हर इंकार की कीमत मौत!

वो मेरी ज़िंदगी में अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे घुसी थी। कभी चाय पर, कभी माँ की दवाइयों के बहाने।

माँ को वो बहुत पसंद थी, माँ हमेशा कहती थीं, लड़की शांत है… घर संभाल लेगी लेकिन मुझे उसका शांत होना कभी-कभी डराने लगता,  ज़्यादा सवाल नहीं, ज़्यादा भावनाएँ नहीं। बस सब कुछ ध्यान से देखती रहती थी।

उस शाम वो हमारे घर आई थी। माँ ने खाना बनाया, हँसी, और पहली बार देर तक बाहर टहलने की बात की।

रात को जाते हुए वो मेरे पास रुकी। बोली, कुछ रिश्ते वक़्त नहीं माँगते बस हिम्मत मांगते है। मैं कुछ समझ नहीं पाया वो क्या कहना चाहती है उसकी बातें अक्सर अजीब लगती थी की तभी उसने शादी का proposal बड़े सुकून से मेरे सामने रख दिया।
कोई दबाव नहीं, कोई आँसू नहीं। बस एक लाइन— सोच लो… ज़्यादा वक़्त नहीं है।

मैंने भी शांति से मना कर दिया।
मैं अभी तैयार नहीं हूँ- ये कहकर

उसकी आँखों में कुछ पल के लिए  कुछ अजीब-सा चमका वो ग़ुस्सा नहीं था बल्कि एसा लगा जैसे किसी ने हिसाब लगा लिया हो और फिर वो चली गई। रात के ठीक 2:17 बजे फ़ोन की घंटी ने पूरा घर हिला दिया। ये कांल हॉस्पिटल से आया था उन्होने कहा आपकी माँ का एक्सीडेंट हो गया है…

ये सुनते ही मेरे हाथ-पैर कांपने लगे और मै दौड़ा दौड़ा हॉस्पिटल पहुँचा तो हॉस्पिटल की सफ़ेद लाइट, डॉक्टर की झुकी नज़र और एक शब्द— एक्सीडेंट।
डॉक्टर बोले—
बहुत अचानक हुआ, बचा नहीं पाए।

पुलिस ने कहा—
रोड एक्सीडेंट था। इत्तेफ़ाक़ से हुआ।

लेकिन मुझे कुछ खटक रहा था। माँ उस रात घर से निकली ही क्यों? और वो भी उसी सड़क से जहाँ सालों से वो कभी नहीं गई थी?अगली सुबह वो लड़की मेरे घर आई। सफ़ेद कपड़े, शांत चेहरा।

उसने मेरी तरफ़ देखा और बस इतना कहा— मैंने कहा था ना… ज़्यादा वक़्त नहीं है। उस पल मुझे ठंड लगने लगी और तभी मुझे पहली बार लगा ये कहानी वहीं से शुरू हुई थी जहाँ मैंने कुछ समझने की कोशिश ही नहीं की।

माँ की मौत के बाद से ही मैंने उसके बारे में पूछताछ शुरू की। जो पता चला उससे नींद उड़ गई। उसके दो पुराने रिश्ते थे। पहला
एक लड़का जिसने शादी से मना किया। तीन हफ्ते बाद उसके पिता की मौत—heart attack।

दूसरा— जिसने engagement तोड़ी। कुछ दिनों में उसकी बहन accidentally डूब गई।

हर केस में पुलिस ने एक ही शब्द इस्तेमाल किया— Accident. Natural. Coincidence.

और हर funeral में वो लड़की मौजूद थी। ये सब पड़कर मै रुक ही नहीं पाया और मैंने उससे सवाल किया। तो वो बेशर्मो की तरह
मुस्कुराई। इतने बड़े इल्जाम से ना धबराई, ना चौंकी।

उलटा मुझसे कहने लगी आप डर गए हो?
मैंने पूछा—
अगर मैंने शादी के लिए हाँ कह दी होती… तो क्या मेरी माँ ज़िंदा होती?

उसने सीधा जवाब नहीं दिया।
बस बोली—
कुछ रिश्ते इंकार बर्दाश्त नहीं करते।

उसी रात
मेरे छोटे भाई का एक्सीडेंट होते-होते बचा, जिसके बाद मै समझा अब ये coincidence नहीं था बल्कि ये warning थी।

मैंने उसके फोन रिकॉर्ड्स निकलवाए। हर tragedy से कुछ घंटे पहले वो किसी अनजान नंबर पर कॉल करती थी।

वो नंबर trace किया गया— एक private ambulance service।

मतलब साफ़ था— ये हादसे नहीं थे। ये manage किए गए accidents थे।

मैं उससे मिलने गया तो इस बार डर नहीं था— ग़ुस्सा था।

मैंने कहा— ये सब तुम करवा रही हो।

वो हँसी। पहली बार खुलकर जैसे उसके अंदर कोई आत्मा धुस गई हो।

मैं किसी को नहीं मारती, वो बोली।
मैं बस ये तय करती हूँ कि किसे अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

उसने मेरी तरफ़ झुककर कहा— तुम्हारी माँ…
तुम्हें छोड़कर जा रही थी मैंने बस रास्ता आसान किया।

मेरे हाथ काँपने लगे। वो खड़ी हुई और जाते-जाते बोली—
अब सोच लो। अगला इंकार… किसके नाम होगा?

दरवाज़ा बंद हुआ और पहली बार मुझे शादी से नहीं— अगला नंबर किसका है ये सोचकर डर लगने लगा और सच बताऊ तो जीने की इच्छा भी खत्म होने लगी।

मैंने घर में हर चीज़ बदल दी। माँ की तस्वीर हटाई नहीं, लेकिन उसे देखने की हिम्मत भी नहीं बची।
हर आवाज़ पर दिल बैठ जाता था।

वो लड़की अब रोज़ कॉल नहीं करती थी बल्कि वो इंतज़ार करती थी और यही इंतज़ार सबसे ज़्यादा डरावना था।

एक शाम वो खुद मेरे घर आ गई। बिना बताए।
बिलकुल ऐसे, जैसे उसे पता हो कि मैं इस वक्त घर में अकेला हूँ।

उसने इधर-उधर देखा और बोली, घर खाली लग रहा है।

मैंने पूछा,
तुम चाहती क्या हो?

वो पहली बार गंभीर हुई।
सुरक्षा,
उसने कहा।
तुम्हारी भी… मेरी भी।

फिर उसने वो बात कही जिसने मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ा दी— अब तक जो हुआ, वो इंकार का नतीजा था लेकिन अब आगे क्या होगा, वो मुस्कुराई और बोली वो तुम्हारे फैसले पर निर्भर है।

उसी रात मुझे एक unknown नंबर से फोटो आई— मेरे छोटे भाई की वो भी लोकेशन के साथ। Message सिर्फ़ एक था:
इत्तेफ़ाक़ दो बार समझ आता है… तीसरी बार नहीं।

अब ये कहानी प्यार की नहीं रही थी बल्कि control की कहानी बन रही थी।

भाई की फोटो के बाद मैं समझ गया— ये किसी एक इंसान का खेल नहीं है। मैंने उस नंबर को trace करवाया। वो किसी mobile से नहीं, एक temporary server से आया था। मतलब— कोई network था।

मैंने एक पुराना दोस्त ढूँढा जो insurance claims में काम करता था।
उसने जो बताया, उससे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

उसने कहा हर accident से पहले एक नई insurance policy activate होती थी। Ambulance service, private hospital, और police paperwork— सब एक ही chain में जुड़े थे और हर file में एक नाम common था— उसका।

वो victims की बीवी, मंगेतर या nominee नहीं होती थी। वो बस witness होती थी हर बार। मैं उससे मिलने गया। इस बार सवाल लेकर नहीं बल्कि अपने हाथों में सबूत लेकर। मैंने कहा, तुम शादी नहीं चाहती… तुम legal access चाहती हो।

उसने बिना झूठ बोले कहा— शादी सबसे आसान रास्ता है। मैंने पूछा, अगर मैंने मना किया तो? उसकी आवाज़ ठंडी हो गई और बोली तो अगला हादसा accidental नहीं लगेगा। उसी पल मुझे एहसास हुआ— अब बचने का रास्ता हाँ या ना में नहीं है। रास्ता है— पहले मारने में।

और पहली बार मैंने उसे डरते देखा।

मैंने पहली बार उसकी फ़ाइल पूरी पढ़, वही से मुझे पता चला जो वो दिखती थी, वो कभी थी ही नहीं।

पाँच साल पहले उसकी शादी हुई थी। एक अमीर आदमी से और अचानक तीन महीने बाद वो आदमी अपने घर की सीढ़ियों से गिरकर मर गया। पुलिस ने केस बंद कर दिया। लेकिन एक detail छूट गई थी— उस रात उसने शादी की अंगूठी नहीं पहनी थी।

यहीं से सब शुरू हुआ था।

वो विधवा बनी, फिर सहानुभूति का चेहरा। लोगों के घरों में दाख़िल होना उसके लिए आसान हो जाता था। दुख बाँटने के बहाने वो कमजोर परिवारों तक पहुँचने लगी और अपना काम बिना किसी का शक बने करने लगी।

मैं समझ गया— वो किसी से शादी नहीं चाहती बल्कि वो सिर्फ कानूनी ताक़त चाहती थी। मैंने उसी रात सारा प्लान बनाया और उसे शादी के लिए हाँ कहने का नाटक किया। उसने राहत की साँस ली शायद पहली बार। लेकिन उसे नहीं पता था— मैंने शादी के काग़ज़ों में एक छोटा-सा बदलाव कर दिया था। Nominee का कॉलम खाली छोड़ दिया था। अगर कुछ होता भी… तो इस बार उसे कोई फायदा नहीं मिलता।

जब उसे ये बात पता चली, उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया जैसे किसी ने खाने का निवाला मूँह में ड़लते ड़लते छीन लिया हो और तब उसने तिलमिलाकर पहली बार कहा— तुम ये नहीं कर सकते…

मैं मुस्कुराया। क्योंकि अब खेल बराबरी का हो गया था और पहली बार उसकी हार देखकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, जैसे मैने अपनी माँ की मौत का बदला ले लिया हो।

शादी से एक रात पहले वो खुद मेरे घर आ गई और इस बार शांत नहीं थी उसकी आँखों में वही डर था जो वो अब तक दूसरों में दिखाती आई थी। घर आकर उसने कहा अगर तुम पीछे हटे, तो ये सब कुछ कभी रुक नहीं पाएगा।

मैंने बिना आवाज़ ऊँची किए जवाब दिया— रुक जाएगा, तुम बस देखती जाओ। मैंने उसके सामने insurance papers, call logs, ambulance records सारे सबूत सब फैला दिए। वो समझ गई— अब ये शादी नहीं, सर्वाइवल का खेल बन चुका है।

उसने सच कबूल किया और कहा उसे accidents से प्यार नहीं था, उसे control से प्यार था और डर के ज़रिए लोगों को बाँधना
उसकी आदत बन चुकी थी।

मैंने उसके कबूलनामा की रिकॉर्डिंग चालू रखी थी। ताकि वो पक्का सबूत बन सके और ये बचकर ना निकल पाए। ये सब होते ही मैने तुरंत सारी सूचना पुलिस को देदी क्योकि मुझे उसपर बिल्कुल यकीन नहीं था।

अगली ही सुबह पुलिस ने उसे उसके गिरफतार कर लिया और उसके पूरी टीम को उसके साथ उठा लिया। जिसके बाद  हर हादसा दोबारा खुला और हर इत्तेफ़ाक़ लगने वाला एक्सीड़ैंट भी टूट गया और पूरा सच सामने पानी की तरह साफ हो गया।

महीनों बाद, एक दिन मैं अपनी माँ की तस्वीर के सामने खड़ा हुआ बिना किसी डर के।

मैंने धीमे से कहा— अगर उसे मुझसे सिर्फ मोहब्बत होती तो माफ़ कर भी देता… पर ये साजिश थी।

फिर मैं बाहर निकला। सड़क वही थी लेकिन अब मैं पूरी कहानी और साजिश जानता था कि इत्तेफ़ाक़ एक बार होता है…
बार-बार हो, तो वो अपराध बन जाता है।

 

 

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