एक दिन की दुल्हन, नौ महीने का सच

शर्मा जी के घर में पिछले एक महीने से जैसे मेला लगा था। रिश्तेदार, फोन कॉल, पंडित की तारीखें, कपड़ों के ढेर, और हर बातचीत के अंत में वही लाइन— लड़की बहुत संस्कारी है… ज़्यादा बोलती नहीं।

लड़की का नाम था अनन्या।
लड़का—आदित्य, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, सीधा-सादा, ज़िंदगी को प्लान में जीने वाला इंसान। पहली मुलाकात ड्राइंग रूम में हुई। अनन्या सिर झुकाए बैठी थी, हाथों में चूड़ियाँ खनखनाती रहीं, पर आँखें एक पल के लिए भी नहीं उठीं। आदित्य को अजीब लगा… लड़की डरपोक नहीं लग रही थी, बस… कुछ छुपा रही थी। कुछ पूछना हो तो पूछ सकते हो, आदित्य ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

अनन्या ने सिर हिलाया—
नहीं। बस ये एक शब्द।
लेकिन इस एक शब्द में भी अजीब-सी थकान थी।

मेहंदी में सब नाचे, गाए। अनन्या की हथेलियाँ भर गईं, पर चेहरे पर वो चमक नहीं थी जो आमतौर पर दुल्हनों में होती है। रात को उसकी माँ ने पूछा— सब ठीक है न?

अनन्या ने झूठी मुस्कान के साथ कहा—हाँ माँ पर उसी रात… वो देर तक बाथरूम में बंद रही। और जब बाहर आई, उसकी आँखें लाल थीं। सबसे सोचा कि बिदाई का दर्द उसकी आखो में झलका है।

शादी का दिन आ गया, सब खुश थे बारात दुल्हन को लेने पहुच चुकी थी और दुल्हन भी आ गई थी, दोनों की जोड़ी की खूब तारीफ हो रही थी लेकिन शादी में आदित्य ने महसूस किया अनन्या हर फेरे में जैसे लड़खड़ा रही थी।

तबीयत ठीक है?
उसने धीरे से पूछा।

हाँ,
वही जवाब।
हमेशा वही।

विदाई के वक्त अनन्या ने अपनी माँ को कुछ ज़्यादा कसकर गले लगाया। जैसे कोई जानता हो कि आगे कुछ बहुत बड़ा होने वाला है। दुल्हा दुल्हन घर पहुचे और आराम करने के लिए कमरे में चले गए, कमरे में सन्नाटा था। फूलों की खुशबू, लेकिन हवा भारी आदित्य ने बात शुरू करने की कोशिश की और कहा हम धीरे-धीरे एक-दूसरे को समझेंगे।

अनन्या अपनी काँपती आवाज़ में बोली अगर… अगर आपको कोई सच अचानक पता चले तो?

आदित्य चौंका—
कौन-सा सच?

अनन्या ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला और फिर चुप हो गई और कुछ नहीं, कहकर वो बिस्तर के एक कोने में बैठ गई। उस रात अनन्या सोई नहीं और आदित्य को पहली बार लगा ये शादी जितनी सीधी दिख रही है, उतनी नहीं है और कबी लगा शायद शादी की थकान है। सुबह होते-होते अनन्या के चेहरे का रंग पीला पड़ चुका था। वो पेट पर हाथ रखे बैठी थी…जैसे अंदर कोई तूफ़ान उठ रहा हो पहले तो वो सहती रही पर जब बरदाश्त से बाहर हुआ तो उसने धीमी आवाज़ में कहा—आदित्य… मुझे बहुत तेज़ दर्द हो रहा है।

आदित्य घबरा गया। उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ये दर्द उसकी ज़िंदगी को उलटने वाला है। सुबह के सात बजे थे। अनन्या का दर्द अब सहने से बाहर जा चुका था। वो बिस्तर पर सिकुड़ चुकी थी, माथे से पसीना बह रहा था। उसने तड़पती आवाज़ में कहा, आदित्य… अब नहीं सह पा रही… उसकी आवाज़ टूट रही थी।

आदित्य घबरा गया। नई-नई शादी, पहली सुबह, और ये हालत—बिना कुछ सोचे उसने कार निकाली और सीधा नज़दीकी अस्पताल की ओर दौड़ा। रास्ते में अनन्या बार-बार एक ही बात कह रही थी— मुझे माफ़ कर देना… आदित्य ने सोचा— दर्द में है, घबरा रही है।

नर्स ने व्हीलचेयर निकाली। अनन्या को अंदर ले जाया गया। डॉक्टर—मिडिल एज, सख़्त चेहरा—ने जल्दी-जल्दी सवाल पूछे।

दर्द कब से?
तेज़ है या रुक-रुक कर?
पहले भी ऐसा हुआ है?

अनन्या ने जवाब देने की कोशिश की… लेकिन हर संकुचन के साथ उसकी चीख निकल जाती। डॉक्टर ने अचानक नर्स से कहा— CTG लगाइए। आदित्य चौंका। डॉक्टर, ये क्या है? डॉक्टर ने बिना उसकी तरफ़ देखे कहा— अभी बात मत कीजिए। मशीन लगी। स्क्रीन पर कुछ लकीरें चलने लगीं। डॉक्टर की भौंहें सिकुड़ गईं।

डॉक्टर अचानक खड़े हुए। सीधे आदित्य की तरफ़ देखा और बोले ये लेबर पेन है। कमरे में सन्नाटा हो गया। आदित्य को लगा किसी ने मज़ाक किया है। सॉरी? उसकी आवाज़ लड़खड़ा गई। डॉक्टर ने दोहराया— आपकी पत्नी को लेबर पेन शुरू हो चुका है।आदित्य हँस पड़ा। लेकिन ये हँसी नहीं… एक झटका था। डॉक्टर, कल ही हमारी शादी हुई है। एक दिन में बच्चा… ये कैसे हो सकता है? डॉक्टर ने फाइल बंद की।आवाज़ ठंडी थी—बच्चा एक दिन में नहीं होता, मिस्टर।

आदित्य ने अनन्या की तरफ़ देखा। वो छत को घूर रही थी। अनन्या… ये क्या कह रहे हैं ये लोग? तुम ही कुछ बोलो! उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। मैं बताना चाहती थी… लेकिन हिम्मत नहीं हुई… आदित्य का सिर घूमने लगा।

नर्स ने फुसफुसाकर डॉक्टर से कहा— मैडम… ये केस नॉर्मल नहीं लग रहा। डॉक्टर ने आदित्य को बाहर बुलाया और कहा देखिए, प्रेगनेंसी फुल-टर्म है। और एक बात… डॉक्टर रुके। आदित्य की साँस अटक गई। इस बच्चे की डिलीवरी आज ही हो जाएगी। आदित्य दीवार से टिक गया। उसके दिमाग़ में एक ही सवाल घूम रहा था— अगर बच्चा आज पैदा होगा… तो ये बच्चा है किसका?

डिलीवरी रूम के बाहर लाल बत्ती जल उठी। अंदर अनन्या की चीखें। बाहर आदित्य का टूटा हुआ भरोसा। और उसके कानों में गूँज रहा था डॉक्टर का आख़िरी वाक्य— सच चाहे जो भी हो… वो अब बाहर आने वाला है। डिलीवरी रूम के बाहर घड़ी की सुइयाँ रुक-सी गई थीं। आदित्य बेंच पर बैठा था, सिर दोनों हाथों में थामे।

हर चीख उसके सीने में हथौड़े की तरह लग रही थी। कल तक जो अजनबी थी… आज माँ बनने वाली है। और मैं…?

तभी नर्स की आवाज़ आई और बोली— बधाई हो।

आदित्य ने सिर उठाया। बधाई…? उसके गले से आवाज़ नहीं निकली। बेटा हुआ है, नर्स बोली। काँच के उस पार— एक छोटा-सा बच्चा, लाल-सा चेहरा, बंद आँखें। आदित्य का दिल धड़क गया। अजीब बात ये थी— बच्चा… उसे अपना-सा लग रहा था बच्चे को देखते ही उसका दिल पिघलने लगा। मैं… मैं अंदर आ सकता हूँ? उसने हिचकिचाते हुए पूछा। डॉक्टर ने उसे रोका। एक मिनट।

उन्होंने एक फाइल आगे बढ़ाई। आपका ब्लड ग्रुप O पॉज़िटिव है? हाँ। और आपकी पत्नी का— AB नेगेटिव। आदित्य ने सिर हिलाया। डॉक्टर ने गहरी साँस ली। बच्चे का ब्लड ग्रुप… B पॉज़िटिव है। आदित्य चुप हो गया। वो साइंस जानता था। ये मैच… नामुमकिन नहीं था, लेकिन सवाल फिर भी वही— प्रेगनेंसी कब की है?

अनन्या ICU में थी। कमज़ोर, पीली, लेकिन होश में। आदित्य उसके पास गया। उसने धीरे से कहा— सच बता दो। आज सब खत्म हो जाएगा। अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले। मैंने तुम्हें धोखा नहीं दिया… उसने काँपती आवाज़ में कहा। फिर ये बच्चा—?

अनन्या ने मुँह मोड़ लिया। ये बच्चा… मेरी एक गलती का नहीं— मेरी एक मजबूरी का नतीजा है, आदित्य चौंका। कौन-सी मजबूरी? अनन्या ने जवाब देने के लिए मुँह खोला… और तभी— मॉनिटर की बीप तेज़ हो गई। नर्स दौड़कर आई। प्लीज़ बाहर जाइए! आदित्य को फिर से बाहर धकेल दिया गया फिर थोड़ी देर बाद एक आदमी अस्पताल में घुसा। लगभग पचास साल का। चेहरा सख़्त, आँखें तेज़। उसकी नज़र सीधे आदित्य पर गई।आप ही आदित्य हैं? उसने पूछा। जी… आप कौन? वो आदमी रुका, फिर बोला— मैं अनन्या का मामा हूँ। आदित्य ने कभी उसका ज़िक्र नहीं सुना था। आपको सब सच जानना है? मामा ने धीमी आवाज़ में पूछा।

तो याद रखिए— ये शादी संयोग नहीं थी। आदित्य के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

शादी…
प्रेगनेंसी…
और ये अचानक आया मामा—

सब किसी बड़ी साज़िश की तरह जुड़ता जा रहा था और उसके दिमाग़ में सिर्फ एक सवाल था, क्या वो इस कहानी का पति है…
या सिर्फ एक मोहरा?

रात के दो बज चुके थे। अस्पताल का कॉरिडोर सुनसान था। आदित्य और अनन्या का मामा आमने-सामने बैठे थे। बीच में कॉफी रखी थी, पर किसी ने हाथ नहीं लगाया। मामा ने धीरे से कहा आप सोच रहे होंगे कि आपकी ज़िंदगी एक झूठ पर शुरू हुई। आदित्य ने थकी आवाज़ में कहा— सोचना नहीं पड़ रहा… दिख रहा है। मामा ने आँखें बंद कीं। तो अब सुनिए अनन्या की असली कहानी।अनन्या की शादी तय हुई थी। लड़का अमीर, रसूख़दार और बाहर से बिल्कुल शरीफ़। शादी से पहले एक रस्म के बहाने—वो उसके घर बुलाया गया। जो हुआ… वो अनन्या ने किसी को नहीं बताया। बस इतना कहा— मैं उस शादी के लायक़ नहीं रही। पर सच्चाई ये थी— वो रिश्ता जबरदस्ती का था। कुछ महीनों बाद अनन्या को पता चला— वो गर्भवती है।

घर में भूचाल आ गया। लड़के के परिवार ने साफ़ कह दिया— अगर बात बाहर गई, तो जान से मार देंगे। मामा ने आदित्य की आँखों में देखा। हम पुलिस नहीं जा सकते थे, समाज नहीं समझता। तो क्या किया? आदित्य ने कड़वे स्वर में पूछा। मामा ने जवाब दिया— एक शादी ढूँढी। एक ऐसा लड़का… जो साफ़-सुथरा हो, पढ़ा-लिखा हो, और सबसे ज़रूरी— जो अनन्या को इंसान समझे। आदित्य समझ चुका था कि उसे चुना गया था।

तो मैं क्या था? आदित्य की आवाज़ काँप रही थी। एक कवर स्टोरी? मामा ने सिर झुकाकर कहा हाँ। वो शब्द गोली की तरह लगे।लेकिन— मामा ने जल्दी से जोड़ा, अनन्या ने शादी से मना कर दिया था। उसने कहा था मैं किसी की ज़िंदगी बर्बाद नहीं कर सकती। आदित्य ने चौंककर देखा। तो फिर…? मामा की आँखें भर आईं और बोले अगर आप मना कर देते… तो अनन्या टूट जाती। और अगर आप हाँ कर देते तो आप फँस जाते।

उसी पल ICU से नर्स बाहर आई और कहा मरीज़ आपसे मिलना चाहती है, उसने आदित्य से कहा। आदित्य उठ खड़ा हुआ। उसके सामने अब तीन रास्ते थे—

  • सच स्वीकार करना
  • सब छोड़कर चले जाना
  • या उस बच्चे को अपनाना
    जो उसका नहीं था…
    लेकिन अब उसके नाम से जुड़ चुका था और अंदर, अनन्या… उससे एक आख़िरी सवाल पूछने वाली थी।

ICU का दरवाज़ा धीरे से खुला। आदित्य अंदर गया। अनन्या बिस्तर पर लेटी थी—कमज़ोर, लेकिन आँखों में अजीब-सी शांति थी।
उसे देखते ही उसके होंठ काँपे। आप चले तो नहीं जाएँगे न?
उसने सीधे पूछ, आदित्य चुप रहा… अनन्या ने आँसू रोकते हुए कहा मुझे पता है, मेरे सच ने आपकी ज़िंदगी हिला दी। आदित्य ने पहली बार उस पर ग़ुस्सा नहीं, थकान से भरी नज़र डाली। तुमने मुझसे सच क्यों नहीं कहा? मैं शायद समझ सकता था।

अनन्या ने सिर हिलाया। मैं डरती थी… कि आप मुझे नहीं, मेरे अतीत को देखेंगे, कमरे में कुछ सेकंड सन्नाटा रहा। आदित्य ने जेब से एक रिपोर्ट निकाली। डॉक्टर ने बताया, उसने कहा, डिलीवरी में तुम्हारी हालत इसलिए बिगड़ी क्योंकि… तुम्हें पहले से पता था— ये आख़िरी मौका हो सकता है। अनन्या की आँखें भर आईं। हाँ, उसने धीमे से कहा। मुझे बताया गया था… कि मैं दोबारा माँ नहीं बन पाऊँगी।

इसलिए नहीं बताया, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि कोई मुझसे दया से शादी करे। आदित्य खिड़की के पास गया। बाहर सुबह हो रही थी। उसने पीछे मुड़कर कहा— मैं उस बच्चे का पिता नहीं हूँ जिस तरह समाज समझता है। अनन्या का दिल बैठ गया। लेकिन…  आदित्य आगे बोला, मैं वो आदमी बन सकता हूँ जो उसे छोड़कर नहीं जाएगा। अनन्या फूट-फूट कर रो पड़ी।

कुछ दिन बाद—

अस्पताल के डिस्चार्ज गेट पर आदित्य ने बच्चे को गोद में उठाया। नर्स ने मुस्कराकर कहा— नाम क्या रखेंगे? आदित्य ने अनन्या की तरफ़ देखा। सत्य, उसने कहा। क्योंकि झूठ से शुरू हुई ज़िंदगी
सच के साथ आगे बढ़ेगी। अनन्या ने उसकी ओर देखा— पहली बार बिना डर के।

ये कहानी धोखे की नहीं थी। ये कहानी थी—

  • समाज के डर की
  • सच छुपाने की मजबूरी की
  • और उस इंसान की
    जो पिता बना खून से नहीं…
    फ़ैसले से।

कुछ रिश्ते वक़्त से नहीं, हिम्मत से पूरे होते हैं।

 

 

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