मेरी शादी की रात मैं अपने ही क़ातिल के साथ सोया था

शादी की रात हर किसी के लिए एक नई शुरुआत होती है, लेकिन मेरे लिए वो रात किसी पुरानी कहानी का आख़िरी पन्ना लग रही थी। कमरा सजाया हुआ था, रोशनी मुलायम थी, और वो मेरे सामने बैठी थी—शांत, खूबसूरत, बिल्कुल वैसी जैसी किसी सपने में होती है। फिर भी मेरे भीतर एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे मैं इस पल का हिस्सा नहीं, गवाह हूँ। उसकी आँखों में देखकर मुझे अपनापन नहीं, पहचान महसूस हो रही थी। जैसे मैं उसे जानता हूँ, लेकिन इस ज़िंदगी से पहले से। जैसे ही वो मेरे पास आई, मेरे सीने में एक हल्का-सा दर्द उठा, ऐसा दर्द जो शरीर का नहीं,किसी की खूबसुरत यादों का होता है। उसी पल मेरे दिमाग़ में एक टूटी-फूटी तस्वीर उभरी—अंधेरा, सांस की घुटन, और वही चेहरा। मैं समझ नहीं पाया कि ये डर है या स्मृति, लेकिन उस रात पहली बार मुझे लगा कि ये शादी किसी शुरुआत के लिए नहीं, किसी सच्चाई को ढकने के लिए है।

अगले दिनों में वो मुझे बहुत संभालकर छूती थी, जैसे कोई ज़ख़्म छुपा रही हो। उसका प्यार दिखावटी नहीं था, बल्कि बहुत गहरा, बहुत सावधान था। लेकिन उसी सावधानी में मुझे अपराध की गंध आने लगी। जब भी वो मुझे देखती, उसकी आँखों में मोह से ज़्यादा राहत होती, जैसे वो हर सुबह ये देखकर सुकून महसूस करती हो कि मैं अब भी ज़िंदा हूँ। और यहीं से वो यादें लौटने लगीं—बिखरी हुई, अधूरी, लेकिन दर्दनाक। मुझे याद आने लगा कि मैंने कभी इस चेहरे पर भरोसा किया था, अंधेरे में भी। और उसी भरोसे ने मुझे ज़मीन पर गिराया था। अब सवाल ये नहीं था कि मैं उससे प्यार करता हूँ या नहीं, सवाल ये था कि क्या मैं उससे पहले भी प्यार करता था— मतलब मरने से पहले।

उस रात नींद टूटते ही मेरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था, लेकिन डर से ज़्यादा हैरानी थी। अब तक जो यादें धुंधली थीं, वो अचानक एक दिशा लेने लगी थीं। मुझे साफ़ दिखने लगा कि वो हादसा नहीं था, जिसमें मैं मरा था, बल्कि एक अधूरा क़त्ल था। अंधेरे कमरे की दीवारें, गीली ज़मीन, और मेरे सीने पर रखा हुआ वही हाथ—नर्म, लेकिन जानलेवा। वो हाथ किसी दुश्मन का नहीं था, बल्कि उसी का था जिसे मैं सबसे ज़्यादा चाहता था, हाँ वो मेरी बीवी का हाथ था।

मुझे याद आया कि उस रात भी उसने मुझे ऐसे ही देखा था—शांत, बिना घबराहट के। फर्क बस इतना था कि तब उसकी आँखों में डर था, और आज उनमें सुकून। जैसे तब वो कुछ करने को मजबूर थी, और अब वो उस गलती को ठीक कर रही हो। मेरे सीने पर जो दर्द उठा था, वो किसी हथियार का नहीं, बल्कि भरोसे के टूटने का था। मैं मरा नहीं था, बस छोड़ा गया था—ऐसे हाल में कि मौत और ज़िंदगी के बीच फँस जाऊँ।

अब ये साफ़ होने लगा था कि मेरी यादें लौटना कोई संयोग नहीं है। वो अधूरा क़त्ल अब पूरा होना चाहता है, या शायद सच सामने आना चाहता है। और इस बार मैं सोया हुआ नहीं हूँ। इस बार मैं देख रहा हूँ, समझ रहा हूँ, और सबसे ख़तरनाक बात—मैं महसूस भी कर रहा हूँ कि कहीं न कहीं, मैं अब भी उससे प्यार करता हूँ।

अब मेरे दिन दो हिस्सों में बँट चुके थे—एक वो जो मैं सबके सामने जीता था, और दूसरा वो जो सिर्फ़ मेरे अंदर पल रहा था और जिसे मैं अकेला जीता था। बाहर से सब कुछ सामान्य था, शादीशुदा ज़िंदगी की वही दिनचर्या, वही मुस्कानें, वही अपनापन। लेकिन अंदर एक लगातार बढ़ता हुआ शक था, जो हर छूने को सवाल बना देता था। जब वो मेरे पास होती, तो दिल अजीब तरह से शांत भी होता और बेचैन भी। जैसे कोई ज़हर मीठे पानी में घुल गया हो। मैं उसे खुदसे दूर करना चाहता था, लेकिन हर कोशिश में मैं खुद उसकी तरफ़ खिंचता चला जाता था जैसे कोई ड़ोर उसने मुझसे बांध ली हो।

मुझे एहसास होने लगा कि प्यार और शक एक-दूसरे के दुश्मन नहीं होते। वो साथ-साथ चलते हैं, खासकर तब जब अतीत अधूरा हो। कभी उसकी हथेलियों की गर्मी मुझे भरोसा देती, तो कभी उसी स्पर्श में वो रात लौट आती जहाँ मेरा शरीर एकदम ठंडा पड़ रहा था। सबसे डरावनी बात ये थी कि मैं इतना कुछ जानने के बाद और महसूस करने के बाद भी उससे नफ़रत नहीं कर पा रहा था। जितना ज़्यादा सच सामने आने की आहट मिलती, उतना ही मेरा दिल उसे बचाने के बहाने ढूँढने लगता।

अब ये साफ़ था कि ये शादी सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं, बल्कि एक समझौता है—ज़िंदगी और मौत के बीच का समझौता। और मैं बीच में खड़ा ये सोच रहा था कि अगर उसने मुझे सच में मारा था, तो क्या मैं अब भी उसी से प्यार कर सकता हूँ जो मेरी कातिल थी। या शायद यही प्यार उसकी सबसे बड़ी सज़ा बनने वाला था।

अब शक सिर्फ़ मेरे दिमाग़ तक सीमित नहीं रहा, वो घर के हर कोने में धीरे धीरे फैलने लगा था। छोटी-छोटी चीज़ें, जिन पर पहले कभी ध्यान नहीं दिया गया था, अब मुझे बुरी तरह चुभने लगी थीं। मेरी हालत इतनी खराब हो गई थी और बेचैनी इस कदर बड़ गई थी कि, मेरी दवाइयों की अलमारी में रखी कुछ गोलियाँ, जिनका इस्तेमाल किसी बीमारी से ज़्यादा किसी नींद के लिए किया जाता है। रसोई में पड़े वो चाकू, जिनकी धार हमेशा ज़रूरत से ज़्यादा तेज़ लगती थी। और सबसे डरावनी बात को ये थी कि—उसकी आदतें, जो बिल्कुल वैसी ही थीं बदली नहीं थी जैसी मुझे उस अधूरी रात से वापस याद आने लगी थीं।

अब मुझे समझ आने लगा कि वो मुझे मारना नहीं चाहती थी, बल्कि रोकना चाहती थी। किसी ऐसी सच्चाई से, जो अगर उस रात पूरी तरह सामने आ जाती, तो शायद हम दोनों पूरी तरह से बर्बाद हो जाते। मेरी हालत, मेरी अधूरी मौत, सब किसी योजना का हिस्सा थे—ऐसी योजना जिसमें मुझे ज़िंदा रहना ज़रूरी था, लेकिन मेरी यादों के बिना।

सबूत अब सिर्फ़ चीज़ों में नहीं थे, मेरे अंदर भी थे। मेरा शरीर कुछ चीज़ों पर बिना सोचे प्रतिक्रिया करता था, जैसे ख़तरे को पहले ही पहचान लेता हो। ये वही instincts थे, जो उस रात मुझे बचा नहीं पाए थे। और अब, हर गुजरते दिन के साथ, वो सबूत और ज़्यादा स्पष्ट होते जा रहे थे।

सबसे बड़ा खतरा ये नहीं था कि मुझे सच मिल जाएगा। खतरा तो ये था कि सच मिलने के बाद भी मैं उसे छोड़ नहीं पाऊँगा। क्योंकि जितना मैं उसके अतीत को समझ रहा था, उतना ही मैं उसके साथ खड़ा होने के बहाने ढूँढ रहा था।

जिस दिन सब कुछ साफ़ हुआ, उस दिन मुझे एहसास हुआ कि मैं सिर्फ़ सच के पीछे नहीं भाग रहा था, बल्कि उसी रात की तरफ़ लौट रहा था जिसे कभी जीकर भी पूरा नहीं जी पाया। यादें अब टुकड़ों में नहीं थीं, पूरी तस्वीर बन चुकी थी।

दरसल उसके अतीत की एक परत धीरे-धीरे मेरे सामने खुलने लगी, बिना किसी सबूत के, सिर्फ़ एहसासों के सहारे। मुझे याद आया कि शादी से पहले भी एक लड़की की चर्चा होती थी—उसके कॉलेज की, उसकी सबसे क़रीबी दोस्त। कहा गया था कि वो लड़की अचानक गायब हो गई थी। पुलिस ने इसे आत्महत्या कहा, परिवार ने चुप्पी ओढ़ ली, और शहर ने जल्दी भूल जाना बेहतर समझा। लेकिन अब मुझे समझ आने लगा कि कुछ मौतें इसलिए आत्महत्या कहलाती हैं क्योंकि कोई उन्हें साबित नहीं करना चाहता।

यादों में वो लड़की डरती हुई नहीं थी, बल्कि उलझी हुई थी। वो किसी ऐसे सच के बहुत क़रीब थी, जो सामने आ जाता तो एक से ज़्यादा ज़िंदगियाँ बर्बाद हो जातीं। उसी रात, जब सबने कहा कि वो लड़की अकेली थी, असल में कोई और भी मौजूद था। वही परिचित सावधानी, वही ज़्यादा प्यार दिखाने वाली आदत, वही ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान। सब कुछ अब जुड़ने लगा था। वो लड़की मरी नहीं थी, उसे चुप कराया गया था।उस लड़की ने आत्महत्या नहीं की थी। वो उस रात भागना चाहती थी। उसने मेरे सामने रोते हुए बताया था कि उसने गलती से एक गैरकानूनी लेन-देन के सबूत देख लिए थे—पैसों, दवाइयों और मौतों से जुड़ा एक खेल, जिसमें मेरी पत्नी का नाम सिर्फ़ शामिल नहीं था, बल्कि सबसे ऊपर था। उस लड़की को चुप कराने का तरीका वही था जो बाद में मेरे लिए चुना गया—पहले भरोसा, फिर नशा, फिर एक ऐसा हाल कि मौत और ज़िंदगी के बीच कोई फर्क न बचे। फर्क बस इतना था कि वो लड़की उस रात बच नहीं पाई, और मैं बच गया। और जिस तरह उसे चुप कराया गया, वही तरीका बाद में मेरे लिए दोहराया गया—बस इस बार गलती ये हुई कि मैं पूरी तरह मरा नहीं। अब साफ़ हो चुका था कि मैं उसकी पहली ग़लती नहीं था। मैं बस उसकी सबसे लंबी छुपाई गई कहानी था।

उस सच को समझते ही मेरे अंदर जैसे कुछ टूट सा गया हो। क्योंकि जो मैंने याद किया था, वो अधूरा नहीं था—बस दबा दिया गया था कुछ समय के लिए। उस रात मैंने खुद को खत्म करने की कोशिश नहीं की थी। बल्कि ये कहानी तो उसने मेरे लिए गढ़ी थी, ताकि वो खुद को सबसे सामने मासूम साबित कर सके। असलियत ये थी कि मैंने एक ऐसी सच्चाई देख ली थी, जो उसकी ज़िंदगी को पूरी तबाह कर सकती थी। और उस सच्चाई को रोकने का सबसे आसान तरीका था—मुझे हमेशा के लिए चुप करा देना। उस रात उसके हाथ नर्म नहीं थे, और ना ही वो थरथर कांप रहे थे। वो बहुत अच्छे से जानती थी कि वो क्या कर रही है। दवाइयाँ नींद के लिए नहीं थीं, वो धीरे-धीरे मेरी जान लेने के लिए थीं। मुझे मरा हुआ नहीं, बल्कि ज़िंदा लेकिन बेआवाज़ छोड़ना उसकी सबसे बड़ी गलती थी। उसे लगा इतनी आसानी से वो कांड़ कर देगी और किसी को कांनो-कान खबर भी नहीं होगी

लेकिन उसकी किसमत इतनी भी अच्छी नहीं थी,और अब तो मुझे ये भी समझ आ गया कि ये शादी प्यार नहीं थी, ये निगरानी थी। वो हर सुबह मुझे ज़िंदा देखकर राहत महसूस नहीं करती थी, बल्कि ये पक्का करती थी कि मैं अब भी वही इंसान हूँ—जिसे कुछ भी याद नहीं है और इसे का शुक्र वो मनाती थी। लेकिन यादें लौट आई थीं, और उनके साथ लौट आया था वो डर जो उसकी आँखों में अब साफ़ दिखने लगा था।

अगली सुबह बिस्तर खाली नहीं था—वो भाग चुकी थी। शायद इसलिए नहीं कि उसे पछतावा था, बल्कि इसलिए क्योंकि उसे पता चल गया था कि इस बार मैं सोया हुआ नहीं हूँ। और अब अगर कोई मरेगा, तो वो सच नहीं—बल्कि वो इंसान होगा जिसने सच को दबाने की कोशिश की थी।

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