एक दिन की दुल्हन, नौ महीने का सच
शर्मा जी के घर में पिछले एक महीने से जैसे मेला लगा था। रिश्तेदार, फोन कॉल, पंडित की तारीखें, कपड़ों…
शर्मा जी के घर में पिछले एक महीने से जैसे मेला लगा था। रिश्तेदार, फोन कॉल, पंडित की तारीखें, कपड़ों…
शाम की लोकल ट्रेन में कुछ लोग रोज़ चढ़ते हैं, कुछ रोज़ उतरते हैं और देखा जाए तो ये रोज़…
उससे पहली मुलाक़ात बिल्कुल फ़िल्मी नहीं थी। ना बारिश थी, ना स्लो मोशन। बस एक जेल की दीवार थी… और…
उसने जाते वक़्त बस एक ही बात कही थी— इंतज़ार करना… मैं लौटूँगी। उस पल उसकी आँखों में मैंने कोई…
कमरा नंबर 302—होटल की तीसरी मंज़िल पर, पीछे की ओर बना वो कमरा, जो दिन के उजाले में भी अजीब…
रेलवे स्टेशन सुबह-सुबह किसी ज़िंदा शहर जैसा होता है— घड़ियों की टिक-टिक, चाय की केतली, ट्रेन की सीटी, और भागते…