कहानी क्यों लिखी गई?
हर क़त्ल में खून ज़रूरी नहीं होता।
हर अपराध में हथियार ज़रूरी नहीं होता।कुछ अपराध धीरे-धीरे होते हैं—
इतने धीरे कि जब तक सच सामने आता है,
तब तक सब अपने-अपने सच के साथ खड़े हो चुके होते हैं।
यह कहानी उसी तरह के एक क़त्ल की है।
रामनगर पुलिस स्टेशन की वह रात आज भी दिमाग हिला देती है, रामनगर पुलिस स्टेशन की इमारत ब्रिटिश दौर की थी। छत से झूलती ट्यूबलाइटें, दीवारों पर उखड़ता प्लास्टर और हवा में बसी वो सिगरेट और पुरानी फ़ाइलों की गंध।
रात के 8 बजकर 40 मिनट।
इंस्पेक्टर विक्रम सिंह अपनी कुर्सी पर बैठे थे, लेकिन उनका दिमाग़ लगातार एक ही बिंदु पर अटका था।
मेज़ पर खुली फ़ाइल।
केस नंबर 417/24
मृतक: राकेश खन्ना
राकेश खन्ना कोई साधारण नाम नहीं था।
वह वही आदमी था जिसने रामनगर के आधे शहर को कंक्रीट में बदल दिया था।
जहाँ कभी खेत थे, वहाँ उसकी इमारतें खड़ी थीं।
जहाँ कभी लोग रहते थे, वहाँ उसके मॉल थे।
उसके खिलाफ दर्ज हुए केसों की गिनती दर्जनों में थी—
लेकिन सज़ा?
एक भी नहीं।
और अब वही आदमी मृत पड़ा था।
फार्महाउस के बेडरूम में।
अपने ही बिस्तर पर।
बिना किसी संघर्ष के निशान।
विक्रम को यह “साफ़” मौत डरावनी लग रही थी।
और तभी—
स्टेशन का गेट खुला।
सामने आया पहला क़बूलनामा — रोहित मेहरा
जो आदमी अंदर आया,
वह किसी अपराधी जैसा नहीं दिखता था।
उसकी उम्र तीस के आसपास थी।
चेहरे पर कई रातों की नींद की कमी थी।
उसने अंदर आकर सीधे कहा—
मैं आत्मसमर्पण करना चाहता हूँ।
विक्रम ने चौक कर ऊपर देखा।
और कहा, नाम?
रोहित मेहरा।
किस अपराध में?
रोहित ने बिना रुके कहा—
राकेश खन्ना की हत्या।
कमरे में अचानक अजीब सा सन्नाटा छा गया।
रोहित को बैठाया गया।
पानी दिया गया।
कैसे मारा?
विक्रम ने पूछा।
गोली से।
कब?
रात आठ बजे।
रोहित की कहानी सीधी थी।
वह राकेश की कंपनी में एक ईमानदार अकाउंट्स मैनेजर था।
काग़ज़ों की गड़बड़ी पर सवाल उठाने वाला। लेकिन एक दिन राकेश खन्ना ने उस पर ही उंगली उठा दी और धोकेबाज बना दिया|
जब मैंने मना किया,
रोहित बोला,
तो उसने मुझ पर ही घोटाले का केस डाल दिया।
उसकी नौकरी चली गई।
समाज ने शक किया।
माँ की दवाइयाँ बंद हो गईं।
मेरी माँ मर गई, इंस्पेक्टर,
रोहित की आवाज़ पहली बार टूटी,
और राकेश पार्टी दे रहा था।
उस रात वह फार्महाउस गया।
मैं उसे डराना चाहता था,
रोहित बोला,
पर गुस्सा ज़्यादा हो गया।
विक्रम ने नोट किया—
भावनात्मक ट्रिगर, पर सबूत नहीं।
और तभी—
पुलिस स्टेशन पहुचा दूसरा क़बूलनामा — अनिल खन्ना
दरवाज़ा ज़ोर से खुला।
एक आदमी तेज़ क़दमों से अंदर आया।
चेहरा लाल।
आँखों में बरसों का ज़हर।
इंस्पेक्टर साहब,
वह बोला,
इस आदमी की बात मत सुनिए।
आप कौन हैं?
अनिल खन्ना।
राकेश का छोटा भाई।
विक्रम को अब समझ आने लगा था—
यह केस सिर्फ़ अपराध नहीं,
परिवार की कब्र है।
अनिल ने कहा—
राकेश की हत्या मैंने की है।
उसकी कहानी बचपन से शुरू हुई।
पिता की मौत।
वसीयत।
काग़ज़ों में हेराफेरी।
उसने मुझे सड़क पर मरने के लिए फेक दिया,
अनिल बोला,
और खुद भगवान बनकर बैठ गया।
तरीका?
विक्रम ने पूछा।
गला दबाकर।
समय?
रात दस बजे।
दो क़बूलनामे।,दो अलग समय।,दो अलग तरीके।
और एक ही लाश।
विक्रम को इस केस पर पहली बार शक हुआ—
सच कहीं और है।
की तभी तीसरा क़बूलनामा — नैना खन्ना
रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे
एक सफ़ेद कार पुलिस स्टेशन के बाहर रुकी।
एक औरत उतरी।
उसका चेहरा शांत था।
पर आँखें थकी हुई।
मैं नैना खन्ना हूँ,
उसने कहा।
राकेश की पत्नी।
वह बैठी।
और बोली—
मैंने राकेश को मारा है।
पूरे कमरे में एक अजीब-सी ठंडक फैल गई।
नैना ने बताया—
राकेश बाहर से आदर्श पति था।
अंदर से—
नियंत्रण पसंद करने वाला, शक करने वाला, तोड़ने वाला
उसने मुझे रोज़ थोड़ा थोड़ा तड़पा तड़पा कर तोड़ दिया था।
वह मुझे मारता नहीं था,
नैना बोली,
वह मुझे हर दिन छोटा करता था।, उसने खाना बंद करवाया।, दोस्तों से मिलने पर शक।, हर बात पर परेशान किया।,
हर साँस पर निगरानी।, यहा तक मेरे जीने की इच्छा छीन ली!
कुछ मौतें एक दिन में नहीं होतीं, इंस्पेक्टर,
नैना बोली,
कुछ मौतें रोज़ होती हैं।
पोस्टमॉर्टम — सच का विस्फोट
सुबह की रिपोर्ट ने सब कुछ बदल दिया।
मौत का समय: 9:12 PM
मौत का कारण: धीमा ज़हर (ओवरडोज़)
कोई गोली नहीं
कोई गला नहीं दबाया गया
विक्रम कुर्सी पर बैठ गया।
तीनों झूठ बोल रहे थे।
और फिर भी—
तीनों अपराधी थे।
असली सच्चाई कुछ अलग ही थी — तीन रास्ते, एक अंत
जांच आगे बढ़ी।
रोहित ने दवाइयों में ज़हर मिलाया था।
अनिल ने शराब में।
नैना ने हेल्थ ड्रिंक में।
अलग-अलग दिन।
अलग-अलग कारण।
किसी को नहीं पता था
कि बाकी दो भी वही कर रहे हैं।
9:12 पर—
तीनों ज़हर मिल गए।
और शरीर ने जवाब दे दिया।
अदालत, मीडिया और समाज
कोर्ट में भीड़ थी।
मीडिया चीख रही थी।
असली क़ातिल कौन?
जज ने कहा—
यह हत्या किसी एक ने नहीं की।
यह हत्या हालात ने की।
तीनों को सज़ा मिली।
लेकिन सीमित।
पाठक से सवाल
अब कहानी खत्म होती है।
लेकिन सवाल नहीं।
अगर तीन लोग
अलग-अलग कारणों से
एक ही इंसान को धीरे-धीरे मार दें—
तो क़ातिल कौन है?
वह जिसने ज़हर मिलाया?
वह जिसने चुप्पी साधी?
या वह जिसने ताक़त का दुरुपयोग किया?
क्योंकि कुछ क़त्ल
हथियार से नहीं,
फ़ैसलों से होते हैं।
और कुछ अपराधों में
सबसे बड़ा अपराध
ख़ामोशी होती है।
इंस्पेक्टर विक्रम सिंह ने फाईल बंद की और कवर पर लिखा
“एक लाश, तीन कबूलनामा”
आरिका SuspenseLok की आधिकारिक कहानीकार पहचान है, जो चुनिंदा मौलिक कहानियों को एक भावनात्मक और काव्यात्मक शैली में पाठकों तक प्रस्तुत करती हैं। उनकी लेखनी में रहस्य, कल्पना और संवेदनाओं का सुंदर संगम देखने को मिलता है।