एक टक नैना को देखता रहता था और नैना को भी इसका एहसास था।
नैना ने उसका नाम खुद नहीं पूछा था। क्लास की लड़कियाँ फुसफुसा कर बताती थीं, वो बहुत सीरियस टाइप है… किसी से ज्यादा बात नहीं करता।
लेकिन नैना से… वो बात करने की कोशिश जरूर करता था।
हाय, तुम नई हो न? उसने एक दिन लाइब्रेरी के बाहर पूछा।
नैना ने बिना देखे जवाब दिया, हाँ… और मुझे जल्दी है।
वो मुस्कुराया।
तुम हमेशा जल्दी में क्यों रहती हो?
उसके इस सवाल ने नैना को पल भर के लिए रोक दिया।
उसे खुद नहीं पता था कि वो क्यों भाग रही है — शायद उस रिश्ते से… जो उसके नाम से जुड़ा हुआ था। क्योकि कही न कही ड़र उसे भी था कि मुझे प्यार न हो जाए।
आरव ने भी कभी ज़बरदस्ती नहीं की। बस आसपास रहता।
कभी नोट्स दे देता।
कभी कैंटीन में सीट बचाकर रख देता।
कभी बिना वजह छाता पकड़ा देता।
नैना परेशान भी होती… और अजीब तरह से सुरक्षित भी महसूस करती।
एक दिन कॉलेज फेस्ट में अचानक लाइट चली गई। भीड़ में धक्का-मुक्की शुरू हो गई।
नैना का हाथ किसी ने कसकर पकड़ा। नैना चीखने ही वाली थी कि एक आवाज़ आई-
डरो मत… मैं हूँ।
वही आवाज़। वही सुकून।
जब लाइट वापस आई, वो उसके सामने खड़ा था।
नैना ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा।
और उस पल उसे अजीब सा एहसास हुआ —
जैसे वो उसे पहले से जानती हो।
पर कैसे?
उसे नहीं पता था —
कुछ रिश्ते दिल से पहले किस्मत पहचान लेती है।
नैना ने तय कर लिया था कि वह आरव से दूरी बनाए रखेगी। उसे किसी भी रिश्ते में उलझना नहीं था। उसकी ज़िंदगी पहले से ही एक ऐसे बंधन से बंधी थी जिसे उसने कभी चुना नहीं था। लेकिन अजीब बात यह थी कि जितना वह आरव से दूर रहने की कोशिश करती, उतना ही वह उसके आसपास दिखाई देता — बिना ज़बरदस्ती, बिना दबाव, बस चुपचाप मौजूद।
एक दिन लाइब्रेरी में नैना अपनी बचपन की शादी से जुड़ी एक पुरानी फाइल देख रही थी, जो उसकी माँ ने उसे शहर आने से पहले दी थी। उसमें कुछ कागज़, एक धुंधली तस्वीर और एक नाम था — अंश। यही नाम उस लड़के का था जिससे उसकी शादी हुई थी। उसे बस इतना पता था कि वह अब विदेश में पढ़ रहा है और परिवार ने कहा था कि सही समय आने पर सब तय होगा।
उसी वक्त आरव सामने आकर बैठ गया। उसने बिना पूछे कहा, कुछ ढूँढ रही हो… या किसी से भाग रही हो?
नैना चौंक गई। उसने फाइल बंद कर दी। तुम्हें हर बात जाननी ज़रूरी है?
आरव ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, नहीं… बस तुम्हारी आँखें बता देती हैं कि तुम अंदर से उलझी हुई हो।
उसकी बात सीधे दिल में लगी। नैना पहली बार थोड़ा खुली। उसने बस इतना कहा, मेरी ज़िंदगी में कुछ फैसले मेरे बिना लिए गए थे।
आरव की आँखों में एक पल के लिए गहराई उतर आई, जैसे वह उस सच्चाई को जानता हो। पर उसने कुछ नहीं कहा।
उस रात नैना ने खुद से पूछा — क्या वह सच में आरव से दूर रहना चाहती है? या वह उस रिश्ते से भाग रही है जो नाम से तो जुड़ा है… पर दिल से नहीं?
उसे नहीं पता था, असली उलझन अभी शुरू हुई थी।
कॉलेज ट्रिप का ऐलान हुआ। सभी छात्रों को पास के हिल स्टेशन जाना था। नैना ने पहले मना कर दिया, पर उसकी रूममेट्स के ज़ोर देने पर वह मान गई। सफर के दौरान बस में बैठते ही उसने देखा — आरव ठीक उसके सामने वाली सीट पर था। उसने कुछ नहीं कहा, बस हल्का-सा सिर हिलाया।
पहाड़ों की ठंडी हवा और रास्तों की खामोशी में कुछ बदलने लगा था। एक शाम सब लोग बोनफायर के आसपास बैठे थे। गाने चल रहे थे, हँसी-मज़ाक हो रहा था। अचानक किसी ने मज़ाक में पूछा, नैना, तुम्हारी शादी हुई है क्या?
उसका दिल एक पल को थम गया। उसने धीरे से कहा, हाँ… बचपन में।
चारों तरफ हल्की हँसी गूँज गई। किसी ने कहा, ये भी कोई शादी होती है?
पर आरव चुप था। उसकी नज़रें सिर्फ नैना पर थीं।
रात को होटल की बालकनी में नैना अकेली खड़ी थी। आरव पास आया और धीमे से बोला, अगर तुम्हें कभी लगे कि वो रिश्ता सिर्फ नाम का है… तो क्या तुम अपने लिए नया फैसला कर पाओगी?
नैना ने उसकी तरफ देखा। तुम क्यों पूछ रहे हो?
वह कुछ सेकंड चुप रहा, फिर बोला, क्योंकि हर रिश्ता समझौता नहीं होता… कुछ मोहब्बत भी बन सकते हैं।
उसकी आवाज़ में अजीब-सी सच्चाई थी।
नैना का दिल पहली बार खुलकर धड़कने लगा। उसे लगा जैसे वह इस लड़के को बहुत पहले से जानती है — उसकी आदतें, उसकी खामोशी, उसकी नज़रें।
लेकिन कैसे?
उसके कमरे में लौटने के बाद उसने अपनी पुरानी फाइल दोबारा खोली। तस्वीर को गौर से देखा। लड़का छोटा था, चेहरा साफ नहीं दिख रहा था…
पर उसकी आँखें —
कुछ जानी-पहचानी सी लगीं।
हिल स्टेशन से लौटने के बाद नैना बेचैन रहने लगी। उसकी नींद टूट-टूट कर आती, और हर बार उसे वही आँखें याद आतीं — आरव की आँखें… और बचपन की तस्वीर वाली आँखें। उसने खुद को समझाया कि यह सिर्फ वहम है। लेकिन दिल तर्क नहीं मान रहा था।
एक दिन कॉलेज में प्रोजेक्ट सबमिशन के बाद आरव ने उसे रोका। उसके हाथ में एक पुराना-सा लिफाफा था। उसने बिना कुछ कहे वह नैना को दे दिया। शायद अब तुम्हें ये जानना चाहिए, उसने बस इतना कहा।
नैना के हाथ काँपने लगे। लिफाफे के अंदर एक फोटो थी — वही बचपन वाली शादी की तस्वीर… पर इस बार साफ प्रिंट में। और पीछे लिखा था — नैना और अंश।
उसकी साँसें अटक गईं। उसने धीरे-धीरे नज़र उठाई। ये तुम्हारे पास कैसे…?
आरव — या शायद अंश — हल्का-सा मुस्कुराया। क्योंकि मैं भागा नहीं था, नैना। मैं इंतज़ार कर रहा था… सही वक्त का।
नैना की आँखों में हैरानी, गुस्सा और राहत सब एक साथ उतर आए। तो तुम शुरू से सब कुछ जानते थे? और तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?
वह शांत स्वर में बोला, अगर पहले दिन बता देता, तो क्या तुम मुझे जान पाती? या सिर्फ उस बचपन के समझौते को देखती?
नैना के पास जवाब नहीं था। वह सोच रही थी — क्या यह धोखा था? या उसे अपनी मर्ज़ी से चुनने का मौका देना?
अंश ने धीरे से कहा, मैं चाहता था कि अगर तुम मुझसे प्यार करो… तो मेरे नाम से नहीं, मुझसे करो।
उस पल नैना की सबसे बड़ी उलझन सामने थी — क्या यह किस्मत थी… या एक खूबसूरत सच्चाई?
नैना पूरी रात सो नहीं पाई। उसके सामने दो सच थे — एक वो रिश्ता जो बचपन में तय हुआ था, और दूसरा वो एहसास जो उसने खुद महसूस किया था। फर्क बस इतना था कि दोनों एक ही इंसान से जुड़े थे।
सुबह उसने अंश को कैंपस के उसी पुराने पेड़ के पास बुलाया, जहाँ वे अक्सर मिलते थे। अंश शांत खड़ा था, जैसे फैसले का इंतज़ार कर रहा हो।
नैना उसके सामने आकर रुकी। तुमने मुझसे सच छुपाया… ये गलत था, उसने साफ कहा।
अंश ने सिर झुका दिया। हाँ। पर मैं तुम्हें मजबूर नहीं करना चाहता था।
कुछ पल की खामोशी के बाद नैना हल्का-सा मुस्कुराई। शायद अगर तुम पहले बता देते… तो मैं तुमसे नफ़रत कर बैठती। और शायद कभी ये जान ही नहीं पाती कि मैं तुम्हें दिल से पसंद करती हूँ।
अंश ने उसकी ओर देखा — उम्मीद से भरी आँखों से।
नैना ने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया। मैं किसी समझौते से नहीं… अपनी मर्ज़ी से तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ मेरे आरव।
हवा में एक अजीब-सी हल्की राहत घुल गई।
तो ये मोहब्बत है? अंश ने मुस्कुराकर पूछा।
नैना ने जवाब दिया, नहीं… ये मेरा फैसला है। और शायद यही असली मोहब्बत है।
उस दिन पहली बार उसे अपनी बचपन की शादी बोझ नहीं लगी। क्योंकि अब वह किसी रस्म का परिणाम नहीं थी — बल्कि उसके अपने दिल का चुनाव थी।
कुछ रिश्ते किस्मत तय करती है…
पर उन्हें मोहब्बत बनाना हमारे हाथ में होता है।

