दिल्ली की उमस भरी शाम थी जब आर्यन ने कार स्टार्ट की। भाई, इस बार ट्रिप अधूरी नहीं छोड़ेंगे, उसने हँसते हुए कहा। पीछे की सीट पर कबीर ने स्पीकर फुल कर दिया, पहाड़ बुला रहे हैं! मानव ने चिप्स का पैकेट खोला और रोहित ने कैमरा ऑन कर दिया — पहली ऑफिशियल रोड ट्रिप, चार पागल और एक लंबा हाईवे!

कार में सिर्फ चार सीटें थीं, चार बैग थे, और चार लोगों की आवाज़ें। हँसी इतनी थी कि खिड़कियों से बाहर तक फैल रही थी। कॉलेज खत्म हुए तीन साल हो चुके थे, लेकिन दोस्ती वैसी ही थी — थोड़ी बचकानी, थोड़ी गहरी।

रात होते-होते वे शहर से दूर निकल आए। हाईवे खाली था, हवा ठंडी होने लगी थी। अचानक कबीर बोला, यार, अजीब-सा लग रहा है… जैसे कोई पीछे से हमे देख रहा हो।

रोहित हँसा और बोला, हॉरर मूवी कम देखा कर।

कुछ देर बाद एक सुनसान ढाबा दिखा। वे चाय के लिए रुक गए। बूढ़ा ढाबा मालिक उन्हें ध्यान से देखता रहा। उसने पाँच कप चाय ट्रे में रख दी।

आर्यन ने कहा, बाबा, हम चार ही हैं।

बूढ़ा हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, हाँ… अभी तो चार ही हो।

चारों ने एक-दूसरे को देखा, फिर हँसकर बात टाल दी। लेकिन जब वे वापस कार में बैठे, तो रोहित ने धीमे से कहा, कसम से, अभी मुझे लगा पीछे वाली सीट पर कोई पहले से बैठा था…

एक पल को सन्नाटा छा गया। फिर गाड़ी चल पड़ी।

उन्हें क्या पता था —
सफर में वो सचमुच अकेले नहीं थे।

सुबह की हल्की धूप कार के शीशों पर गिर रही थी जब वे शहर की सीमा के आख़िरी टोल प्लाज़ा पर पहुँचे। नींद आ रही है भाई… मानव ने जम्हाई लेते हुए कहा। आर्यन ने हँसकर जवाब दिया, पहाड़ पहुँचते ही सारी नींद उड़ जाएगी।

टोल कैमरे का फ्लैश चमका। कार आगे बढ़ गई। सब सामान्य था।

करीब एक घंटे बाद रोहित के फोन पर मैसेज आया — Your toll receipt is generated.
ओए फोटो भी आई है! उसने उत्साह से कहा।

चारों ने फोन स्क्रीन के ऊपर सिर जोड़ लिए।

पहले तो सब हँसे। फिर हँसी धीरे-धीरे रुक गई।

कार के अंदर पाँच लोग दिख रहे थे।

ड्राइवर सीट पर आर्यन। बगल में कबीर। पीछे मानव और रोहित।
और उनके बीच…

एक और चेहरा।

धुँधला, लेकिन साफ़ इतना कि वो कोई परछाईं नहीं था। उसकी गर्दन हल्की-सी झुकी हुई थी, जैसे कैमरे की तरफ देख रहा हो।

ये क्या एडिट है? कबीर ने फोन छीनकर ज़ूम किया।
मैंने कुछ नहीं किया! रोहित की आवाज़ काँप गई।

मानव ने पीछे मुड़कर खाली सीट को देखा। अभी… यहाँ कोई नहीं है, है ना?

कार में अचानक अजीब ठंड भर गई। एसी बंद था।

आर्यन ने धीमे से कहा, शायद कैमरा glitch है।

लेकिन तभी रोहित ने एक और बात नोटिस की —
फोटो में बीच वाली सीट पर हल्का-सा हाथ रखा हुआ था।

और वो हाथ…

उन चारों में से किसी का नहीं था।

कार के अंदर पहली बार सन्नाटा डर में बदलने लगा।

कार में कुछ मिनटों तक कोई नहीं बोला। हाईवे लंबा था, लेकिन अब हर किलोमीटर भारी लग रहा था। आर्यन ने रेडियो ऑन करने की कोशिश की, पर सिर्फ़ खरखराहट सुनाई दी। यार, रिलैक्स… ये बस कैमरे का एंगल होगा, उसने खुद को भी समझाने की कोशिश की।

एंगल से पाँचवाँ इंसान नहीं बनता, कबीर ने धीमे लेकिन ठंडे स्वर में कहा।

रोहित बार-बार फोटो ज़ूम कर रहा था। देखो… ये चेहरा पहले से बैठा हुआ लग रहा है। जैसे उसे पता हो कि फोटो खिंचने वाली है।

मानव ने पीछे हाथ रखकर सीट को छुआ। बीच वाली जगह खाली थी। बिल्कुल खाली। लेकिन अगले ही पल उसे अजीब-सी ठंडक महसूस हुई। तुम लोगों को सच में नहीं लग रहा कि… यहाँ कोई बैठा था?

बस कर, डर मत फैला, आर्यन झल्लाया।

तभी कबीर ने पीछे फर्श पर पड़े बैगों की तरफ इशारा किया। ये पाँचवीं पानी की बोतल किसकी है?

चारों चुप।

वे हमेशा चार बोतलें रखते थे। फिर ये अतिरिक्त बोतल कहाँ से आई?

रोहित ने धीरे से कहा, ढाबे वाले ने भी पाँच चाय रखी थी…

कार के अंदर हवा भारी हो गई।

जैसे किसी ने अनजाने में एक नाम छोड़ दिया हो।

अचानक पीछे से सीट बेल्ट के लॉक होने की हल्की-सी क्लिक आवाज़ आई।

चारों ने एक साथ रियर-व्यू मिरर में देखा।

बीच वाली सीट की बेल्ट खिंची हुई थी।

लेकिन वहाँ कोई नहीं बैठा था।

या…

उन्हें दिख नहीं रहा था।

कार अचानक सड़क किनारे रुक गई। आर्यन ने ब्रेक इतने ज़ोर से दबाए कि सब आगे को झटका खा गए। बस! अब ये मज़ाक नहीं है, उसकी आवाज़ में घबराहट साफ़ थी।

मानव ने काँपते हुए कहा, यार… हमें कुछ याद नहीं आ रहा क्या?

कुछ सेकंड सन्नाटा रहा। फिर कबीर ने धीरे से कहा, तीन साल पहले… हम इसी रूट पर आए थे ना?

रोहित का चेहरा पीला पड़ गया। हाँ… और… एक्सीडेंट हुआ था।

हवा जैसे थम गई।

तस्वीरें दिमाग में चमकने लगीं — बारिश, फिसलन, चीख, पलटी हुई कार… और अस्पताल की सफ़ेद लाइट।

हम पाँच थे… मानव की आवाज़ टूट गई।

आर्यन ने सिर झुका लिया। नहीं… हम चार थे।

कबीर ने उसकी तरफ देखा, नहीं भाई… पाँच थे। वीर भी तो था।

नाम सुनते ही जैसे किसी ने कार के अंदर अदृश्य परदा हटा दिया।

वीर।

उनका पाँचवाँ दोस्त। सबसे हँसमुख। हमेशा बीच वाली सीट पर बैठने वाला।

एक पल को सबको वो रात साफ़ याद आ गई — एक्सीडेंट के बाद डॉक्टर ने कहा था, हम कोशिश कर चुके हैं…

लेकिन उसके बाद?

किसी ने उसका नाम नहीं लिया।
किसी ने उसकी तस्वीर नहीं देखी।
जैसे चारों ने मिलकर उसे यादों से मिटा दिया।

अचानक पीछे की सीट से हल्की-सी हँसी सुनाई दी।

धीमी। जानी-पहचानी।

रियर-व्यू मिरर में एक पल को किसी की परछाईं उभरी —

बीच वाली सीट पर…

और फिर गायब।

आर्यन की आँखों में आँसू आ गए।

हमने उसे भुलाया नहीं था… उसने फुसफुसाया, हम बस… उससे भाग रहे थे।

कार फिर चल पड़ी, लेकिन अब दिशा उन्होंने नहीं चुनी थी — यादों ने चुनी थी। आर्यन ने बिना कुछ कहे स्टीयरिंग उसी पुराने पहाड़ी रास्ते की ओर मोड़ दिया। कोई विरोध नहीं हुआ। सब जानते थे, उन्हें कहाँ जाना है।

बारिश शुरू हो चुकी थी। वही हल्की, ठंडी फुहार… जैसी उस रात थी।

यहीं कहीं… रोहित ने काँपती आवाज़ में कहा।

कुछ दूर आगे सड़क का एक टूटा हुआ हिस्सा दिखा। गार्ड रेल नई लगी हुई थी। नीचे गहरी खाई अँधेरे में डूबी हुई।

आर्यन ने कार रोकी। इंजन बंद होते ही अजीब सन्नाटा छा गया।

वीर हमेशा बीच में बैठता था, मानव ने धीमे से कहा।

कबीर की आँखें भर आईं। और गाना वही लगाता था…

जैसे किसी ने जवाब में रेडियो ऑन कर दिया हो।

वही पुराना गाना बजने लगा — वही जो एक्सीडेंट वाली रात बज रहा था।

चारों जम गए।

पीछे की सीट से हल्की-सी आहट आई। इस बार डर कम था… और बोझ ज़्यादा।

आर्यन ने रियर-व्यू मिरर में देखा।

बीच वाली सीट पर धुंधली-सी आकृति बैठी थी। साफ़ नहीं… लेकिन पहचानने लायक।

वीर।

वो गुस्से में नहीं था। उसकी आँखों में शिकायत भी नहीं थी। बस इंतज़ार था।

आर्यन कार से बाहर उतरा। बारिश तेज़ हो गई। वह सड़क के किनारे खड़ा होकर चिल्लाया —

हमें माफ़ कर दे! हमने तेरा नाम लेना बंद कर दिया… क्योंकि हर बार लेने पर तू चला जाता था!

पीछे कार का दरवाज़ा अपने आप खुला।

एक ठंडी हवा का झोंका आया…

और अचानक रेडियो बंद हो गया।

सन्नाटा।

धीरे-धीरे कार के अंदर की ठंड कम होने लगी।

चारों ने एक-दूसरे को देखा।

जैसे कोई भार उतर गया हो।

लेकिन कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी।

अगली सुबह उन्हें टोल प्लाज़ा फिर पार करना था।

और कैमरा…

फिर से फ्लैश करने वाला था।

अगली सुबह किसी ने ज़्यादा बात नहीं की। पहाड़ों की हवा साफ़ थी, लेकिन उनके भीतर अब भी रात की गूँज बची हुई थी। आर्यन ने इंजन स्टार्ट किया। किसी ने पीछे की सीट की तरफ नहीं देखा।

टोल प्लाज़ा सामने था।

अगर इस बार भी… मानव ने बात अधूरी छोड़ दी।

फ्लैश चमका।

कार आगे बढ़ गई।

कुछ सेकंड तक किसी ने फोन नहीं उठाया। जैसे सब डर रहे हों उस मैसेज से। आखिर रोहित के फोन पर नोटिफिकेशन आया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

खोलूँ?

किसी ने जवाब नहीं दिया।

उसने फोटो खोली।

चारों ने स्क्रीन की तरफ देखा।

इस बार…

कार में सिर्फ़ चार लोग थे।

ड्राइवर सीट पर आर्यन। बगल में कबीर। पीछे मानव और रोहित।

बीच वाली सीट खाली थी।

चारों ने एक साथ साँस छोड़ी।

लेकिन तभी कबीर ने धीरे से कहा, ज़ूम करो…

रोहित ने तस्वीर को थोड़ा बड़ा किया।

बीच वाली सीट सच में खाली थी।

पर रियर-व्यू मिरर में…

एक धुँधली-सी मुस्कान दिख रही थी।

इतनी हल्की कि अगर ध्यान न दो तो दिखे ही नहीं।

चारों ने एक-दूसरे को देखा। इस बार डर नहीं था।

आर्यन ने बहुत धीरे से कहा, अब वो गया नहीं है… बस अपनी जगह पर है।

फोन की स्क्रीन बंद हो गई।

कार आगे बढ़ती रही।

और पीछे की सीट पर, जहाँ कभी कोई दिखता नहीं था —
अब पहली बार सचमुच खाली थी।

लेकिन कुछ रिश्ते सीटों से नहीं जुड़ते।

वो साथ चलते हैं।

बस… दिखते नहीं।

By अन्वी शब्द

मैं अन्वी हूँ। शब्द मेरे लिए सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक रहस्यमयी दुनिया के दरवाज़े हैं। मुझे उन अनकहे एहसासों को कहानी में पिरोना पसंद है जो दिल की गहराइयों में छुपे रहते हैं। मेरी कहानियों में कभी हल्की-सी मोहब्बत की खुशबू होती है, तो कभी किसी अनदेखे रहस्य की आहट। मैं चाहती हूँ कि जब आप मेरी कहानी पढ़ें, तो कुछ पल के लिए समय ठहर जाए और आप खुद को उस दुनिया का हिस्सा महसूस करें।

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