Khamosh Ghar
Khamosh ghar

बारिश की हल्की बूंदें खिड़की के शीशों पर रेंग रही थीं जब देव ने नए घर का दरवाज़ा पहली बार खोला। अंदर घुसते ही उसे एक अजीब-सी ठंडक ने घेर लिया — जैसे हवा नहीं, कोई सन्नाटा उसकी त्वचा को छू गया हो। घर पुराना था, दीवारों पर हल्की दरारें, लकड़ी का फर्श जो कदम रखते ही धीमे से कराह उठता था। आशि उसके पीछे मुस्कुरा रही थी, हाथ अपने पेट पर टिकाए हुए। अब सब ठीक होगा, उसने धीमे से कहा। देव ने भी सिर हिला दिया, जैसे खुद को समझा रहा हो कि यह नई शुरुआत है, नया घर है, और नई उम्मीद है।

पहली रात सब सामान्य रहा, बस जरूरत से ज्यादा शांति थी। इतनी शांति कि देव को अपनी सांसों की आवाज़ भी भारी लगने लगी। सुबह जब उसकी आँख खुली तो किचन से चाय की हल्की-सी खुशबू आ रही थी। वह उठकर बाहर आया तो देखा — मेज़ पर दो कप रखे थे, उनमे से भाप उठ रही थी। आशि अभी भी बेडरूम में सो रही थी। देव ने एक पल के लिए सोचा कि शायद उसने ही नींद में बना दी हो… लेकिन उसे याद नहीं था। उसने कप को हाथ में लिया — वो गर्म था।

दिन बीतते गए। देव को अक्सर लगता जैसे कोई उसे देख रहा हो। कभी सीढ़ियों के पास हल्की आहट, कभी किचन का एक दराज़ खुद-ब-खुद आधा खुला मिलना। उसने एक रात आईने पर धुंध में उभरे उंगलियों के निशान देखे। उसने आशि को दिखाया तो वह हंस दी — पुराना घर है देव, आदत डालो।

लेकिन देव को लगने लगा था — यह घर सिर्फ पुराना नही बल्कि यहा कुछ राज भी पुराने हो चुके है जो कही छुपे है। और शायद वह अकेला नहीं है जो यहाँ सांस ले रहा है।

दूसरे हफ्ते से देव की बेचैनी बढ़ने लगी। घर की खामोशी अब उसे सुकून नहीं देती थी, बल्कि भीतर तक चुभने लगी थी। रात को जब वह सोने की कोशिश करता, तो लकड़ी के फर्श की धीमी चरमराहट साफ सुनाई देती — जैसे कोई बहुत हल्के कदमों से चल रहा हो। एक रात लगभग तीन बजे उसकी आँख अचानक खुली। उसे लगा जैसे हॉल में कोई धीमे-धीमे झूला झुला रहा हो। धक… धक… धक… एक नियमित सी आवाज़। उसका दिल तेज़ धड़कने लगा। वह धीरे से उठकर कमरे से बाहर आया। लाइट ऑन की — सब कुछ शांत। सोफा अपनी जगह, खिड़की बंद, परदे स्थिर।

सुबह उसने आशि से पूछा, तुम रात में बाहर गई थी? आशि ने उलझन से उसकी ओर देखा, नहीं, मैं तो सो रही थी। देव ने बात वहीं खत्म कर दी, पर उसके भीतर सवाल गूंजता रहा। उसी दिन दोपहर में जब आशि डॉक्टर के लिए निकल हुई थी, देव घर में अकेला था। उसे ऊपर वाले स्टोर रूम से हल्की-सी खटखट की आवाज़ सुनाई दी। पहले उसने अनसुना किया, लेकिन आवाज़ दोबारा आई — इस बार थोड़ी साफ। वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गया।

स्टोर रूम का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर धूल जमी थी, पुराने बक्से, टूटे फ्रेम… और कोने में एक छोटी-सी लकड़ी की पालना। देव ठिठक गया। उसने याद करने की कोशिश की — क्या ये पहले भी यहीं थी? वह धीरे से पास गया। पालना हल्का-सा हिल रहा था… जबकि खिड़कियाँ बंद थीं। उसके गले में शब्द अटक गए।

तभी पीछे से आशि की आवाज़ आई — देव… तुम यहाँ क्या कर रहे हो? वह चौंककर मुड़ा। आशि दरवाज़े पर खड़ी थी, चेहरे पर अजीब-सी शांति। देव ने फिर पालने की ओर देखा — वह अब बिल्कुल स्थिर था। जैसे कभी हिला ही न हो।

देव का दिमाग बुरी तरह धूम गया।

स्टोर रूम की उस घटना के बाद देव ने खुद को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उसके भीतर कहीं गहरा डर बैठ चुका था। उसे अब हर चीज़ असामान्य लगने लगी थी। आशि का व्यवहार भी। वह पहले से ज्यादा शांत रहती, अक्सर अकेले कमरे में बैठकर किसी से धीमे-धीमे बात करती दिखती। जब देव पूछता, तो वह मुस्कुराकर कहती, मैं बस बच्चे से बात कर रही हूँ। देव उसकी बात सुनकर चुप हो जाता, लेकिन उसके मन में एक अजीब बेचैनी उठती — जैसे कुछ छूट रहा हो, कुछ जो उसे याद होना चाहिए था।

एक शाम देव ने फैसला किया कि वह पूरे घर को ध्यान से देखेगा। वह हर कमरे में गया, हर कोने को परखा। तभी उसे बेडरूम की अलमारी के ऊपरी खाने में एक पुरानी फाइल मिली। धूल जमी थी, जैसे लंबे समय से खोली न गई हो। उसने फाइल नीचे लाकर खोली। अंदर अस्पताल की कुछ रिपोर्ट्स थीं। तारीख छह महीने पुरानी थी। देव का दिल धड़कने लगा। उसने कागज़ पलटा — शब्द धुंधले लग रहे थे। इमरजेंसी… कॉम्प्लिकेशन… शिशु मृत जन्म

उसके हाथ कांपने लगे। यह कैसे…? उसने खुद से बुदबुदाया। तभी दरवाज़े के बाहर से हल्की-सी आहट आई। उसने फाइल तुरंत बंद कर दी। आशि कमरे में आई, उसकी नज़र सीधे देव के हाथों पर गई। क्या ढूंढ रहे हो? उसकी आवाज़ सामान्य थी, पर आँखें कुछ और कह रही थीं।

देव ने सिर हिलाया, कुछ नहीं। पर उस रात उसे नींद नहीं आई। उसके दिमाग में वही शब्द घूमते रहे — मृत जन्म। उसने आशि के पेट की ओर देखा… जो अब भी उभरा हुआ था। एक पल के लिए उसे लगा जैसे उसके कानों में फिर वही धीमी-सी पालने की आवाज़ गूंज रही हो।

और पहली बार उसे एहसास हुआ — शायद यह घर ही नहीं, उसकी यादें भी कुछ छुपा रही हैं।

“खामोश घर” – एपिसोड 4

रात के सन्नाटे में देव की आँख अचानक खुली। उसे लगा जैसे कोई उसके बेहद करीब खड़ा है। कमरे में अंधेरा घना था, बस खिड़की से आती हल्की चांदनी फर्श पर फैल रही थी। उसने करवट लेकर आशि की तरफ देखा — वह गहरी नींद में थी, चेहरा शांत, सांसें सामान्य। देव उठकर बैठ गया। उसके दिमाग में दिन में देखी गई अस्पताल की रिपोर्ट घूम रही थी। “मृत जन्म…” शब्द जैसे दीवारों से टकराकर वापस उसी तक लौट रहे थे। उसने खुद को समझाया कि शायद यह किसी और की रिपोर्ट होगी, शायद पुराने घर के मालिकों की। लेकिन दिल मानने को तैयार नहीं था।

तभी उसे फिर वही आवाज़ सुनाई दी — धक… धक… धक… जैसे कोई हल्के-हल्के पालना झुला रहा हो। इस बार आवाज़ साफ थी, बिल्कुल पास से। देव का गला सूख गया। वह धीरे-धीरे बिस्तर से उतरा और कमरे से बाहर निकल गया। आवाज़ सीधे ऊपर वाले स्टोर रूम से आ रही थी। हर सीढ़ी पर कदम रखते हुए उसका दिल और तेज़ धड़कने लगा। उसने दरवाज़ा खोला।

पालना इस बार ज़ोर से हिल रही थी। कमरे में कोई हवा नहीं थी, खिड़कियाँ बंद थीं। देव ने कांपते हाथों से पालने को पकड़कर रोक दिया। उसी क्षण उसे अपने पीछे किसी की धीमी सिसकी सुनाई दी। वह झटके से मुड़ा — दरवाज़े पर आशि खड़ी थी। उसकी आँखें लाल थीं, जैसे वह लंबे समय से रो रही हो।

“देव… अब और मत भागो,” उसने धीमे से कहा।

देव की सांसें तेज़ हो गईं। “किससे भाग रहा हूँ मैं?”

आशि ने उसकी ओर बढ़ते हुए कहा, “सच से।”

कमरे की दीवार पर टंगी एक पुरानी तस्वीर अचानक उसकी नज़र में आई — अस्पताल का कमरा… और उसमें वह खुद, टूटा हुआ, खाली नज़रों से कहीं देखता हुआ।

देव का सिर घूमने लगा। यादों के धुंधले टुकड़े जैसे जुड़ने लगे थे। और उसे एहसास हुआ — शायद वह जिस ‘नए घर’ में रह रहा है… वह कभी बदला ही नहीं था।

उस रात के बाद देव ने तय कर लिया कि अब वह डरकर पीछे नहीं हटेगा। अगर सच है, तो सामने आएगा। अगर वह पागल हो रहा है, तो उसे भी जानना होगा। आधी रात को उसने मोबाइल का कैमरा ऑन किया और चुपचाप स्टोर रूम में लगा दिया। आज पता चल जाएगा, उसने खुद से कहा। आशि उसे अजीब नज़रों से देखती रही, पर कुछ बोली नहीं।

रात के करीब 3:17 बजे — वही समय। घर की सारी लाइट्स एक साथ झपकीं। देव की नींद टूटी। इस बार आवाज़ सिर्फ पालने की नहीं थी… किसी बच्चे की बहुत हल्की-सी हँसी गूंज रही थी। उसकी रगों में खून जम गया। वह भागकर ऊपर गया। स्टोर रूम का दरवाज़ा बंद था… अंदर से।

देव ने धक्का मारा — दरवाज़ा खुला। अंदर अंधेरा था, लेकिन पालना तेज़ी से हिल रही थी। इतनी तेज़ कि जैसे कोई उसमें तड़प रहा हो। देव ने कांपते हाथों से कैमरा उठाया और रिकॉर्डिंग चेक की। वीडियो में साफ दिख रहा था — ठीक 3:17 पर आशि कमरे में आई… उसने पालने को छुआ… और अचानक उसका चेहरा बदल गया। उसकी मुस्कान गायब हो गई। वह खाली आंखों से पालने को देख रही थी… और फिर उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा — मम्मा यहीं है…

देव के पैरों तले जमीन खिसक गई। तभी पीछे से दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया। लाइट बुझ गई। अंधेरे में वही हँसी गूंजी — इस बार और साफ।

पापा…

देव की सांस रुक गई। यह आवाज़ उसके दिमाग में नहीं थी। यह उसके कानों में थी।

अचानक लाइट वापस आई। पालना रुक चुका था। आशि नीचे कमरे में गहरी नींद में थी — जैसे कभी ऊपर आई ही न हो।

लेकिन देव के हाथ में मोबाइल था… और वीडियो अब भी चल रहा था।

और उसमें — पालने के अंदर एक हल्की-सी परछाईं हिल रही थी।

देव के हाथ काँप रहे थे। मोबाइल की स्क्रीन पर चल रहा वीडियो उसकी सांसें रोक रहा था। उसने फिर से प्ले किया। 3:17 AM — दरवाज़ा अपने आप खुलता है। कैमरा स्थिर है। कमरे में कोई नहीं… फिर भी पालना धीरे-धीरे हिलने लगता है। कुछ सेकंड बाद फ्रेम में एक धुंधली आकृति उभरती है — जैसे हवा में आकार लेती परछाईं। और फिर… बहुत साफ आवाज़ — पापा…

देव की आँखें फैल गईं। यह आशि नहीं थी। यह कोई और था।

वह नीचे भागा। आशि अब जाग चुकी थी। उसकी आँखों में अजीब-सी थकान थी। तुमने देख लिया ना? उसने धीमे से पूछा।

देव ने गुस्से और डर में मोबाइल उसकी तरफ बढ़ाया। यह क्या है? तुम कर रही हो ये सब?

आशि की आँखों से आँसू बह निकले। मैं छह महीने से तुम्हें बचाने की कोशिश कर रही थी, देव… पर अब वो खुद आ रहा है।

कौन? देव चीखा।

अचानक पूरे घर की लाइट चली गई। दरवाज़े अपने आप बंद हो गए। सीढ़ियों से छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान नीचे आने लगे — जैसे किसी ने अभी-अभी पानी में कदम रखा हो। देव जड़ हो गया। वह धीरे-धीरे मुड़ा।

हॉल के बीचों-बीच एक छोटी-सी आकृति खड़ी थी। चेहरा साफ नहीं दिख रहा था, बस खाली आंखें… और होंठों पर हल्की मुस्कान।

आप मुझे छोड़कर क्यों चले गए?

देव की यादें बिजली की तरह कौंधीं — अस्पताल, खून, डॉक्टरों की भागदौड़… और उसका गुस्सा। उस रात वह बच्चे को बचा नहीं पाया था… और उसने खुद को दोषी ठहराते हुए घर छोड़ दिया था। आशि वहीं रही। अकेली।

पर असली सच अब सामने था — बच्चा मरा नहीं था। वह कुछ और बन गया था।

छोटी आकृति धीरे-धीरे देव के पास आई… और उसके हाथ को छुआ। बर्फ जैसी ठंडक उसके शरीर में दौड़ गई।

अगली सुबह पड़ोसियों ने घर का दरवाज़ा खुला पाया। अंदर सब शांत था। सिर्फ स्टोर रूम में पालना हल्का-हल्का हिल रहा था…

और आईने पर उभरे छोटे-छोटे उंगलियों के निशान थे लेकिन किसी को ये नहीं पता चल पाया की देव और आशी कहा गए।

यह रहस्य आज भी लोगो को हैरान कर देता है।

 

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