उसने जाते वक़्त बस एक ही बात कही थी—
इंतज़ार करना… मैं लौटूँगी।

उस पल उसकी आँखों में मैंने कोई झूठ नहीं देखा। बस एक अजीब-सी मजबूरी थी, जैसे वो खुद भी अपने फैसले से डर रही हो।
मैं रोज़ शाम उसी बेंच पर बैठता, जहाँ आख़िरी बार वो हँसी थी। वही जगह, वही समय…
बस फर्क इतना था कि अब उसकी वो हँसी वहां नहीं थी।

दिन हफ्तों में बदले, हफ्ते महीनों में।
लोग बदल गए, मौसम बदल गया—
पर वो नहीं लौटी।

फिर एक रात, जब बारिश सड़कों को धो रही थी, वो अचानक सामने खड़ी थी उसे देखते ही मेरे होश खो गए जैसे मै उससे पहली बार मिल रहा हूँ। सफ़ेद सूट, भीगे बाल, और वही पुरानी मुस्कान।
बोली, तुम इतनी जल्दी थक गए?

दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। मैंने उसका हाथ पकड़ना चाहा— लेकिन मेरी उँगलियाँ ठंड से काँप गईं, जैसे मैंने किसी ज़िंदा इंसान को नहीं बल्कि किसी याद को छू लिया हो।

वो धीरे से बोली,
कल मिलेंगे… उसी जगह और गायब हो गई।

अगली सुबह अख़बार खोला तो मेरी सांस अटक गई।
पहले पन्ने पर मेरी ही तस्वीर थी—
युवक की रहस्यमयी मौत, शव रेलवे ट्रैक के पास मिला।

और तब समझ आया—
जिसे वो इंतज़ार कह रही थी, वो मेरी ज़िंदगी का आख़िरी वक़्त था क्योंकि मैं अब ज़िंदा नहीं था। अब मुझे वक्त का एहसास नहीं होता था। दिन–रात, सुबह–शाम… सब एक-सा हो चुका था। मैं उसी जगह खड़ा रहता जहाँ मेरा अंत हुआ था और घंटो देखता रहता— रेलवे ट्रैक के पास, हवा में फैली लोहे और मौत की गंध के बीच।

और वो…
वो हर रोज़ वहां आती थी।

सफ़ेद फूल हाथ में लिए, धीमे कदमों से मेरी क़ब्र तक।
ना ज़ोर से रोती, ना चिल्लाती। बस बैठती और ऐसे बात करती जैसे मैं उसके सामने ही बैठा हूँ।

मैंने कहा था ना, मैं लौटूँगी…
वो मुस्कुराकर कहती।

पहली बार मुझे ग़ुस्सा आया।
मैंने चीखकर पूछा, अगर इतना ही प्यार था, तो मुझे मरने क्यों दिया?

वो चौंकी नहीं।
बस सिर झुकाकर बोली,
क्योंकि मुझे कहा गया था कि यही रास्ता है।

उसने बताया— एक आदमी था, जो अंधेरे में जीता था।
उसने वादा किया था कि वो हमारे प्यार को कभी खत्म नहीं होने देगा।

बस एक शर्त थी— तुम्हारी मौत।

मेरे भीतर कुछ टूट गया।
और उसी पल मैंने महसूस किया— जिसे मैं प्यार समझ रहा था,
वो तो एक सौदा था और सौदे अभी खत्म नहीं हुए थे।

उस रात क़ब्रिस्तान में हवा अजीब तरह से भारी थी, पेड़ों की पत्तियाँ बिना हवा के हिल रही थीं।
वो मेरे सामने बैठी थी, लेकिन उसकी नज़र बार-बार पीछे जा रही थी— जैसे उसे किसी का इंतज़ार हो।

तभी मैंने उसे काँपते हुए कहते सुना, वो आने वाला है…मुझे उसकी ये बाते बहुत अजीब लग रही थी और मेरे मन में बेचैनी हो रही थी। और फिर—
अंधेरे से एक परछाईं बाहर निकली। कदमों की आवाज़ नहीं थी, पर ज़मीन जैसे खुद रास्ता दे रही हो।

वो आदमी रुका, मेरी क़ब्र के ठीक सामने।
उसकी आँखें खाली थीं— ना ग़ुस्सा, ना दया।

इंतज़ार पूरा हुआ,
उसकी आवाज़ जैसे मिट्टी के नीचे से आ रही हो।
अब अगली क़ुर्बानी तय होगी।

वो रो पड़ी।
आपने कहा था… बस वही!

वो हँसा।
प्यार कभी एक जान में संतुष्ट नहीं होता।

मेरे भीतर कुछ जल उठा। मैंने पहली बार महसूस किया— मैं उसे छू सकता हूँ और हवा काँप उठी।

वो आदमी मेरी तरफ़ मुड़ा, और पहली बार बोला—
मुर्दे बदला नहीं लेते।

मैं मुस्कुराया।
क्योंकि अब मुझे डर नहीं लगता था।

मैं मर चुका था।
और यही मेरी सबसे बड़ी ताक़त थी।

उस रात पहली बार मैंने उसे सच में टूटते देखा।
वो मेरी क़ब्र के पास बैठी थी, हाथ काँप रहे थे, आँखें सूजी हुईं—
लेकिन रो नहीं रही थी।

मैंने धीरे से पूछा,
तुमने मुझसे क्या छुपाया है?

वो चुप रही फिर अचानक बोली, मैंने तुम्हें सिर्फ़ प्यार नहीं किया था…
मैं डर गई थी।

उसने बताया— जिस दिन उसने मुझसे इंतज़ार करने को कहा था, उसी दिन वो उस आदमी से मिली थी।
उस आदमी ने उसे दो रास्ते दिए थे—या तो वो मुझे हमेशा के लिए खो दे, या फिर मुझे मरता हुआ देखे…
और बदले में मुझे हमेशा अपने पास रखे।

मैं कमज़ोर पड़ गई, वो सिसकते हुए बोली, मैंने सोचा… मरने के बाद भी तुम मेरे रहोगे।

उस पल मुझे दर्द नहीं हुआ बल्कि उसकी नासमझी में मुझे ग़ुस्सा आया।

मैंने उससे पूछा,
अगर मैं मना करता, तो?

उसने मेरी तरफ़ देखा—
और वही जवाब मेरी रूह चीर गया।

तुम्हें बताया ही नहीं गया…
क्योंकि सौदे में तुम्हारी मर्ज़ी थी ही नहीं।

तभी पीछे से वही ठंडी आवाज़ आई—
अब समझे, मुर्दे?
प्यार नहीं… अधिकार था।

और मुझे एहसास हुआ—
मैं सिर्फ़ मरा नहीं था।
मुझे चुना गया था।इस धोके के लिए

उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे कुछ याद करना ही सबसे बड़ा गुनाह हो।

जिस दिन तुम आख़िरी बार मुझसे मिले थे…
वो बोली, उसी दिन सब तय हो चुका था।

उस आदमी ने सब कुछ पहले से प्लान किया था।
मुझे कहाँ बुलाना है, किस वक़्त बुलाना है, और किस बहाने से मुझे अकेला छोड़ना है।

वो बोली, मैंने कहा था कि तुम स्टेशन तक छोड़ने आओ।
और फिर मैंने कहा— तुम यहीं रुको, मैं बस अभी आई।

वो अभी…
कभी नहीं आना था।

वो आदमी पहले से ट्रैक के पास मौजूद था।
उसने मुझे धक्का नहीं दिया। उसने बस इतना कहा—
इंतज़ार करते-करते लोग खुद आगे बढ़ जाते हैं।

और मैं…
मैं एक क़दम आगे बढ़ गया। जैसे कदम मेरे हो लेकिन कन्ट्रोल वो कर रहा हो।

जब मुझे होश आया, तो सब खत्म हो चुका था।

मैं चिल्लाया और पूछा
तुम वहाँ थीं?

उसकी आवाज़ काँप गई।
हाँ… दूर खड़ी तुम्हारी मौत देख रही थी। अगर देखती नहीं, तो सौदा पूरा नहीं होता।

उस पल मुझे समझ आया— मेरी मौत एक हादसा नहीं थी। वो एक तमाशा थी जो मेरे प्यार ने मेरे लिए बनाया था।

और सबसे डरावनी बात?
वो आदमी अब भी चाहता था कि कहानी यहीं खत्म न हो।

क्योंकि अब…
अगली बारी उसकी थी।

उस रात पहली बार मुझे अपनी ताक़त का एहसास हुआ।
मैं हवा नहीं था… मैं ग़ुस्सा था।

क़ब्रिस्तान में मोमबत्तियाँ अपने आप बुझने लगीं।
पेड़ों की शाखाएँ झुक गईं, जैसे किसी अदृश्य बोझ को सह नहीं पा रही हों।

वो आदमी मुस्कुरा रहा था। तुम क्या कर लोगे? मरे हुए लोग सिर्फ़ यादें बनते हैं।

मैंने क़दम आगे बढ़ाया तो ज़मीन काँपी। उसकी हँसी पहली बार थमी।

मैंने कहा,
तुम्हारी सबसे बड़ी गलती पता है क्या? तुमने मुझे सिर्फ़ मरता देखा… लेकिन ये नहीं देखा कि मरने के बाद मैं क्या बनूँगा।

वो लड़की पीछे हट गई।
उसकी आँखों में डर था— लेकिन अब उसमें पछतावा भी था।

मैं अब सौदे का हिस्सा नहीं बनूँगी, वो चिल्लाई लड़की की हिम्मत देखते ही, वो आदमी ग़ुस्से से गरजा और तिलमिला कर बोला तुम देर कर चुकी हो अब तुम्हारी बारी है।

तभी मैंने उसका हाथ पकड़ लिया क्योकि मै अपने प्यार के साथ कुछ गलत होता नहीं देख सक्ता था और वो ठंड से चीख उठा।
उसकी उँगलियों से खून नहीं, काली राख गिरने लगी। उसने पहली बार चौकते हुए कहा, ये मुमकिन नहीं है…

मैं झुका,और उसके कान में फुसफुसाया— इंतज़ार तुमने सिखाया था… अब भुगतने की बारी तुम्हारी है।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। क्योंकि आख़िरी फ़ैसला अभी लिया जाना बाकी था और वो अंजान आदमी कौन था?, ये सब क्यों कर रहा था? ये भी अभी तक रहस्य बना हुआ था।

वो आदमी कोई आम इंसान नहीं था। वो डर, पछतावे और अधूरे प्यार से ताक़त लेने वाली शक्ति थी।

उसका मानना था:

“जो प्यार मौत से होकर गुज़रे, वही अमर होता है।”

वो ऐसे लोगों को ढूँढता था जो प्यार में कमज़ोर, डर में अंधे, और खोने से डरे हुए हों।                                                             हर मौत उसके लिए ताक़त, उम्र, और अंधेरे पर पकड़ बन जाती थी।

लड़का उसकी क़ुर्बानी था और लड़की उसकी चाबी क्योकि यहा ड़र लड़की को था औऱ उस आदमी ने इसी ड़र का फाएदा उठाया लड़की को दिखाया—तुम्हारे बिना उसकी ज़िंदगी, अकेलापन, तुम्हें खोने का डर और फिर अपनी बातों में फसाकर पूरी तरह उसके दिमाग पर काबू पाया फिर एक झूठा सहारा दिया:

“वो मरेगा, लेकिन तुम्हें कभी छोड़ेगा नहीं।”

डर ने प्यार को ढक लिया और उसने बहुत बड़ी गलती कर दी। लेकिन आज कुछ अलग था क्योकि आज उस आदमी की आँखों में  डर था वही डर जो उसने दूसरों में बोया था।

मैंने कहा,
तुम प्यार को अमर बनाना चाहते थे… आज देखो, अमर कौन बना।

वो पीछे हटने लगा।
लेकिन ज़मीन ने उसका साथ छोड़ दिया।

वो लड़की रोते हुए बोली,मुझे गलती का एहसास हो गया है।

वो आदमी हँसा—रास्ता सिर्फ़ मौत में होता है।

मैंने क़दम आगे बढ़ाया तो हवा सन्न हो गई।

नहीं,
मैंने कहा
रास्ता स्वीकार में होता है और अब तुझे स्वीकार करना होगा कि तू एक कमजोर शक्ति है।

मैंने उसे अपनी मौत लौटा दी।
सारी चीखें, सारी क़ुर्बानियाँ—
सब उसी में समा गईं।

वो आदमी राख बन गया।

सुबह पहली बार सूरज
मेरी क़ब्र पर पड़ा।

वो लड़की आई,
फूल रखे…
और कहा, अब मैं इंतज़ार नहीं करूँगी।

और तब— मैं चला गया।

क्योंकि कुछ प्यार मरकर नहीं बल्कि छोड़कर पूरे होते हैं।

 

 

By अन्वी शब्द

मैं अन्वी हूँ। शब्द मेरे लिए सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक रहस्यमयी दुनिया के दरवाज़े हैं। मुझे उन अनकहे एहसासों को कहानी में पिरोना पसंद है जो दिल की गहराइयों में छुपे रहते हैं। मेरी कहानियों में कभी हल्की-सी मोहब्बत की खुशबू होती है, तो कभी किसी अनदेखे रहस्य की आहट। मैं चाहती हूँ कि जब आप मेरी कहानी पढ़ें, तो कुछ पल के लिए समय ठहर जाए और आप खुद को उस दुनिया का हिस्सा महसूस करें।

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