जिस दिन वो लौट आई

आरव और मीरा की कहानी किसी फ़िल्म जैसी नहीं थी। वो लाइब्रेरी के कोने में शुरू हुई थी—खामोश, सच्ची और बिना वादों के। मीरा कम बोलती थी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसा सच था, जो आरव को हर बार खींच लाता। दोनों जानते थे, ये प्यार आसान नहीं होगा… फिर भी उन्होंने उसे चुना।

एक शाम मीरा ने आरव से कहा, अगर मैं अचानक चली जाऊँ, तो मुझे ढूँढना मत। आरव हँस पड़ा, उसने इसे मज़ाक समझा।
उसे क्या पता था, ये आख़िरी इशारा है। कुछ ही दिनों बाद मीरा गायब हो गई।
ना कॉल, ना मैसेज।
शहर में तलाश हुई, पोस्टर लगे… और फिर नदी किनारे एक लड़की की लाश मिली।

रिपोर्ट में नाम लिखा था—मीरा।
आरव की जिंदगी पूरी तरह पलट गई, मानों उसके शरीर में दिल तो है पर उसमें अब धड़कन नही रही, और उसने बाँडी पहचान करने से मना कर दिया। लेकिन सच ने उसे ज़बरदस्ती पकड़ लिया।

समय बीत गया। लोग आगे बढ़ गए। पर आरव वहीं रुक गया। और ठीक एक साल बाद, उसी तारीख़ को, उसके साथ कुछ बहुत अजीब हुआ जो बिल्कुल आम नहीं था, उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया— मैं ज़िंदा हूँ। उसे कुछ समझ नहीं आया अचानक उसका दिमाग घूमा और उसी पल, आरव की दुनिया दोबारा हिल गई…

मीरा के “मैं ज़िंदा हूँ” वाले मैसेज ने आरव की नींद, उसका सुकून—सबकुछ छीन लिया। वो देर तक स्क्रीन को घूरता रहा, जैसे शब्द बदल जाएँगे। नंबर अनजान था। कॉल किया— तो फ़ोन स्विच ऑफ। उस एक लाइन ने एक साल पुरानी कब्र फिर से खोल दी थी।

आरव ने पुलिस फाइल निकाली। रिपोर्ट, फोटो, पोस्टमार्टम—सब कुछ साफ़ था। मौत असली लगती थी। फिर ये मैसेज किसने भेजा? किसी ने मज़ाक किया? या कोई उसे पागल बना रहा था? लेकिन आरव मीरा को जानता था। ये शब्द… वही थे। वही ठहराव, वही सादगी।

अगले दिन वो उसी नदी किनारे गया, जहाँ मीरा “मरी” थी। हवा में अजीब सी खामोशी थी। तभी उसके फोन पर फिर से नोटिफिकेशन आया— वहाँ मत आओ। ये पड़ते ही आरव के हाथ काँप गए।

भीड़ में उसे किसी ने हल्के से छुआ। एक खुशबू… जानी-पहचानी। वो मुड़ा—और भीड़ में एक लड़की थी, जिसने दुपट्टा चेहरे पर खींच रखा था। आँखें मिलीं। सिर्फ़ एक पल के लिए।

वो मीरा थी। या फिर आरव का वहम?

लड़की भीड़ में गायब हो गई।आरव वहीं खड़ा रह गया—इस सवाल के साथ कि अगर मीरा ज़िंदा है, तो वो अब तक कहा थी और उसे मरना क्यों पड़ा?

आरव अब यक़ीन कर चुका था—वो लड़की वहम नहीं थी।और उसकी मीरा ज़िंदा थी। लेकिन सवाल ये था कि उसने अपनी मौत का नाटक क्यों किया? आरव ने पुरानी यादों को टटोलना शुरू किया। मीरा अक्सर फोन कॉल्स से घबरा जाती थी, अनजान नंबर देखते ही उसका चेहरा उतर जाता था। तब आरव ने ध्यान नहीं दिया था लेकिन आज उसके लिए ये सारी बाते एक सवाल बन गई।

जांच करते-करते आरव को मीरा की एक पुरानी डायरी मिली, जो उसने हॉस्टल के कमरे में छोड़ दी थी। आख़िरी पन्ने पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी— अगर मैं मर जाऊँ, तो समझ लेना मैं ज़िंदा रहना चाहती थी। एक पल के लिए आरव की साँस अटक गई।

उसी रात एक अनजान आदमी उसका पीछा करने लगा। काले कपड़े, आँखों में सख़्ती। आरव किसी तरह बच उससे बच निकला। अब साफ़ था—ये खेल सिर्फ़ प्यार का नहीं था, बल्कि जान का था।

अगले दिन आरव को एक ईमेल मिला, बिना नाम के, उसमें एक वीडियो अटैच था।
वीडियो में मीरा थी—डरी हुई, थकी हुई।
उसने कैमरे की तरफ़ देखा और बस इतना कहा— मुझे ढूँढने की कोशिश मत करना… वरना तुम भी मर जाओगे आरव।

वीडियो वहीं रुक गया। आरव ने स्क्रीन बंद की।और उसके दिमाग में कई चीज़े चलने लगी लेकिन अब ये तय था कि मीरा ने अपनी मौत किसी से बचने के लिए चुनी थी।

और अब, वो कोई आरव तक पहुँच चुका था…

आरव ने मीरा की चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर दिया क्योकि कुछ डर ऐसे भी होते हैं, जिनसे बड़ा प्यार होता है। उसने उसी कैफ़े को चुना, जहाँ कभी मीरा घंटों बैठकर कॉफ़ी ठंडी होने देती थी। आरव को यक़ीन था—अगर मीरा आ सकती है, तो सिर्फ यहीं आएगी।

वक़्त गुजरता रहा। भीड़ बढ़ी। और तभी दरवाज़ा खुला। एक लड़की अंदर आई, साधारण कपड़ों में, सिर झुका हुआ।
आरव का दिल ज़ोर से धड़क उठा। वो मीरा ही थी।

दोनों की नज़रें मिलीं। वक़्त जैसे कुछ पल के लिए रुक सा गया हो। मीरा की आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर मजबूरी।
आरव ने अपनी आँखो के सामने जिंदा मीरा को देखते ही उसका हाथ ज़ोर से पकड़ लिया—वही स्पर्श, वही सच्चाई। वो कुछ कहता की तभी मीरा ने झटके से हाथ छुड़ा लिया।

मैं ज़िंदा हूँ, पर आज़ाद नहीं, मीरा ने धीमी आवाज़ में कहा। उसने बताया कि वो एक बड़े अपराधी की गवाह है।
उसकी मौत का नाटक ही उसकी ढाल थी। अगर सच्चाई बाहर आई, तो कई ज़िंदगियाँ खतरे में पड़ जाएँगी।

कैफ़े के बाहर एक काली गाड़ी खड़ी थी। मीरा उठी, और जाते-जाते बोली— मुझे भूल जाओ, आरव।

आरव ने पहली बार जवाब दिया— इस बार बिल्कुल नहीं मीरा और दूर से, कोई उन्हें देख रहा था…

मीरा के जाने के बाद आरव देर तक उसी कुर्सी पर बैठा रहा। उसका हाथ अब भी वैसा ही काँप रहा था, जैसे मीरा का हाथ छूते वक़्त काँपा था। वो समझ चुका था—मीरा दूर इसलिए नहीं थी क्योंकि उसका प्यार खत्म हो गया था, बल्कि इसलिए क्योंकि वो किसी ऐसे सच को ढो रही थी, जो जान ले सकता था।

उस रात आरव के घर की लाइट अचानक चली गई। खामोशी कुछ ज़्यादा ही भारी थी। तभी किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। बाहर कोई नहीं था—सिर्फ़ एक लिफ़ाफ़ा पड़ा था। अंदर एक फोटो थी: मीरा की, किसी अनजान जगह पर। पीछे लिखा था—
अगर ज़िंदा देखना चाहते हो, तो सवाल पूछना बंद करो।

आरव का खून ठंडा पड़ गया। अब साफ़ था—मीरा अकेली नहीं भाग रही थी, उसे दौड़ाया जा रहा था। और ये जानकर आरव बहुत बेबस महसूस कर रहा था कि उसका प्यार मीरा मजबूर है और वो कुछ कर भी नही पा रहा, अगले ही दिन आरव ने चोरी-छुपे उस केस की जानकारी जुटानी शुरू की, जिसमें मीरा गवाह थी। नाम सामने आया—एक ताक़तवर आदमी, जिसके हाथ क़ानून से भी लंबे थे।

उसी शाम आरव का किसी ने पीछा किया।और एक मोड़ पर उसे धक्का दिया साथ ही उसके कान के पास एक आवाज़ फुसफुसाई— अगली बार सिर्फ़ चेतावनी नहीं होगी।

आरव गिरा, पर टूटा नहीं। उसने आसमान की तरफ़ देखा और तय कर लिया—
अगर सच का दुश्मन इतना डरता है, तो सच… ज़रूर बहुत बड़ा है। और इस बार, आरव पीछे हटने वाला नहीं था। क्योकि उसके मन में मीरा से जुड़े कई सवाल चल रहे थे कि आखिरकार मीरा कहा होगी, किन लोगों के बीच होगी, कैसे जी रही होगी

आरव अब हर दिन डर के साथ जी रहा था। फोन की हर घंटी, पीछे से आती हर आहट—उसे मीरा की याद दिला देती। वो जानता था, मीरा उसे दूर रखकर उसकी जान बचा रही है। लेकिन ये दूरी, आरव को अंदर से तोड़ रही थी और लाचार बना रही थी।

इसी दौरान उसकी ज़िंदगी में अनाया आई। वो एक जर्नलिस्ट थी, उसी केस पर काम कर रही थी जिसे मीरा ने गवाही देकर ज़िंदा किया था। अनाया ने आरव की आँखों में दर्द देखा—वो दर्द जो किसी आम ब्रेकअप का नहीं होता। दोनों मिलने लगे। बातें होने लगीं। बाहर से देखने वालों को लगने लगा कि आरव आगे बढ़ रहा है।

लेकिन हर हँसी के पीछे, आरव चुप हो जाता। क्योंकि जब भी अनाया कुछ पूछती— आरव के दिमाग में बस मीरा का चेहरा आता।

एक रात मीरा का मैसेज आया— अगर मुझसे प्यार करते हो, तो अनाया पर भरोसा करो।
आरव चौंक गया। मीरा अनाया को जानती थी।

तभी आरव समझ गया— ये इत्तेफाक़ नहीं था।
मीरा ने खुद आरव की ज़िंदगी में एक ढाल खड़ी की थी।

प्यार यहाँ छोड़ने का नाम नहीं था… प्यार यहाँ बचाने का नाम था। और अब सवाल ये नहीं था कि आरव किससे प्यार करता है—
सवाल ये था कि कौन ज़िंदा बचेगा।

बारिश उस रात कुछ ज़्यादा ही तेज़ थी। शहर भीग रहा था, और आरव का दिल भी। अनाया की मदद से आरव को पता चला कि मीरा कहाँ छुपी है—शहर से दूर, एक पुरानी हवेली में। ये मुलाक़ात तय नहीं थी, लेकिन टाली भी नहीं जा सकती थी।

मीरा और आरव आमने-सामने खड़े थे। बीच में एक साल की मौत, डर और खामोशी थी। मीरा ने आरव को छूने से पहले ही रोक दिया। अगर आज कुछ हो गया, तो मुझे मज़बूत रहना होगा, उसने कहा।
आरव ने जवाब नहीं दिया—उसने बस उसका माथा छू लिया।

वो रात लंबी नहीं थी, पर पूरी ज़िंदगी के बराबर थी।
दोनों ने बातें कीं, रोए, हँसे। प्यार फिर से ज़िंदा हुआ—धीमे, बिना शोर के।

सुबह होने से पहले मीरा को जाना था। गवाही के लिए।
जाते-जाते उसने आरव की हथेली पर कुछ रखा—एक अंगूठी।
अगर मैं लौट आई, तो… वाक्य अधूरा रह गया।

जैसे ही मीरा बाहर निकली, हवेली के बाहर एक गाड़ी रुकी। काँच के पीछे से किसी ने फ़ोन लगाया— वो बाहर आ गई है।आरव खिड़की से दौड़ा और पहली बार उसे लगा, ये सच में आख़िरी रात हो सकती है… कोर्ट के बाहर मीडिया की भीड़ थी। हर कैमरा उस दरवाज़े पर टिका था, जहाँ से मीरा को निकलना था। आरव दूर खड़ा था—नज़रें शांत, लेकिन दिल बेकाबू। उसे पता था, आज के बाद या तो सब खत्म होगा… या सब फिर से शुरू हो जाएगा।

मीरा ने गवाही दी। नाम लिए गए। सच बोला गया। और उस एक आवाज़ ने सालों से छुपे अपराध को उजागर कर दिया।
कोर्ट में सन्नाटा था—जैसे हर कोई साँस रोके सुन रहा हो।

तभी बाहर गोलियों की आवाज़ गूँजी। और अफरा-तफरी मच गई।
एक आदमी मीरा की तरफ़ बढ़ा— लेकिन उससे पहले अनाया उसके सामने आ खड़ी हुई।
उसने गोली खाई… और गिरते हुए मुस्कुराई।

अगले पल पुलिस ने सब संभाल लिया और केस खत्म हुआ क्योकि असली मुज़रिम को पकड़ लिया गया था। मीरा सुरक्षित थी। अनाया ज़िंदा थी—घायल, पर मज़बूत। उसकी एक ही बात थी— अब डर खत्म। कुछ महीने बाद, एक शांत सुबह। आरव और मीरा उसी नदी किनारे खड़े थे, जहाँ कभी एक झूठी मौत लिखी गई थी।

मीरा ने आरव का हाथ पकड़ा और कहा इस बार मैं कहीं नहीं जाऊँगी।आरव ने मुस्कुराकर जवाब दिया— इस बार, मैं भी इंतज़ार नहीं करूँगा।

कुछ प्यार मरते नहीं… वो बस सही वक़्त पर लौटते हैं।

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