जिस दिन वो लौट आई

आरव और मीरा की कहानी किसी फ़िल्म जैसी नहीं थी। वो लाइब्रेरी के कोने में शुरू हुई थी—खामोश, सच्ची और बिना वादों के। मीरा कम बोलती थी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसा सच था, जो आरव को हर बार खींच लाता। दोनों जानते थे, ये प्यार आसान नहीं होगा… फिर भी उन्होंने उसे चुना। … Read more

उसने मुझे बचाया… या फँसाया?

राहुल अपने दोस्तों के साथ कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठा हुआ था। तभी उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी —उस लड़की का नाम था, शालिनी। उसकी मुस्कान में कुछ ऐसा था कि राहुल खुद को रोक न सका और उसके पास जाकर दोस्ती का हाथ बड़ा दिया वो लड़की भी राहुल की दोस्ती को कबूल … Read more

हर इंकार की कीमत मौत!

वो मेरी ज़िंदगी में अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे घुसी थी। कभी चाय पर, कभी माँ की दवाइयों के बहाने। माँ को वो बहुत पसंद थी, माँ हमेशा कहती थीं, लड़की शांत है… घर संभाल लेगी लेकिन मुझे उसका शांत होना कभी-कभी डराने लगता,  ज़्यादा सवाल नहीं, ज़्यादा भावनाएँ नहीं। बस सब कुछ ध्यान से देखती … Read more

जुर्म जो दीवारों में दफ़्न था

हर जुर्म खून से नहीं होता। कुछ जुर्म ऐसे होते हैं, जो सालों तक सांस लेते रहते हैं— दीवारों के भीतर, फाइलों के नीचे, और सबसे ज़्यादा… क़ातिल के भीतर। हर रात ठीक 2:17 AM। ना 2:16 ना 2:18 ठीक 2:17 पर आरव मल्होत्रा की नींद उसी सेकंड टूटती थी। उसका फोन vibrate नहीं करता … Read more

एक लाश, तीन क़बूलनामा — सच जो किसी एक का नहीं था

 कहानी क्यों लिखी गई? हर क़त्ल में खून ज़रूरी नहीं होता। हर अपराध में हथियार ज़रूरी नहीं होता। कुछ अपराध धीरे-धीरे होते हैं— इतने धीरे कि जब तक सच सामने आता है, तब तक सब अपने-अपने सच के साथ खड़े हो चुके होते हैं। यह कहानी उसी तरह के एक क़त्ल की है। रामनगर पुलिस … Read more