कमरा नंबर 302—होटल की तीसरी मंज़िल पर, पीछे की ओर बना वो कमरा, जो दिन के उजाले में भी अजीब तरह से उदास लगता था । होटल के बाकी कमरों में जहाँ आवाज़ें, हँसी, सूटकेस के पहियों की खड़खड़ाहट और ज़िंदगी की हलचल रहती थी, वहीं 302 के सामने आते ही सब कुछ जैसे ठहर जाता। रिसेप्शन पर बैठा लड़का अक्सर उसकी चाबी देते वक्त नज़रें चुरा लेता, और सफ़ाईकर्मी उस फ्लोर पर देर तक रुकने से कतराते। कहा जाता था कि इस कमरे में ठहरने वाले प्रेमी जोड़े हमेशा किसी न किसी वजह से टूट जाते—कोई अचानक चला जाता, कोई बिना अलविदा कहे गायब हो जाता, और कोई ऐसा भी था जो वापस लौटकर कभी पहले जैसा नहीं रहा। लोग इसे अफ़वाह कहते थे, लेकिन होटल के पुराने रजिस्टर में दर्ज नाम—अधूरे पते, कटे हुए साइन और खाली तारीख़ें—कुछ और ही कहानी बयां करते थे।
रवि को ये सब बाते बकवास लगती थी। वो तर्क पर भरोसा करने वाला इंसान था। प्यार, डर, भूत—ये सब उसके लिए सिर्फ़ इंसानी दिमाग़ की कमज़ोरियाँ थीं। लेकिन उस दिन, जब उसने होटल की लॉबी में उसे देखा, तो पहली बार उसके भीतर कुछ अजीब सा हिला। नीली आँखें—बहुत गहरी, जैसे उनमें कोई पुराना सागर छुपा हो। नाम बताया गया—अनामिका। मुस्कुराती थी, लेकिन उस मुस्कान में अधूरापन था, जैसे कोई बात हो जो वो कहना चाहती हो, पर हर बार शब्द उससे पहले थक जाते हों। उसकी मौजूदगी में रवि को बार-बार ऐसा लगा जैसे वो उसे पहले से जानता हो—या शायद बहुत पहले कहीं खो चुका हो। वो आम मुलाक़ात नहीं थी, ये एहसास रवि को उसी पल हो गया था। और अनजाने में, बिना समझे, वो उस कहानी की ओर खिंच चुका था… जिसकी शुरुआत कमरा नंबर 302 से होती थी।
रवि ने जब अनामिका के साथ लिफ्ट में कदम रखा, तो उसे पहली बार एहसास हुआ कि होटल की हवा सामान्य नहीं थी। लिफ्ट ऊपर जाती हुई नहीं लग रही थी, बल्कि जैसे किसी और ही दिशा में सरक रही हो। पीतल की दीवारों में उसका प्रतिबिंब धुँधला था—चेहरा उसका था, पर आँखों में वो भाव नहीं थे जिन्हें वो पहचानता हो। अनामिका बिल्कुल पास खड़ी थी, फिर भी उनके बीच अजीब सी दूरी थी, जैसे कोई अदृश्य दीवार हो। लिफ्ट के अंदर कोई संगीत नहीं बज रहा था, सिर्फ़ मशीन की धीमी साँसें और एक हल्की-सी टिक-टिक, जो किसी घड़ी की नहीं लगती थी।
तीसरी मंज़िल पर लिफ्ट रुकी। गलियारा लंबा था, ज़रूरत से ज़्यादा लंबा। पीली बत्तियाँ एक-एक करके जल रही थीं, मानो उनके आने की सूचना पहले ही दे दी गई हो। दीवारों पर टंगे फ्रेम—पुरानी तस्वीरें—हर बार देखने पर बदलती हुई लगती थीं। कहीं किसी जोड़े की मुस्कान अधूरी थी, कहीं किसी चेहरे को जानबूझकर खुरच दिया गया था। रवि ने महसूस किया कि वो अकेला नहीं देख रहा—ये गलियारा भी उन्हें देख रहा था।
तुम यहाँ कितनी बार आई हो?” रवि ने पूछा।
अनामिका ने बिना उसकी तरफ़ देखे कहा, जितनी बार मोहब्बत ने बुलाया।
कमरा 302 सामने था। दरवाज़ा बंद था, फिर भी भीतर से ठंडक रिस रही थी। नंबर प्लेट पुरानी थी, रवि का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा—ऐसी धड़कन जो डर से नहीं, किसी अनजाने आकर्षण से पैदा होती है। अनामिका ने चाबी निकाली, लेकिन ताला खोलने से पहले उसकी उँगलियाँ रुक गईं।
अगर अंदर आए, उसने धीरे कहा, तो हर सवाल का जवाब नहीं मिलेगा… कुछ सवाल हमेशा के लिए रह जाएंगे।
रवि ने सिर हिलाया और इस पहली मुलाकात में ही बिना उसे जाने उससे आर्कषित होकर उसके पीछे चला गया क्योकि वो नहीं जानता था कि दरवाज़े के उस पार सिर्फ़ एक कमरा नहीं—बल्कि उसकी अपनी अधूरी सच्चाइयाँ उसका इंतज़ार कर रही थीं।
दरवाज़ा खुलते ही कमरे की हवा जैसे साँस ले रही हो। ठंडी, भारी और बहुत पुरानी एक अजीब सी महक थी इसमे। एक ऐसी गंध जो ना सीलन की थी, ना धुएँ की—बल्कि किसी भूले हुए वक़्त की। कमरे में कदम रखते ही रवि को लगा जैसे फर्श थोड़ा नरम है, मानो किसी ने बहुत देर तक यहाँ खड़े होकर इंतज़ार किया हो और कमरा खुलने से पहले ही यहाँ से गया हो। दीवारें पास आती हुई लग रही थीं, या शायद वो खुद सिमट रहा था।
कमरे के बीचोंबीच एक पुराना पलंग था। चादर सलीके से बिछी हुई, लेकिन उस पर सिलवटें ऐसी थीं जैसे अभी-अभी कोई उठा हो, उस कमरे में हर चीज़ सिर्फ किसी के थोड़े ही देर पहले होने का एहसास दिला रही थी। सामने दीवार पर बड़ा सा आईना—दरारों से भरा—जो पूरे कमरे को नहीं, सिर्फ़ अधूरे हिस्सों को दिखा रहा था। रवि ने जब उसमें देखा, तो उसने खुद को देखा… लेकिन अनामिका वहाँ नहीं थी।
तुम्हें डर लग रहा है? अनामिका की आवाज़ पीछे से आई।
रवि मुड़ा। वो पलंग के पास खड़ी थी, पर उसकी परछाईं दीवार पर कुछ ज़्यादा ही लंबी थी।
नहीं, रवि ने बड़ी सफाई से झूठ बोला।
अनामिका हल्के से मुस्कुराई, यह कमरा झूठ पहचान लेता है।
तभी घड़ी ने आवाज़ की—टिक… टिक…
दीवार पर टंगी घड़ी की सुइयाँ उल्टी चल रही थीं।
ये सब क्या है? रवि ने धबराकर पूछा।
अनामिका ने पलंग के नीचे से एक पुराना रजिस्टर निकाला। उसमें नाम थे—सैकड़ों। हर नाम के आगे एक तारीख़… और अंत में खाली जगह।
रवि की सिट्टी पिट्टी गुल हो गई उसने रजिस्टर देखते ही कहा ये लोग, उसने कहा, जो पूरा प्यार लेकर आए थे, लेकिन पूरा होकर नहीं जा पाए।
रवि के हाथ काँपने लगे।
और तुम?
अनामिका ने फीकी मुस्कान के साथ कहा। मैं भी कभी पूरी थी।
अचानक कमरे की बत्ती बुझ गई। आईना चमका—और उसमें अब सिर्फ़ एक चेहरा था। अनामिका का। पर वो वैसी नहीं थी जैसी सामने खड़ी थी। आँखों में वही नीला रंग था, लेकिन उनमें दर्द था… इंतज़ार था।
मेरा प्यार अधूरा रह गया, रवि, आईने से आवाज़ आई और अधूरी मोहब्बत यहाँ सज़ा बन जाती है। कमरे की दीवारों पर कई सारी तस्वीरें उभर आईं—अनामिका, किसी और के साथ। मुस्कुराती हुई। फिर वही तस्वीर टूटी हुई। खून के निशान। बंद दरवाज़ा।
तुम मुझे यहाँ क्यों लाई?
रवि की आवाज़ काँप रही थी, लेकिन अब उसमें डर से ज़्यादा बेचैनी थी—जैसे कोई सच जानने के बहुत क़रीब आ गया हो।
अनामिका ने उसकी तरफ़ देखा। पहली बार उसकी आँखों में वो चमक नहीं थी जो डर पैदा करती थी। वहाँ थकान थी। बहुत पुरानी।
क्योंकि तुम समझ सकते हो, उसने कहा। हर कोई नहीं समझ पाता… कोई इतना ठहरता ही नहीं।
उसी पल दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
कमरे की हवा और ठंडी हो गई, लेकिन वो ठंड अब सिर्फ़ कमरे की नहीं थी—वो अनामिका के भीतर जमी हुई पीड़ा की ठंड थी।
अगर मैं चला जाऊँ तो? रवि ने धीरे से पूछा।
अनामिका ने नज़रें झुका लीं।
तो मेरी कहानी यहीं रह जाएगी, उसकी आवाज़ टूट गई, और मैं भी… इसी कमरे में।
रवि ने आईने की तरफ़ देखा। उसे एहसास हुआ—कमरा उसे रोक नहीं रहा था। कोई ताक़त उसे क़ैद नहीं कर रही थी। वो खुद रुका हुआ था। किसी डर से नहीं, बल्कि उस लड़की के दर्द से, जो खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाई थी। रवि ने पूछा तुम्हे किस बात का पछतावा है उसने कहा मेरे प्रेमी ने मुझे इस कमरे में बुलाया था लेकिन मै आ नहीं पाई और वो मुझसे बहुत दूर चला गया तभी से मै यहा हर लड़के में उसे ढूंड़ती हू और भटक्ती हूँ।
वो अनामिका के क़रीब गया। बहुत धीरे जैसे ज़रा-सी जल्दबाज़ी सब तोड़ देगी।
उसने उसका हाथ थामा। इस बार वो ठंडा नहीं था—उसमें एक थरथराहट थी, जैसे कोई बरसों बाद इंसानी स्पर्श को याद कर रहा हो।
रवि ने अनामिका की जरूरत को समझा और उसकी आँखों में देखते हुए कहां, तुम अधूरी इसलिए नहीं हो कि तुमसे गलती हुई, बल्कि तुम अधूरी इसलिए हो क्योंकि तुमने खुद को सज़ा दे दी।
अनामिका की आँखें भर आईं।
बरसों से थामा हुआ दोष पहली बार ढीला पड़ा।
कमरा जैसे साँस लेने लगा।
दीवारें काँपीं—ग़ुस्से से नहीं, बोझ उतरने से।
घड़ी की सुइयाँ रुक गईं—जैसे वक़्त ने उसे माफ़ कर दिया हो।
आईना चटक कर टूट गया।
उसमें अब कोई अक्स नहीं था—ना डर का, ना अपराधबोध का।
और दरवाज़ा बड़ी ताज़गी के साथ खुल गया जैसे कोई नई शुरूआत हुई हो।
सुबह की रोशनी कमरे में फैली—नरम, सुकून भरी।
अनामिका वहाँ नहीं थी।
लेकिन हवा में पहली बार डर नहीं था।
सिर्फ़ एक आज़ादी थी—जो प्यार से मिली थी, सहानुभूति से।
रवि बाहर निकला। पीछे मुड़कर देखा—कमरा 302 अब आम सा लग रहा था।
रिसेप्शन पर रजिस्टर में एक नाम अपने आप जुड़ गया था… और उसके आगे तारीख़ पूरी थी।
रवि समझ गया—
अधूरी मोहब्बत कभी पूरी नहीं होती,
लेकिन अगर कोई उसे स्वीकार कर ले,
तो वो सज़ा नहीं रहती…
वो मुक्त हो जाती है।
कमरा 302 अब भी मौजूद है।
लेकिन वो सिर्फ़ उन्हीं को बुलाता है
जो अपने दिल के अधूरे हिस्सों से भागते नहीं।