वो जो मेरी मोहब्बत थी… और मेरी क़ातिल भी

उसकी हँसी में कुछ ऐसा था जो सीधे दिल पर वार करता था।
ना ज़्यादा तेज़, ना ज़्यादा मीठी—बस इतनी कि सुनते ही लगे, यही है।

मैं उसे पहली बार बारिश की एक शाम में मिला था। वो सड़क किनारे खड़ी, भीगी हुई, उसके काले बाल चेहरे से चिपके हुए… और आँखों में अजीब सी उदासी। उसने जब मेरी तरफ़ देखा, तो ऐसा लगा जैसे कोई मुझे सालों से जानता हो।

तुम्हें डर नहीं लगता?
उसने अचानक पूछा।

किससे?
मैंने हसकर कहाँ।

ख़ुद से।
उसकी आवाज़ में मज़ाक नहीं था।

उस दिन से हम मिलने लगे। कॉफ़ी, लंबी बातें, अधूरी कहानियाँ।
वो अपने बारे में बहुत कम बताती थी, और मैं उससे बहुत ज़्यादा पूछता नहीं था—क्योंकि प्यार सवाल नहीं करता, भरोसा करता है।

रातें बदलने लगीं। उससे मिलने के बाद जब पहली बार सपना आया— मैं एक अँधेरे कमरे में बंद था। दीवारों पर खून के निशान थे और सामने… वही खड़ी थी। उसके हाथ में चाकू था। आँखों में वही शांति, वही उदासी। मैं चीख़ना चाहता था, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। वो मेरी तरफ़ बढ़ी… और मेरी नींद टूट गई।

सुबह मैं पसीने से भीगा हुआ उठा और देखा—वो तो मेरी बाँहों में ही सो रही थी।

डरावना सपना आया?
उसने मेरी धड़कन सुनते हुए पूछा।

मैंने झूठ बोला,
नहीं… बस तुम ज़्यादा क़रीब हो इसलिए धड़कने तेज़ है।

उसने मुस्कुराकर आँखें खोलीं और बोली कभी-कभी सपने सच से ज़्यादा ईमानदार होते हैं। उस दिन के बाद सपने रोज़ आने लगे। हर रात वो मुझे मारती… लेकिन हर सुबह वही मुझे प्यार से जगाती और सबसे डरावनी बात ये नहीं थी बल्कि ये थी कि मरते वक़्त भी… मैं उससे नफ़रत नहीं कर पा रहा था। उस सुबह उसकी आँखों में कुछ बदला हुआ था। वही चेहरा, वही ख़ूबसूरती… लेकिन मुस्कान के पीछे जैसे कोई बात छुपी हो।

आज मेरे साथ चलोगे?
उसने बड़े प्यार से पूछा।

कहाँ?
मैंने आदतन सवाल किया।

एक जगह है… जहाँ सच खुद बोलने लगता है।

हम शहर से बाहर निकले। रास्ते में वो खिड़की से बाहर देखती रही, जैसे किसी याद से भाग रही हो। मैं उसे देखता रहा—और सोचता रहा कि कोई इतना शांत होकर इतना डरावना सपना कैसे बन सकता है, जहां वो मुझे ले गई वो जगह बहुत सुनसान थी। एक पुरानी, अधजली इमारत।

यहीं?
मेरी आवाज़ में पहली बार डर था।

उसने जवाब नहीं दिया। सीधे अंदर चली गई। अंदर की बदबू ने उल्टी सा एहसास दिलाया और तभी… मेरी नज़र ज़मीन पर पड़ी।एक लाश।

आँखें खुली हुईं।
चेहरा जला हुआ।
और सीने पर गहरे घाव।

मेरे पैर लड़खड़ा गए।
ये… ये क्या है?, तुम कौन हो?, यहां क्यो लाई हो? कई सवाल मेरे मन में चलने लगे…  उसने पहली बार मेरी तरफ़ बिना किसी डर के देखा। सपनों में जो देख रहे हो, वो यहीं से शुरू हुआ था।

मेरी साँस रुक गई।
तुम्हें कैसे पता… मेरे सपनों के बारे में?

वो मेरे क़रीब आई। इतनी क़रीब कि उसकी साँस मेरी गर्दन से टकराई और कहा क्योंकि हर सपना तुम्हारा नहीं होता। तभी उसकी नज़र मेरी कलाई पर पड़ी वहीं जहाँ सपने में चाकू लगता था।

दर्द होता है न?
उसने उँगली से हल्का सा दबाया।

मैंने हाथ तुरंत पीछे खींच लिया।
तुम कौन हो?

उसने पहली बार हँसकर कहा—
वही जो तुम हर रात देखते हो।

और फिर वो मुझे वापस ले आई। रास्ते भर एक शब्द नहीं बोला। उस रात सपना फिर आया।

इस बार मैं भाग रहा था और वो पीछे-पीछे नहीं थी…
वो मेरे आगे खड़ी थी और चाकू मेरे हाथ में था कि अचानक मैं चीख़ कर उठा वो मेरे सामने बैठी थी जैसे मेरे ही उठने का इंतज़ार कर रही हो।

अब समझ आ रहा है?
उसने धीरे से पूछा।

मैंने पहली बार सोचा— शायद ये कहानी प्यार की नहीं है। शायद ये क़त्ल की शुरुआत है। उस रात के बाद मैं उसे देखता था,
लेकिन पहचान नहीं पाता था वो मेरी मोहब्बत थी— पर अब हर मुस्कान के पीछे मुझे एक सवाल दिखता था।

तुम्हारा कोई अतीत है?
मैंने अचानक पूछा।

वो चुप रही काफी देर तक फिर बोली, कुछ अतीत जिए नहीं जाते… सिर्फ़ भुगते जाते हैं।

अगले दिन मैं अकेले उस अधजली इमारत के पास पहुँचा। दिल कह रहा था—वहाँ कुछ छूटा है। पास के गाँव में पूछताछ की।
एक बूढ़ी औरत ने नाम लिया—

अनामिका।

तीन साल पहले ग़ायब हो गई थी,
उसने कहा।
आँखों में डर था… और किसी से बहुत प्यार।

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

मैंने तस्वीर देखी।
वही चेहरा।
वही आँखें।

लेकिन नाम अलग था।

उस शाम जब मैं लौटा, वो आईने के सामने खड़ी थी।

अनामिका कौन है?
मेरी आवाज़ काँप रही थी।

आईने में उसकी आँखें उठीं पर वो मेरी तरफ़ नहीं देख रही थी।

एक लड़की…
जिसे किसी ने इतना तोड़ दिया कि वो दो ज़िंदगियों में बँट गई।

और तुम?
मैंने पूछा।

वो मेरी तरफ़ मुड़ी।
आँखों में आँसू थे—पर डर नहीं।

मैं वही हूँ जो बच गई।

उस रात सपना बदला हुआ था। इस बार वो ज़मीन पर थी खून में लथपथ और मैं उसके ऊपर खड़ा था।

तुमने कहा था ना,
उसने खून से सनी मुस्कान के साथ कहा,
कि तुम मुझे कभी छोड़ोगे नहीं?

मैं पीछे हट गया।
ये सपना नहीं है…

नहीं,
उसने फुसफुसाया।
ये याद है।

मैं नींद से जागा तो मेरे हाथ काँप रहे थे और बाथरूम के आईने पर लाल रंग से लिखा था—

क़ातिल वही होता है
जो आख़िरी बार याद रखता है।

अब सवाल सिर्फ़ ये नहीं था कि वो कौन है—

सवाल ये था कि मैं क्या हूँ?

आईने पर लिखे वो शब्द मैं धोना चाहता था, लेकिन पानी डालते ही वो और गहरे हो गए। जैसे कोई कह रहा हो—
सच मिटता नहीं, बस इंतज़ार करता है। वो कमरे में नहीं थी, पहली बार मुझे उसकी कमी नहीं…
उसकी मौजूदगी डरावनी लगी। अचानक मोबाइल बजा। एक अनजान नंबर।

अंजान भारी आवाज़ ने कहा अगर अनामिका के बारे में जानना है तो आज शाम रेलवे कॉलोनी आ जाना। दिल ने मना किया। दिमाग़ चिल्लाया—मत जा। पर प्यार… वो अब भी मुझे घसीट रहा था। रेलवे कॉलोनी के आख़िरी मकान में एक आदमी व्हीलचेयर पर बैठा था। आँखों में डर जम चुका था।

वो लड़की दो नहीं थी,
उसने बिना भूमिका के कहा,
वो एक ही थी…
पर उसे दो बना दिया गया।

किसने?
मैंने पूछा।

उसने मेरी तरफ़ देखा।
सीधे।

तुमने।

मुझे हँसी आ गई।
पागल है, सोचा।

तीन साल पहले,
वो बोलता रहा,
तुम यहाँ आया करते थे।
उससे कहते थे—
अगर तुम मेरी नहीं हुई, तो किसी की नहीं होओगी।

मेरे कानों में सीटी सी बजने लगी।

वो लड़की भागना चाहती थी, उसने कहा, पर हर बार तुम उसे वापस खींच लाते थे। प्यार नहीं था वो… क़ैद थी।

मैं पीछे हट गया।
झूठ है।

तभी किसी ने पीछे से मेरा हाथ पकड़ा। वो खड़ी थी। आँखों में आँसू नहीं— थकान थी।

अब भी झूठ लग रहा है? उसने पूछा।

रेलवे कॉलोनी की लाइट चली गई।अंधेरा छा गया और पहली बार मुझे एहसास हुआ—
वो मुझे मार नहीं रही थी सपनों में। वो मुझे याद दिला रही थी कि क़ातिल कभी बाहर नहीं होता। वो अंदर ही रहता है।

उस रात मैं उसे रोक सकता था या शायद… मैं चाहता ही नहीं था।

रेलवे कॉलोनी का अंधेरा अब भी आँखों में तैर रहा था, वो मेरे सामने खड़ी थी—
कोई भूत नहीं, कोई सपना नहीं। एक ज़िंदा सच्चाई।

मुझे याद क्यों नहीं आता?
मैंने लगभग गिड़गिड़ाते हुए पूछा।

उसने मेरे सीने पर हाथ रखा। जहाँ दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था।

क्योंकि तुमने यादों को भी क़ैद कर दिया था,
वो बोली।
जैसे मुझे।

उस रात हम पुराने घर पहुँचे वही घर जहाँ प्यार शुरू हुआ था और शायद वहीं खत्म होना था। अंदर वही कुर्सी थी। वही दीवारें और ज़मीन पर सूखा हुआ खून— जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं था। व्हीलचेयर वाला आदमी भी वहीं था अब उसकी आँखों में डर नहीं…
दुआ थी।

तुम्हें सच कबूल करना होगा,
वो बोला।
वरना ये सब रुकेगा नहीं।

मेरा सिर फटने लगा। फ्लैशबैक की तरह सब लौटने लगा—

अनामिका रो रही थी। मैं चिल्ला रहा था। मैंने कहा था— अगर चली गई, तो मार डालूँगा और मैंने… मार डाला था अचानक मैं ज़मीन पर गिर पड़ा।

तुम्हें हर रात मैं क्यों मारती थी?
वो मेरे सामने बैठी।
क्योंकि मरना आसान है।
जीना मुश्किल।

व्हीलचेयर वाला आदमी उठा। लड़खड़ाया।

मैं पुलिस को—

उससे पहले
उसका शरीर गिर पड़ा।

खून फैल रहा था।
आँखें खुली की खुली।

मैंने अपने हाथ देखे चाकू नहीं था मुझे लगा वो मेरे हाथों से नहीं मरा था। वो मेरे सच से मरा था।

वो लड़की मेरे पास आई।
उसने मेरा हाथ पकड़ा।

अब एक आख़िरी क़त्ल बचा है,
उसने कहा।

किसका?
मेरी आवाज़ टूट चुकी थी।

उसने मेरी आँखों में देखा।

तुम्हारे अंदर वाले आदमी का।

उसकी बात मेरे कानों में हथौड़े की तरह बज रही थी—
तुम्हारे अंदर वाले आदमी का क़त्ल।

मैं उसे देख रहा था, पर पहली बार प्यार नहीं…
डर भी नहीं…
बस खालीपन था।

अगर मैं वो आदमी हूँ, मैंने धीमे से कहा, तो तुम क्या हो?

उसने मुस्कुरा कर जवाब नहीं दिया। वो मुस्कान जो कभी मुझे ज़िंदा रखती थी, आज मुझे खत्म करने आई थी कि तभी बाहर सायरन की आवाज़ गूंजी।

पुलिस।

व्हीलचेयर वाले आदमी की लाश ने सच बोल दिया था।
शायद किसी ने देखा था, शायद किसी ने सुना था या शायद सच खुद बाहर आना चाहता था।

तुम्हें जाना होगा,
मैंने उससे कहा।

नहीं,
वो बोली,
अब तुम जाओगे।

पुलिस की आवाज़ पास आ रही थी। दरवाज़ा टूटने वाला था।

मैंने पलटकर देखा—वो वहाँ नहीं थी और कमरा खाली था।
जैसे वो कभी थी ही नहीं।

पुलिस अंदर आई।
लाश।
खून।
मैं।

हथियार कहाँ है?
एक अफ़सर ने पूछा।

मेरे पास जवाब नहीं था क्योंकि सच में कोई हथियार था ही नहीं।

पूछताछ चली।
घंटों।
दिनों।

मैंने सब बताया—
अनामिका, सपने, वो लड़की।

उन्होंने एक-दूसरे को देखा।
फिर मेरी तरफ़।

इस नाम की कोई औरत मौजूद नहीं है,
अफ़सर बोला।
ना लिविंग, ना डेड रिकॉर्ड में।

मेरे हाथ काँप गए।

तो फिर वो कौन थी?
मैं फुसफुसाया।

अफ़सर ने फ़ाइल बंद की।
शायद वही… जिसे आप बनना नहीं चाहते थे।

उस रात जेल की कोठरी में
आईना नहीं था।

पर दीवार पर मुझे
अपनी परछाई दिख रही थी।

और वो परछाई…
मुस्कुरा रही थी।

मेरे कान में किसी ने फुसफुसाया—

अभी कहानी ख़त्म नहीं हुई।

जेल की उस रात में नींद नहीं आई पर सपने भी नहीं आए।

पहली बार।

सुबह जब धूप सलाखों से अंदर आई, तो लगा जैसे किसी ने सालों बाद मेरे सीने से बोझ हटाया हो।

पुलिस ने केस दो हिस्सों में बाँट दिया था—
एक क़ानून के लिए,
एक दिमाग़ के लिए।

मुझे बताया गया— डिसोसिएटिव मेमोरी लॉस। दिमाग़ ने सच को सह नहीं पाया, तो उसे “वो लड़की” बना दिया। मतलब जो कुछ मै देख रहा था वोमेरा ड़र और दिमाग का वैहम था।

अनामिका मरी नहीं थी बल्कि हर रात मरता था वो इंसानस जो उसे क़ैद करता था यानी कि मैं।

वो लड़की जो मुझे सपनों में मारती थी—
वो मेरा ज़मीर था।
वो मेरी मोहब्बत थी,
जो सही रूप में जी न सकी।

अदालत ने मुझे उम्रक़ैद नहीं दी।
शायद इसलिए कि मैं हर दिन पहले ही मर रहा था।

इलाज चला।
सालों।

एक दिन डॉक्टर ने कहा,
अब आप ठीक हैं।
वो नहीं आएगी।

उस रात मैं अपने कमरे में अकेला था आईने के सामने।

और पहली बार आईने में सिर्फ़ मैं था।

कोई चाकू नहीं। कोई खून नहीं।

पर जाते-जाते
हवा में एक जानी-पहचानी खुशबू तैर गई।

पीछे से एक आवाज़ आई—
नर्म, शांत।

अब मैं जा सकती हूँ।
क्योंकि अब तुम भाग नहीं रहे।

मैंने पलटकर नहीं देखा क्योंकि अब डर नहीं था।

कुछ मोहब्बतें पाने के लिए नहीं होतीं।
कुछ…
सज़ा देने आती हैं।

और वो जो मेरी मोहब्बत थी—
वो मेरी क़ातिल नहीं थी।

वो मेरी मुक्ति थी।

 

Leave a Comment