शादी के बाद दुल्हन की रिपोर्ट में लिखा था: Already Dead

अक्सर जब लड़को की पड़ लिखकर अच्छी नौकरी लग जाती है तो घर में माँ जवान बेटे के लिए एक सुंदर और सुशील लड़की ढूड़ना शुरू कर देती है और आम जिंदगी में एसा ही होता भी है।

एसे ही राघव की माँ ने भी अपने बेटे के लिए लड़की ढूंड़ी, राघव को कभी शक करना नहीं आया क्योकि उसे माँ की पसंद पर पूरा भरोसा था।
माँ-पापा ने कहा— लड़की सीधी है, ज़्यादा बोलती नहीं तो उसने मान लिया। लड़की का नाम था काव्या।

पहली मुलाक़ात में काव्या ने ज़्यादा बात नहीं की बस एक अजीब-सी बात कही— अगर कभी कोई काग़ज़ दिखाऊँ तो डरिएगा मत।

राघव हँस दिया। उसे लगा— नर्वस है तो कुछ भी बोल रही है।

शादी धूमधाम से हुई। फोटो, हँसी, रिश्तेदार— सब कुछ वैसा ही जैसा होना चाहिए, बस एक चीज़ अलग थी—
काव्या ने शादी में कहीं भी साइन नहीं किए थे।

शादी के तीसरे दिन काव्या को चक्कर आया तो राघव घबरा गया और उसे अस्पताल ले गया। वहा पहुचकर डॉक्टर ने कहा— रूटीन चेकअप है, कोई बड़ी बात नहीं।

रिसेप्शन पर फॉर्म भरते समय क्लर्क ने आधार नंबर डाला। कंप्यूटर रुका फिर स्क्रीन पर एक लाइन आई—

STATUS: DEAD
DATE: 5 YEARS AGO

उसे लगा कोई GLITCH होगा क्लर्क ने दोबारा देखा। फिर राघव को देखा और बोला सर… आप जिस महिला को लेकर आए हैं…
वो सरकारी रिकॉर्ड में ज़िंदा नहीं है।

राघव हँस पड़ा और बोला कोई ग़लती होगी भाई, लेकिन डॉक्टर का चेहरा उस वक्त बहुत सख़्त हो गया। डॉक्टर ने मेज़ की दराज़ खोली और एक मोटी फाइल बाहर निकाली। काग़ज़ पुराने थे, किनारे पीले पड़ चुके थे—जैसे वक़्त ने भी उन्हें छू लिया हो। डॉक्टर ने चश्मा ठीक किया और पढ़ना शुरू किया—

मिस काव्या शर्मा।
एक्सीडेंट—साल 2019।
लोकेशन—हाइवे नंबर 7।
डेड बॉडी रिकवर की गई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट कम्प्लीट।

हर लाइन राघव के कानों में हथौड़े की तरह पड़ रही थी। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसे लगा जैसे कमरे की दीवारें सिकुड़ रही हों।

ये… ये कैसे हो सकता है? राघव की आवाज़ ये कहते हुए काँप रही थी। अगर ये मर चुकी थी… तो जिससे मैंने शादी की… वो कौन है? डॉक्टर ने फाइल बंद की उसकी आँखों में हैरानी नहीं, डर था। वो थोड़ी देर चुप रहा, फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोला—

देखिए, दो ही सच्चाइयाँ हो सकती हैं या तो ये औरत वही नहीं है जो रिकॉर्ड में दर्ज है…
वो रुका। या फिर किसी ने काग़ज़ों में मौत लिख दी… और असल ज़िंदगी में, मौत को ज़िंदा छोड़ दिया।

कमरे में सन्नाटा छा गया। घर लौटते वक्त राघव ने गाड़ी रोक दी और काव्या से कहा अब सच बताओ तुम कौन हो? काव्या ने पहली बार आँखों में आँख डालकर देखा और कहा मैं वही हूँ… जिसे तुमने शादी में देखा।लेकिन जिसे सिस्टम ने मार दिया।

उसने बताया—पाँच साल पहले उसका बहुत बड़ा एक्सीडेंट हुआ था। वो कोमा में चली गई थी और जिंदा बच पाना ना के बराबर था, परिवार वालो ने सोचा, इलाज में पैसे क्यो बर्बाद करे जब ये बचेगी ही नहीं तो उसे छोड़ दिया जिसके बाद काग़ज़ों में उसे मार दिया गया। इसके बाद भी उसके घर वालो का फूहड़पन खत्म नहीं हुआ और उन लालचियों ने उसके नाम पर बीमा, ज़मीन, पैसा—सब बाँट लिया। लेकिन वो ज़िंदा बच गई और जब होश आया तो दुनिया में उसकी जगह पूरी तरह ख़त्म हो चुकी थी।

राघव ने गाड़ी की स्पीड धीमी कर दी। सड़क पर लाइट्स पीछे छूटती जा रही थीं, लेकिन उसके दिमाग़ में सवाल अटका था। उसने बिना काव्या की तरफ़ देखे पूछा तो… मुझसे शादी क्यों?

कुछ पल तक सिर्फ़ इंजन की आवाज़ थी। फिर काव्या ने बोलना शुरू किया। क्योंकि एक मरी हुई औरत, उसकी आवाज़ काँपी,
अकेली ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रह सकती।

राघव ने उसकी तरफ़ देखा तो उसकी आँखों में डर नहीं, थकान थी। मेरे पास न पहचान थी, न नाम, न कोई ऐसा रिश्ता जिसे मैं दिखा सकूँ। वो रुकी, गहरी साँस ली।

मुझे किसी के सहारे नहीं किसी काग़ज़ की ज़रूरत थी।
एक ऐसा रिश्ता… जिसे कोई अदालत, कोई रिकॉर्ड, कोई सिस्टम रद्द न कर सके।

उसने धीमे से कहा—और शादी… शादी सबसे मज़बूत दस्तावेज़ होती है। राघव चुपचाप काव्या की बातें सुनता रहा क्योंकि उसे समझ आ गया था ये शादी धोखे से नहीं, ज़िंदा रहने की लड़ाई से पैदा हुई थी।

कुछ दिन बाद सुबह-सुबह घर के बाहर पुलिस की गाड़ी आकर रुकी। दरवाज़े पर खड़े अफ़सरों के हाथ में वही फाइल थी—
जिसने एक औरत को काग़ज़ों में मार दिया था। जाँच खुली और पूरा सच बाहर आया।

बीमा का पैसा, ज़मीन के काग़ज़, और वो झूठा डेथ सर्टिफिकेट— सब एक सोची-समझी साज़िश का हिस्सा थे।

परिवार के लोग, जिन पर काव्या ने सबसे ज़्यादा भरोसा किया था, उन्हीं पर आरोप तय हुए। कोई रोया नहीं, कोई सफ़ाई नहीं दी।
सबको जेल भेज दिया गया। थाने में राघव से आख़िरी सवाल पूछा गया— आप इस शादी को मानते हैं? क्योंकि रिकॉर्ड में ये औरत अब भी मरी हुई है। राघव ने जवाब देने से पहले काव्या की तरफ़ देखा।

वो चुपचाप खड़ी थी ज़िंदा, साँस लेती हुई, कि तभी राघव ने शांत आवाज़ में कहा— काग़ज़ इंसान को नहीं तय करते और जो ज़िंदा है… उसी से रिश्ता होता है और उसी पल, काव्या पहली बार सच में आज़ाद हुई। राघव की इस सोच ने जैसे उसे नया जीवन दे दिया हो।

काग़ज़ों में काव्या आज भी मरी हुई है जैसे सरकारी रिकॉर्ड, फाइलें और सिस्टम सब जगह आज भी उसे एक बंद केस मानते हैं लेकिन राघव की ज़िंदगी में वो हर सुबह साँस लेती हुई हक़ीक़त है। चाय बनाते हुए, खिड़की से आती धूप में खड़ी, और उन छोटी-छोटी बातों में जहाँ इंसान का ज़िंदा होना महसूस होता है।

वो पहली बार डर के बिना हँसती है। पहली बार किसी नाम से पुकारे जाने पर पीछे मुड़ती है। कभी-कभी मौत सच नहीं होती— वो सिर्फ़ काग़ज़ों की चाल होती है और कभी-कभी शादी कोई रस्म नहीं… वो एक औरत को दोबारा दुनिया में जगह देने का नाम होती है। इस कहानी में कोई चमत्कार नहीं था। बस एक इंसान था… जो ज़िंदा को ज़िंदा मान गया और वही…
उसकी नई ज़िंदगी की शुरुआत थी।

 

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