अधूरी मोहब्बत का पता — कमरे नंबर 302

कमरा नंबर 302—होटल की तीसरी मंज़िल पर, पीछे की ओर बना वो कमरा, जो दिन के उजाले में भी अजीब तरह से उदास लगता था । होटल के बाकी कमरों में जहाँ आवाज़ें, हँसी, सूटकेस के पहियों की खड़खड़ाहट और ज़िंदगी की हलचल रहती थी, वहीं 302 के सामने आते ही सब कुछ जैसे ठहर … Read more

वो जो मेरी मोहब्बत थी… और मेरी क़ातिल भी

उसकी हँसी में कुछ ऐसा था जो सीधे दिल पर वार करता था। ना ज़्यादा तेज़, ना ज़्यादा मीठी—बस इतनी कि सुनते ही लगे, यही है। मैं उसे पहली बार बारिश की एक शाम में मिला था। वो सड़क किनारे खड़ी, भीगी हुई, उसके काले बाल चेहरे से चिपके हुए… और आँखों में अजीब सी … Read more

प्यार ने जो किया, मौत भी नहीं कर पाई

कहते हैं कुछ मुलाक़ातें इत्तेफ़ाक़ नहीं होतीं — वो पहले से तय होती हैं। मुझे इस बात पर कभी यक़ीन नहीं था… जब तक अनाया मेरी ज़िंदगी में नहीं आई थी । बारिश की वो शाम थी। पुरानी लाइब्रेरी, गीली ज़मीन की मिट्टी की ख़ुशबू, और खिड़की से टकराती बूंदें। मैं —आरव, अपनी अधूरी ज़िंदगी … Read more

उसने मेरी रूह में उतरकर मुझे बदल दिया।

कभी-कभी डर सिर्फ़ हमारे सामने नहीं होता। वो हमारी आंखों में, हमारे दिल में, हमारे दिमाग में, हमारे कमरे में, हमारे अंदर ही अंदर छुपा होता है और सामने आने से कतराता है। मुझे नहीं पता था कि उस काली रात होने वाली घटना मेरी ज़िंदगी को इस तरह बदल देगी। और एक आईना — … Read more

प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4 पर कोई इंतज़ार करता है

रेलवे स्टेशन सुबह-सुबह किसी ज़िंदा शहर जैसा होता है— घड़ियों की टिक-टिक, चाय की केतली, ट्रेन की सीटी, और भागते हुए क़दम। लेकिन इस स्टेशन पर एक प्लेटफ़ॉर्म ऐसा भी था जिसका नाम लोग लेते तो थे, पर उस पर रुकते बहुत कम थे। प्लेटफ़ॉर्म नंबर 4। वहाँ भी पटरियाँ थीं, वहाँ भी ट्रेनें रुकती … Read more