सिटी कॉर्पोरेशन के पुराने दफ़्तर में एक अजीब सा नियम था — केबिन नंबर 17 की आख़िरी कुर्सी पर कोई नहीं बैठेगा। वह कुर्सी हमेशा खाली रहती थी, जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हो। नए ट्रांसफर पर आए अद्वैत को यह सब बचकाना लगा। पहले ही दिन उसने देखा कि पूरा केबिन भरा है, सिर्फ वही एक कुर्सी खाली। उसने हँसते हुए कहा, ऑफिस में भी भूतों की रिज़र्व सीट होती है क्या? सहकर्मियों के चेहरों पर मुस्कान नहीं थी। किसी ने धीमे से कहा, पाँच साल पहले यहाँ राघव मेहरा बैठता था… उसी कुर्सी पर। एक दिन अचानक यहीं गिर पड़ा। हार्ट अटैक। तब से ये सीट खाली है। अद्वैत ने बात को हल्के में लिया और सीधा जाकर उस कुर्सी पर बैठ गया। जैसे ही वह बैठा, उसे हल्की ठंडक महसूस हुई, जबकि जुलाई की उमस भरी दोपहर थी। उसने इसे एसी की हवा समझकर नजरअंदाज कर दिया। लेकिन शाम होते-होते उसे अजीब सा एहसास होने लगा — जैसे कोई पीछे खड़ा उसे देख रहा हो। जब उसने मुड़कर देखा, तो वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक। ऑफिस से निकलते समय उसने नोटिस किया कि बाकी सभी कर्मचारी उससे नज़रें चुरा रहे थे। जाते-जाते उसने फिर उस कुर्सी को देखा। पल भर को लगा… जैसे वह खाली नहीं है। जैसे अभी भी कोई अदृश्य व्यक्ति वहाँ बैठा हो।
अगले दिन अद्वैत जब ऑफिस पहुँचा तो माहौल और भी भारी था। केबिन में कदम रखते ही उसे वही ठंडक महसूस हुई। वह चुपचाप सीट नंबर 17 पर बैठ गया। कंप्यूटर ऑन किया तो स्क्रीन पर उसकी जॉइनिंग प्रोफाइल खुली हुई थी, जबकि उसने अभी लॉग-इन भी नहीं किया था। उसने सोचा शायद आईटी टीम की गलती होगी। तभी उसकी नज़र एक कॉलम पर गई — डेट ऑफ एग्ज़िट। उसके नीचे एक तारीख़ लिखी थी। 11 जुलाई। आज की तारीख़। उसका दिल धक से रह गया। उसने तुरंत HR को फोन किया। जवाब मिला, सिस्टम एरर होगा, चिंता मत करो। लेकिन जब उसने बगल वाले कर्मचारी की प्रोफाइल देखी, तो उसमें ऐसा कोई कॉलम ही नहीं था। सिर्फ उसकी फाइल में। उसका गला सूख गया। दोपहर में वह रिकॉर्ड रूम चला गया। धूल से ढकी अलमारी में उसे राघव मेहरा की पुरानी फाइल मिल गई। कांपते हाथों से उसने पन्ने पलटे। वहाँ भी वही कॉलम था — डेट ऑफ एग्ज़िट: 11 जुलाई। पाँच साल पुरानी वही तारीख़। और नीचे नोट — सीट नंबर 17 – अंतिम उपस्थिति। अद्वैत की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। क्या यह सिर्फ इत्तेफाक था? या उस कुर्सी से जुड़ा कोई अधूरा हिसाब?
शाम करीब पाँच बजे अद्वैत के सीने में हल्का दर्द शुरू हुआ। उसने खुद को समझाया कि यह तनाव की वजह से है। लेकिन दर्द बढ़ता गया। उसने पानी पिया और कुर्सी से उठने की कोशिश की, पर जैसे उसके पैर भारी हो गए हों। तभी उसे लगा कि उसके पीछे कोई खड़ा है। धीरे-धीरे उसने मुड़कर देखा। केबिन की लाइट हल्की झिलमिला रही थी। और सीट नंबर 17 के ठीक पीछे… एक धुंधली आकृति खड़ी थी। सफेद शर्ट, झुका हुआ सिर। वही चेहरा जो उसने फाइल में देखा था। राघव मेहरा। अद्वैत की साँसें तेज़ हो गईं। उसने आँखें बंद कीं और फिर खोलीं — सामने कोई नहीं था। लेकिन कंप्यूटर स्क्रीन अपने आप टाइप करने लगी। रिप्लेसमेंट असाइनड। उसका दिल जोर से धड़कने लगा। उसने घड़ी देखी — 5:59। ऑफिस खत्म होने में एक मिनट। उसे अचानक समझ आया कि शायद यह कुर्सी सिर्फ बैठने की जगह नहीं… एक क्रम है। एक सिलसिला। कोई बैठता है, तारीख़ तय होती है, और फिर… वह जगह किसी और के लिए खाली हो जाती है। 6:00 बजते ही कमरे की लाइट बुझ गई। और अद्वैत की चीख पूरे केबिन में गूंज उठी…
6:00 बजते ही ऑफिस की लाइट बुझ गई और अद्वैत फर्श पर गिर पड़ा। जब होश आया तो वह अस्पताल में था। डॉक्टर कह रहे थे — माइल्ड कार्डियक अरेस्ट। स्ट्रेस की वजह से। लेकिन अद्वैत जानता था यह सिर्फ तनाव नहीं था। उसके सीने पर अब भी वही ठंडक थी… जैसे किसी बर्फीले हाथ ने उसे छुआ हो। अगले दिन उसने तय किया कि वह सच जाने बिना चैन से नहीं बैठेगा। वह सीधा ऑफिस नहीं गया, बल्कि राघव मेहरा के घर का पता निकालकर वहाँ पहुँच गया। दरवाज़ा एक बुज़ुर्ग महिला ने खोला — राघव की माँ। जब अद्वैत ने सीट नंबर 17 का ज़िक्र किया, उनके चेहरे का रंग उड़ गया। उन्होंने धीमे से कहा, मेरे बेटे ने मरने से पहले कहा था… उस कुर्सी को खाली मत रहने देना… नहीं तो वो किसी और को बुला लेगी। अद्वैत के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “कौन बुला लेगी? उसने पूछा। महिला की आँखें भर आईं — जिसके साथ धोखा हुआ था… उसी का साया।
अद्वैत को पता चला कि पाँच साल पहले राघव ने ऑफिस के एक बड़े घोटाले का खुलासा करने की कोशिश की थी। उसने एक फाइल जमा की थी, जिसमें कई वरिष्ठ अधिकारियों के नाम थे। लेकिन वह फाइल कभी सामने नहीं आई। राघव की मौत को हार्ट अटैक कहकर मामला दबा दिया गया। अद्वैत को अब समझ आ रहा था — डेट ऑफ एग्ज़िट सिर्फ तारीख़ नहीं थी, एक चेतावनी थी। वह रात में चुपके से ऑफिस पहुँचा। रिकॉर्ड रूम में उसने वही पुरानी अलमारी खोली। अंदर एक छुपा हुआ लिफाफा मिला — राघव की असली रिपोर्ट। जैसे ही उसने उसे पढ़ना शुरू किया, पीछे से कुर्सी घिसटने की आवाज़ आई। पूरा केबिन खाली था, लेकिन सीट नंबर 17 अपने आप घूम रही थी। कंप्यूटर स्क्रीन जल उठी। उस पर लिखा था — सच उजागर करो… या जगह खाली करो। अद्वैत के सामने अब दो रास्ते थे — सच सामने लाकर अपनी जान जोखिम में डालना, या चुप रहकर अगली तारीख़ का इंतज़ार करना।
अगली सुबह ऑफिस में हड़कंप मच गया। अखबारों में हेडलाइन थी — सिटी कॉर्पोरेशन में करोड़ों का घोटाला उजागर। अद्वैत ने सारी फाइलें मीडिया को भेज दी थीं। कई बड़े अधिकारी सस्पेंड हो चुके थे। लेकिन उसी शाम, 11 जुलाई को, ठीक 6:00 बजे… अद्वैत फिर सीट नंबर 17 पर बैठा था। उसने घड़ी देखी। इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था। उसने धीरे से कहा, मैंने सच सामने ला दिया। कमरे में हल्की ठंडक फैल गई। उसके पीछे वही धुंधली आकृति दिखाई दी — राघव। लेकिन इस बार उसका चेहरा शांत था। कंप्यूटर स्क्रीन पर “डेट ऑफ एग्ज़िट” वाला कॉलम गायब हो चुका था। कुर्सी अब ठंडी नहीं थी। अगले दिन ऑफिस में एक नया नोटिस लगा था — सीट नंबर 17 अब सामान्य उपयोग में है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। क्योंकि कई साल बाद, जब एक नया घोटाला हुआ… तो उसी केबिन में फिर एक नई फाइल खुली। और डेट ऑफ एग्ज़िट का कॉलम… फिर से दिखाई देने लगा।
कुछ कुर्सियाँ लकड़ी की नहीं होतीं…
वे न्याय की प्रतीक्षा से बनी होती हैं।

