जो भी Viral होता है, गायब हो जाता है

शहर में ये बात धीरे-धीरे नहीं, अचानक फैली थी—जो भी रातों-रात viral होता है, कुछ ही दिनों में गायब हो जाता है। पहले लोग इसे इत्तेफ़ाक समझते रहे। कोई influencer था, कोई local singer, कोई street artist—सबका एक सा ही pattern था। एक वीडियो, लाखों views, खबरों में नाम, और फिर… चुप्पी। सोशल मीडिया से … Read more

शादी के बाद दुल्हन की रिपोर्ट में लिखा था: Already Dead

अक्सर जब लड़को की पड़ लिखकर अच्छी नौकरी लग जाती है तो घर में माँ जवान बेटे के लिए एक सुंदर और सुशील लड़की ढूड़ना शुरू कर देती है और आम जिंदगी में एसा ही होता भी है। एसे ही राघव की माँ ने भी अपने बेटे के लिए लड़की ढूंड़ी, राघव को कभी शक … Read more

एक दिन की दुल्हन, नौ महीने का सच

शर्मा जी के घर में पिछले एक महीने से जैसे मेला लगा था। रिश्तेदार, फोन कॉल, पंडित की तारीखें, कपड़ों के ढेर, और हर बातचीत के अंत में वही लाइन— लड़की बहुत संस्कारी है… ज़्यादा बोलती नहीं। लड़की का नाम था अनन्या। लड़का—आदित्य, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, सीधा-सादा, ज़िंदगी को प्लान में जीने वाला इंसान। पहली मुलाकात … Read more

कुछ लोग लौटते नहीं, बस मिलते हैं

शाम की लोकल ट्रेन में कुछ लोग रोज़ चढ़ते हैं, कुछ रोज़ उतरते हैं और देखा जाए तो ये रोज़ की जिंदगी का आम सा हिस्सा है लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो किसी स्टेशन पर नहीं उतरते— बस एक याद में अटक जाते हैं। अर्जुन भी उन्हीं में से था। हर शाम वो … Read more

मोहब्बत थी… या सज़ा?

उससे पहली मुलाक़ात बिल्कुल फ़िल्मी नहीं थी। ना बारिश थी, ना स्लो मोशन। बस एक जेल की दीवार थी… और मैं, जो वहाँ एक crime story cover करने गया था। वो सलाखों के उस पार खड़ी थी। आँखों में डर नहीं, बल्कि ऐसा सुकून जैसे उसने सब पहले से स्वीकार कर लिया हो। उसने मुझसे … Read more

उसने कहा था इंतज़ार करना… मैं मर गया

उसने जाते वक़्त बस एक ही बात कही थी— इंतज़ार करना… मैं लौटूँगी। उस पल उसकी आँखों में मैंने कोई झूठ नहीं देखा। बस एक अजीब-सी मजबूरी थी, जैसे वो खुद भी अपने फैसले से डर रही हो। मैं रोज़ शाम उसी बेंच पर बैठता, जहाँ आख़िरी बार वो हँसी थी। वही जगह, वही समय… … Read more

अधूरी मोहब्बत का पता — कमरे नंबर 302

कमरा नंबर 302—होटल की तीसरी मंज़िल पर, पीछे की ओर बना वो कमरा, जो दिन के उजाले में भी अजीब तरह से उदास लगता था । होटल के बाकी कमरों में जहाँ आवाज़ें, हँसी, सूटकेस के पहियों की खड़खड़ाहट और ज़िंदगी की हलचल रहती थी, वहीं 302 के सामने आते ही सब कुछ जैसे ठहर … Read more

प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 पर कोई इंतज़ार करता है

रेलवे स्टेशन सुबह-सुबह किसी ज़िंदा शहर जैसा होता है— घड़ियों की टिक-टिक, चाय की केतली, ट्रेन की सीटी, और भागते हुए क़दम। लेकिन इस स्टेशन पर एक प्लेटफ़ॉर्म ऐसा भी था जिसका नाम लोग लेते तो थे, पर उस पर रुकते बहुत कम थे। प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4। वहाँ भी पटरियाँ थीं, वहाँ भी ट्रेनें रुकती … Read more