डिलीवरी रूम के बाहर अर्जुन बेचैनी से चक्कर काट रहा था। अंदर से पत्नी की दर्द भरी चीखें आ रही थीं और हर आवाज़ उसके दिल पर हथौड़े की तरह गिर रही थी। नर्सें भाग-दौड़ कर रही थीं, डॉक्टर बार-बार निर्देश दे रहे थे। फिर अचानक… एक गहरी खामोशी छा गई।
इतनी आवाज़ो के बाद की ये चुप्पी उसे बेचैन कर रही थी, अर्जुन का दिल बैठ गया। सब ठीक तो है? उसने दरवाज़े की तरफ बढ़ते हुए पूछा। अगले ही पल बच्चे के जन्म की घोषणा हुई। डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा, बेटा हुआ है। लेकिन… कोई रोने की आवाज़ नहीं आई। इस खामोशी ने सबको ड़रा दिया और डिलीवरी रूम में अजीब सन्नाटा फैल गया। नर्स ने बच्चे को हल्का सा थपथपाया, पर वह रोया नहीं। उसकी आँखें खुली थीं—सीधी, स्थिर, जैसे वह किसी को पहचान रहा हो। और फिर… एक बेहद साफ़, धीमी मगर स्पष्ट आवाज़ गूंजी— अर्जुन…
पूरा कमरा जम गया।
डॉक्टर के हाथ से उपकरण गिरते-गिरते बचे। नर्स ने घबराकर बच्चे को देखा। अर्जुन ने सोचा शायद उसे भ्रम हुआ है। लेकिन फिर वही आवाज़ दोबारा आई— अर्जुन…
और इस बार और भी स्पष्ट।
पत्नी ने कमजोर हालत में यह सुना और तुरंत बेहोश हो गई। अर्जुन की साँसें तेज हो गईं। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था, जैसे उसने कोई ऐसा नाम सुना हो… जो सिर्फ एक इंसान ही नहीं, एक राज़ भी था। डॉक्टर ने तुरंत बच्चे को अलग कमरे में ले जाने का आदेश दिया। ये सामान्य नहीं है, उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा।
अर्जुन के दिमाग में एक पुरानी रात कौंध गई—बारिश, अंधेरा, और एक धक्का…
क्या ये सिर्फ एक चमत्कार था?
या अतीत का कोई गुनाह, जिसने आज जन्म ले लिया था?
बच्चे के जन्म के बाद अस्पताल का माहौल सामान्य दिखने की कोशिश कर रहा था, लेकिन सबके होश उड़े हुए थे और हवा में डर घुल चुका था। अर्जुन की पत्नी, निहारिका, होश में आते ही सबसे पहला सवाल यही पूछती है—उसने सच में नाम लिया था… क्या?
अर्जुन चुप रहा। उसकी खामोशी ही जवाब थी। निहारिका को अचानक शादी से पहले की बातें याद आने लगीं। अर्जुन की ज़िंदगी में एक लड़की थी—रिया। दोनों कॉलेज के दिनों में बहुत करीब थे। लेकिन अचानक खबर आई कि रिया की एक सड़क हादसे में मौत हो गई। अर्जुन ने कभी उस हादसे की पूरी कहानी नहीं बताई। बस इतना कहा था—वो मेरी ज़िंदगी का बंद अध्याय है। लेकिन क्या सच में वह अध्याय बंद हुआ भी था?
निहारिका को याद आया—डिलीवरी से एक रात पहले उसने सपना देखा था। एक लड़की सफेद कपड़ों में खड़ी थी, उसकी आँखों में सवाल थे। उसने बस एक नाम लिया था—अर्जुन…
उसी नाम की गूंज अब उनके नवजात बच्चे की आवाज़ में थी। क्या ये महज़ संयोग था?
या कोई अधूरी कहानी थी, जो अब नई शक्ल में लौट आई थी?
अस्पताल प्रशासन ने मामले को दबाने की कोशिश की, लेकिन डिलीवरी रूम का सीसीटीवी फुटेज सब बदल देने वाला था। डॉक्टर मेहरा ने अर्जुन को अपने केबिन में बुलाया। कमरे में सन्नाटा था, सिर्फ स्क्रीन की हल्की रोशनी चमक रही थी। वीडियो चलाया गया। बच्चा जन्म लेता है… नर्स उसे उठाती है… और फिर साफ़ रिकॉर्ड हुई आवाज़ सुनाई देती है— अर्जुन…
इस बार कोई भ्रम नहीं था। आवाज़ मशीन में दर्ज थी। डॉक्टर ने गंभीर स्वर में कहा, मेडिकल साइंस में नवजात का इस तरह बोलना असंभव है। उसके वोकल कॉर्ड्स पूरी तरह विकसित भी नहीं होते। ये सुनकर अर्जुन के माथे पर पसीना आ गया और उसने धबराकर पूछा। तो फिर ये क्या है?
डॉक्टर ने धीमे से जवाब दिया, या तो कोई अज्ञात मेडिकल घटना… या फिर कुछ ऐसा जिसे हम समझ नहीं पा रहे।
उसी वक्त नर्स घबराई हुई अंदर आई और बोली। सर, बच्चा फिर से उसी दिशा में देख रहा है… और मुस्कुरा रहा है।
किधर? अर्जुन ने कांपते हुए पूछा।
दरवाज़े के पास… जहाँ अभी कोई खड़ा नहीं है।
अर्जुन का दिल धड़क उठा। उसे लगा जैसे कोई अदृश्य निगाह उसे घूर रही हो।
क्या यह सिर्फ एक अजीब घटना थी…
या अतीत अब सबूतों के साथ लौट आया था?
सीसीटीवी देखने के बाद अर्जुन की नींद उड़ चुकी थी। उसी रात उसे एक अनजान नंबर से मैसेज मिला— सच से कब तक भागोगे ?
साथ में एक लोकेशन भेजी गई—पुराना हाइवे, वही जगह जहाँ रिया की मौत हुई थी। अर्जुन का गला सूख गया। सात साल पहले की वो बारिश भरी रात उसकी आँखों के सामने घूम गई। रिया उससे मिलने आई थी। दोनों के बीच भयंकर बहस हुई थी। रिया ने रोते हुए कहा था, अगर तुमने मुझे छोड़ दिया तो मैं सबको सच बता दूँगी। और अर्जुन ने गुस्से में उसका हाथ झटका था। बस एक धक्का… और रिया पीछे की तरफ लड़खड़ाई। सड़क किनारे की ढलान, फिसलन, और फिर अंधेरा। उस पल अर्जुन बहुत डर गया था। उसने एम्बुलेंस बुलाने के बजाय वहाँ से भाग जाना बेहतर समझा। अगले दिन खबर आई—एक्सीडेंट में मौत।
सबने इसे हादसा मान लिया। पुलिस केस भी कुछ दिनों में ठंडा पड़ गया। लेकिन क्या वो सच में हादसा भी था?
अब जब उसका बच्चा जन्म लेते ही उसका नाम ले रहा था, हर आवाज़ उसी रात की गूंज जैसी लग रही थी। अचानक घर की लाइट्स झपकने लगीं। बच्चे के कमरे से हल्की हँसी सुनाई दी। अर्जुन दौड़कर अंदर गया—बच्चा पालने में लेटा था, उसकी आँखें खुली थीं… और होंठों पर वही रहस्यमयी मुस्कान। जैसे वो सब जानता हो। क्या वो धक्का सिर्फ एक गलती थी…
या उसी पल एक गुनाह ने जन्म लिया था?
घर लौटने के बाद सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश की गई, लेकिन बच्चे का व्यवहार हर दिन और अजीब होता जा रहा था जिससे उसके माता-पिता हमेशा ड़रे रहते थे। बच्चा रोता नहीं था, बस चुपचाप छत को घूरता रहता—जैसे किसी अनदेखी परछाई से बात कर रहा हो। एक दिन निहारिका ने देखा, बच्चा बार-बार घर के उस बंद कमरे की ओर देख रहा है, जिसे अर्जुन ने सालों से ताला लगा रखा था। और उस कमरे में कभी निहारिका को जाने भी नहीं देता था।
निहारिका ने भी फाएदा उठाया और अपने बच्चे से पूछने लगी इस कमरे में क्या है?
कि तभी अर्जुन पीछे से आकर बोला पुराना सामान। लेकिन उसी रात कुछ अजीब हुआ। बच्चा अचानक मुस्कुराने लगा… और उसके छोटे-से हाथ उसी कमरे की दिशा में उठ गए। निहारिका से रहा नहीं गया। जैसे ही अर्जुन बाहर गया, उसने अलमारी से चाबी निकाली और दरवाज़ा खोल दिया। अंदर धूल से ढकी चीज़ें थीं—कुछ पुराने कपड़े, एक टूटी हुई फ्रेम… और दीवार पर टंगी रिया की तस्वीर। तस्वीर के नीचे एक डायरी भी पड़ी थी।
निहारिका ने काँपते हाथों से उसे खोला। आखिरी पन्ने पर लिखा था— अगर मेरे साथ कुछ हुआ, तो जिम्मेदार अर्जुन होगा। ये पड़ते ही उसकी साँस रुक गई।
उसी पल पीछे से बच्चे की आवाज़ आई— मम्मा…
निहारिका ने पलटकर देखा। बच्चा दरवाज़े पर था, उसकी आँखें तस्वीर पर जमी थीं। और फिर उसने धीरे से कहा— रिया…
अब ये सिर्फ शक नहीं था… बल्कि अब कोई सच घर के भीतर जाग चुका था।
डायरी के शब्द निहारिका के दिमाग में हथौड़े की तरह गूंज रहे थे— जिम्मेदार अर्जुन होगा। उसकी नज़रें अर्जुन पर टिक गईं, जो दरवाज़े पर खड़ा सब देख चुका था।
ये झूठ है… अर्जुन की आवाज़ कमजोर थी, आत्मविश्वास गायब था।
तो सच क्या है? निहारिका गुस्से और नफ़रत से चीखी। बच्चा अचानक जोर से हँस पड़ा। वह हँसी मासूम नहीं थी… जैसे किसी बड़े इंसान की कड़वी याद हो एसी थी। अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए। मैंने उसे मारने का इरादा नहीं किया था… बस गुस्से में धक्का दिया था। मुझे लगा वो संभल जाएगी। मैं डर गया था… इसलिए वह़ॉ से भाग गया।
अर्जुन के इस खुलासे के बाद कमरे में सन्नाटा छा गया। और निहारिका के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। तुमने उसे मरने के लिए छोड़ दिया…
उसी पल बच्चे की आँखों से एक आँसू बहा। वह सीधे अर्जुन को देख रहा था—जैसे फैसला सुना रहा हो। अचानक दरवाज़े की घंटी बजी। बाहर पुलिस खड़ी थी। किसी ने पुराना केस दोबारा खोलने की शिकायत की थी… साथ में डायरी की कॉपी भेजी गई थी।
अर्जुन समझ चुका था—अब भागने की जगह नहीं बची। और कुछ गुनाह वक्त से छुप सकते हैं लेकिन सच से नहीं।
दरवाज़े पर खड़ी पुलिस को देखकर अर्जुन की टाँगें काँपने लगीं। इंस्पेक्टर ने सीधा सवाल किया—रिया केस दोबारा खुल रहा है। हमारे पास नई गवाही और सबूत हैं। अर्जुन ने निहारिका की ओर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार कमजोरी नहीं—सच का साहस था।
मैंने शिकायत की, निहारिका ने धीमे मगर ठोस स्वर में कहा। क्योंकि अब ये सिर्फ अतीत नहीं… मेरे बच्चे का भविष्य भी है। अर्जुन ये सुनकर टूट गया। उसने सब कबूल कर लिया—वो धक्का, वो डर, और वो पल जब उसने मदद बुलाने के बजाय अपनी जान बचाई।
पुलिस उसे ले जाने लगी। तभी कमरे में अजीब-सी ठंडक फैल गई। बच्चे ने पहली बार ज़ोर से रोना शुरू किया। वह सामान्य रोना था—एक नवजात की पहली सच्ची चीख।
जिसे सुनकर इंस्पेक्टर भी ठिठक गया। निहारिका ने अपने बच्चे को सीने से लगाया। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन दिल में अजीब-सी शांति। जैसे कोई अधूरी आत्मा अब संतुष्ट हो चुकी हो।
अर्जुन ने जाते-जाते बच्चे की तरफ देखा। बच्चा शांत हो चुका था। उसकी निगाहों में अब कोई रहस्य नहीं था—बस मासूमियत थी। जैसे उसने अपना काम पूरा कर लिया हो। पुलिस की गाड़ी दूर जाती रही। घर में सन्नाटा था, लेकिन डर नहीं। निहारिका ने बच्चे के माथे को चूमते हुए फुसफुसाया, अब सब खत्म हो गया… खिड़की से आती हवा ने परदे हिलाए, और दीवार पर टंगी रिया की तस्वीर जमीन पर गिरकर टूट गई।
क्योंकि कुछ फैसले अदालत में नहीं होते…
कुछ फैसले औलाद लेकर पैदा होती है।

