शाम की लोकल ट्रेन में कुछ लोग रोज़ चढ़ते हैं, कुछ रोज़ उतरते हैं और देखा जाए तो ये रोज़ की जिंदगी का आम सा हिस्सा है लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो किसी स्टेशन पर नहीं उतरते— बस एक याद में अटक जाते हैं।
अर्जुन भी उन्हीं में से था।
हर शाम वो वही ट्रेन पकड़ता, वही आख़िरी डिब्बा, और वही दरवाज़े के पास खड़ा रहता रोजमररा उस रास्ते पर चलने वाले लोग समझते थे उसे भीड़ पसंद है। पर सच ये था— उसे अकेलापन भीड़ में आसान लगता था। वो कुछ बोलता नहीं था ना कभी फोन पर हँसता था। बस खिड़की से बाहर देखता रहता जैसे कुछ ढूँढ रहा हो रोज़ की इस भीड़ में।
पहले हफ्ते किसी ने ध्यान नहीं दिया। दूसरे हफ्ते लोगों ने नोटिस किया—
वो हर दिन आख़िरी स्टेशन पर नहीं उतरता।
ट्रेन खाली हो जाती, लाइट्स धीमी पड़ जातीं, और अर्जुन तब भी वही खड़ा रहता है।
गार्ड ने एक दिन पूछा— उतरोगे नहीं बेटा?
अर्जुन ने हल्की आवाज़ में कहा— जिसके लिए उतरता था… वो अब नहीं आती।
उस रात जब ट्रेन आख़िरी स्टेशन पहुँची, तो डिब्बा खाली था। बस अर्जुन था और उसकी जेब में एक पुराना टिकट— तीन साल पुराना।
उसी तारीख़ का जिस दिन किसी ने उसी ट्रेन से लौटना बंद कर दिया था और अर्जुन को पता भी नहीं था कि जिस कहानी को वो रोज़ जी रहा है—
वो असल में किसी और की अधूरी मौत से जुड़ी है।
अगले दिन, अर्जुन फिर उसी ट्रेन में चढ़ा।
वही डिब्बा।
वही दरवाज़ा।
वही खामोशी।
उसने खुद से वादा किया था—आज इंतजार का अंत कर देगा आख़िरी स्टेशन पर उतर जाएगा और अब किसी का इंतज़ार नहीं करेगा।
लेकिन जैसे ही ट्रेन चली, उसे लगा जैसे कोई उसकी बाजू से हल्का-सा टकराया है और उसके स्पर्श में पहचान थी। अर्जुन ने पलटकर देखा तो कोई नहीं था बस भीड़ और शोर था पर उसके आसपास एक खालीपन था जो अजीब तरह से भरा हुआ लग रहा था।
फिर तीसरे स्टेशन पर एक लड़की चढ़ी।
साधारण कपड़े, गले में पहचान-पत्र, और आँखों में ऐसी थकान जो रोज़ की नहीं लगती। वो उसी सीट पर बैठी जहाँ कोई महीनों से नहीं बैठा था। अर्जुन का दिल बिना वजह तेज़ हो गया। वो उसे देख नहीं रहा था— पर उसकी मौजूदगी उसे महसूस हो रही थी की तभी अचानक लड़की ने बिना देखे कहा— तुम रोज़ यहीं खड़े रहते हो, है ना?
अर्जुन ने चौंक कर धीमे से हाँ बोला।
वो मुस्कुराई नहीं।
बस बोली— कुछ लोग जगह बदलते हैं पर वजह नहीं।
ट्रेन की लाइट एक पल को झपकी और जब लाईट आई तो अर्जुन चौंक गया क्योकि सीट खाली थी और वो लड़की हल्की सी झपक में ही गायब हो गई थी। अजुर्न ये सब सोच ही रहा था कि उसे अपनी जेब में एक कागज़ मिला।
उसमें लिखा था—कल मिलेंगे… अगर तुम उतरने की हिम्मत करोगे,और अर्जुन समझ गया अब ये इंतज़ार उसकी मर्ज़ी से नहीं चल रहा था। अर्जुन उस रात घर नहीं गया पहली बार उसने एसा किया जिसे देखकर सब लोग हैरान रह गए क्योकि आज वो वो आख़िरी स्टेशन पर उतर गया था और उतरने के बाद वो वही घंटो प्लैटफोम में खड़ा रहा। धीरे धीरे स्टेशन खाली। दुकानें बंद। लाइटें पीली और थकी हुई होने लगी।
उसके हाथ में वो काग़ज़ था जो उसकी जेब में खुद-ब-खुद आ गया था।
अगर तुम उतरने की हिम्मत करोगे…
उसे नहीं पता था वो किससे मिलने आया है, या किससे भाग रहा है। तभी पीछे से किसी ने कहा—“इतनी देर लगा दी।” अर्जुन पलटा तो वही लड़की थी।
अब वो ट्रेन जैसी नहीं लग रही थी। ज़्यादा असली। ज़्यादा पास।
तुम्हारा नाम?
अर्जुन ने पूछा।
वो कुछ सेकंड चुप रही।
फिर बोली—
साया।
अर्जुन मुस्कुराया और बोला ये तो कोई नाम नहीं होता। वो भी हल्की-सी मुस्कुराई— जो पूरा सच न हो, वही नाम होता है। उसने अर्जुन की तरफ देखा और कहा—तुम मुझे पहले से जानते हो, अर्जुन ने बिल्कुल अंजान बनकर कहा नहीं तो, क्योकि सच में वो चेहरा उसके लिए अंजान था।
जानते हो,
उसने तिलमिला कर दोहराया,
बस याद नहीं।
अचानक स्टेशन की लाइट बुझ गई। अंधेरे में अर्जुन ने महसूस किया कोई उसका हाथ पकड़े हुए है और ये हाथ गरम नहीं और ठंडा भी नहीं बस खालीपन लगा। लाइट वापस आई और अब साया वहाँ नहीं थी लेकिन ज़मीन पर एक पुराना पहचान-पत्र पड़ा था। तस्वीर धुंधली थी और नाम साफ़ नहीं था। तारीख़ दिख रही थी वो भी तीन साल पहले की और नीचे लिखा था—
स्थिति: मृत घोषित।
अर्जुन की साँस अटक गई। क्योंकि तस्वीर में वो चेहरा वही था जो उसे रोज़ ट्रेन में मिलता था। अर्जुन उस पहचान-पत्र को कई मिनट तक देखता रहा उसपर नाम धुंधला था, पर चेहरा…
जाना-पहचाना, बहुत जाना-पहचाना सा था।
उसे लगा जैसे दिमाग़ का कोई बंद दरवाज़ा हल्का-सा खड़काया गया हो। अगली सुबह वो सीधे नगर निगम के पुराने रिकॉर्ड ऑफिस पहुँचा। वहा धूल, पुरानी फाइलें, और दीवारों पर चिपकी भूली हुई तारीख़ें थी।
एक क्लर्क ने उसे बिना देखे कहा तीन साल पुराना केस चाहिए तो सब्र रखना पड़ेगा और सब्र अर्जुन के पास था। डर भी। उसके बाद फाइल खुली।
नाम: सिया मल्होत्रा
उम्र: 23
स्थिति: ट्रेन दुर्घटना में मृत
ये पड़ते ही अर्जुन की उँगलियाँ काग़ज़ पर काँप गईं क्योकि दुर्घटना की तारीख़ वही थी जो उसके जेब में पड़े पुराने टिकट पर पुछले तीन साल से लिखी हुई थी। तभी उसके सिर में एक तस्वीर चमकी— बारिश, भीगी हुई ट्रेन, और एक लड़की जो दरवाज़े पर खड़ी थी।
की तभी हाथ मत छोड़ना, किसी की आवाज़ आई और वो अर्जुन की ही अपनी आवाज़ थी। वो कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और उसे याद आया उस दिन उसने आख़िरी स्टेशन पर किसी का हाथ छोड़ा था। और आज वो हाथ इतने सालो बाद वापस रास्ता माँग रहा था।
शाम को जब ट्रेन चली, अर्जुन ने पहली बार कहा— सिया…
खिड़की में उसका अक्स मुस्कुराया और बोला— अब याद आया?
उस रात अर्जुन ने ट्रेन की खिड़की से बाहर देखना छोड़ दिया। क्योकि अब वो सिया को सीधे देख रहा था।
तुम मरी नहीं थी,
उसने कहा।
तुम छूटी थी।
सिया कुछ देर चुप रही। फिर बोली— मैंने तुम्हारा बहुत इंतज़ार किया था अर्जुन। ये कहते वक्त उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी। बस थकान थी।
तीन साल पहले वो दोनों उसी ट्रेन में थे, बारिश तेज़ थी और दरवाज़ा खुला था। भीड़ ने धक्का दिया और सिया फिसल गई।
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ा था लेकिन तभी किसी ने पीछे से चिल्लाया— अगर गिरे तो तुम भी उसके साथ जाओगे!
एक पल, सिर्फ़ एक पल और अर्जुन ने अपनी पकड़ ढीली कर दी कि तभी सिया गिर गई। ट्रेन चलती रही।
आज, अर्जुन की आँखें भर आईं।
मैं डर गया था, उसने कहा मैंने सोचा था कोई और पकड़ लेगा। सिया ने धीरे से कहा— सब यही सोचते हैं।
ट्रेन की लाइट झपकी और अर्जुन का दिल सहम गया। मैं तुम्हें डराने नहीं आई, सिया बोली। मैं बस ये जानना चाहती थी— क्या तुम अब भी उतरने की हिम्मत रखते हो?
अगला स्टेशन आया और अर्जुन पहली बार बिना डर के खड़ा हुआ। दरवाज़े खुले और सिया ने उसकी तरफ देखा— ऐसी नज़र से जैसे अब फैसला उसके हाथ में था। दरवाज़े खुले थे। ठंडी हवा डिब्बे में भर गई औरअर्जुन बाहर उतर गया।
स्टेशन वैसा ही था— पीली लाइटें, खामोश प्लेटफ़ॉर्म, और इंतज़ार में खड़ा समय कि तभी वो मुड़ा। सिया अब भी ट्रेन के अंदर थी।तुम नहीं आओगी? अर्जुन ने पूछा। सिया ने सिर हिलाकर कहा मेरा स्टेशन यही था, मैं बस यहीं तक आ सकती थी। अर्जुन की आँखें भर आईंऔर पछतावे के साथ उसने कहा मुझे माफ़ कर दो, मै कायर था मैंने उस दिन डर को चुना।
सिया ने पहली बार पूरी मुस्कान दी औऱ उसने कहा, आज तुम नहीं डरे, मेरे लिए यही काफ़ी है।
ट्रेन ने सीटी दी और सिया धीरे-धीरे धुँध में घुलने लगी।
अब तुम क्या करोगे?
उसने पूछा।
अर्जुन ने जवाब दिया—
रुकूँगा नहीं।
और इतने में ट्रेन चल पड़ी। डिब्बा बिल्कुल खाली था। अर्जुन प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा रहा जब तक आवाज़ें दूर नहीं हो गईं। उसने जेब में हाथ डाला जेब में रखा पुराना टिकट अब सादा काग़ज़ था। अगली सुबह अर्जुन ने दूसरी ट्रेन पकड़ी।
पहली बार आख़िरी स्टेशन नहीं।
क्योंकि कुछ लोग साथ चलने नहीं आते—
बस ये सिखाने आते हैं कि कहाँ उतरना है। और अर्जुन अब उतर चुका था।
भले ही ये प्रेम कहानी अधूरी थी, लेकिन इस हादसे से अर्जुन समझ चुका था कि आज के बाद किसी अपने का हाथ कायरता से नही छोड़ना है।
मैं अन्वी हूँ। शब्द मेरे लिए सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक रहस्यमयी दुनिया के दरवाज़े हैं। मुझे उन अनकहे एहसासों को कहानी में पिरोना पसंद है जो दिल की गहराइयों में छुपे रहते हैं। मेरी कहानियों में कभी हल्की-सी मोहब्बत की खुशबू होती है, तो कभी किसी अनदेखे रहस्य की आहट। मैं चाहती हूँ कि जब आप मेरी कहानी पढ़ें, तो कुछ पल के लिए समय ठहर जाए और आप खुद को उस दुनिया का हिस्सा महसूस करें।