pyaar ya sazish
pyaar ya sazish

रात धीरे-धीरे कमरे में उतर रही थी। खिड़की के बाहर सूरज डूब चुका था, और अंदर सिर्फ दवाइयों की तेज़ गंध फैली हुई थी। मैं हमेशा की तरह उसके पास बैठी थी—दुष्यंत… मेरा पति। पिछले छह सालों से वो इसी बिस्तर पर पड़ा है, बिना हिले-डुले, बिना कुछ बोले।

लोग मुझे “त्याग की मूर्ति” कहते हैं। कहते हैं कि मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी एक ऐसे इंसान के नाम कर दी, जो अब सिर्फ साँस ले रहा है… जी नहीं रहा।

मैंने धीरे से उसके बालों पर हाथ फेरा… और उसके माथे को चूमा।

लेकिन आज कुछ अलग था।

मेरे होंठ जैसे ही उसके माथे को छुए, एक अजीब सी गंध मेरे नाक में आई—चंदन और सिगरेट की मिली-जुली खुशबू।

मैं झटके से पीछे हटी।

“ये… कैसी स्मेल है?” मैंने खुद से बुदबुदाया।

दुष्यंत कभी सिगरेट नहीं पीता था… और घर में कोई और भी नहीं।

दिल में हल्का सा डर बैठ गया।

मैंने तुरंत अलमारी खोली… और जैसे ही दराज़ खींची, मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया।

अंदर एक अजनबी पुरुषों का अंडरवियर रखा था—डिज़ाइन ऐसा, जो मैंने कभी खरीदा ही नहीं।

मेरे हाथ काँपने लगे।

“ये यहाँ कैसे आया…?”

मैंने खुद को संभाला और रसोई में गई। कामवाली कमला वहीं थी।

“कमला… आज घर में कोई आया था?” मैंने सामान्य बनने की कोशिश करते हुए पूछा।

वो थोड़ी घबराई, फिर बोली—
“नहीं मैडम, मैं तो पूरे दिन यहीं थी… दरवाज़ा भी बंद था।”

उसकी आँखों में सच्चाई थी।

तो फिर… ये सब?

अब सिर्फ एक शक बचा था—रीमा… दुष्यंत की नर्स।

उस रात, मैंने तय कर लिया…

कल मैं काम पर नहीं जाऊँगी।

मैं सच जानकर रहूँगी… चाहे वो कितना भी खतरनाक क्यों न हो।

अगली सुबह मैंने सबके सामने वही रोज़ वाला नाटक किया—तैयार हुई, बैग उठाया और घर से निकल गई। लेकिन इस बार मैं ऑफिस नहीं गई।

घर से थोड़ी दूर जाकर मैं रुक गई… और फिर चुपचाप पीछे की गली से वापस आ गई।

दिल तेज़ी से धड़क रहा था।

मैं नहीं जानती थी कि मैं क्या देखने वाली हूँ… लेकिन अंदर कुछ था जो कह रहा था—आज सच सामने आएगा।

मैंने धीरे से पीछे वाला दरवाज़ा खोला और बिना आवाज़ किए अंदर घुस गई।

पूरा घर खामोश था।

कमला किचन में थी… जैसे हर रोज़ होती है।

लेकिन मेरी नज़र सिर्फ एक जगह थी—दुष्यंत का कमरा।

मैं दबे पाँव सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गई… और कमरे के बाहर रुक गई।

दरवाज़ा आधा खुला हुआ था। अंदर से हल्की-हल्की आवाज़ें आ रही थीं… जैसे कोई फुसफुसा रहा हो। मेरी साँसें रुक गईं।

मैंने धीरे से दरवाज़े के पास जाकर अंदर झाँका… और जो मैंने देखा— उसने मेरे पैरों तले ज़मीन खींच ली। रीमा… दुष्यंत के बिल्कुल पास खड़ी थी। लेकिन वो सिर्फ खड़ी नहीं थी… वो उसके कान में कुछ कह रही थी।

और सबसे डरावनी बात— दुष्यंत की उँगलियाँ… हल्की-हल्की हिल रही थीं। मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं।

ये… ये कैसे हो सकता है? मेरे मुँह से बिना आवाज़ के निकला। छह सालों से जो इंसान हिला तक नहीं…

वो आज… प्रतिक्रिया दे रहा था?

मैं और पास जाने लगी… तभी अचानक— रीमा ने तेज़ी से अपना सिर घुमाया। उसकी नज़र सीधे दरवाज़े पर पड़ी।

हमारी आँखें मिलीं। कुछ सेकंड के लिए समय जैसे रुक गया।

फिर उसके होंठों पर एक अजीब सी मुस्कान आई…

और उसने धीरे से कहा— मैडम… आप आज ऑफिस नहीं गईं?

मेरे गले से आवाज़ ही नहीं निकली। कमरे का माहौल अचानक भारी हो गया था।

और तभी— पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैं झटके से पलटी…

और जो मैंने देखा— वो मेरे होश उड़ा देने के लिए काफी था…

मैंने जैसे ही पलटकर देखा, मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा—वो कमला थी। लेकिन उसके चेहरे पर वो मासूमियत नहीं थी, जो मैं रोज़ देखती थी। उसकी आँखें ठंडी थीं… बिल्कुल खाली। उसने धीरे से मेरे कंधे पर दबाव बढ़ाया और फुसफुसाई, “मैडम… आपको ऊपर नहीं आना चाहिए था।” उसकी आवाज़ में एक अजीब सख्ती थी, जो पहले कभी नहीं सुनी थी।

मैंने खुद को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन मेरी नज़र बार-बार कमरे के अंदर जा रही थी। रीमा अब भी दुष्यंत के पास खड़ी थी, लेकिन इस बार उसने धीरे से दुष्यंत का हाथ अपने हाथ में लिया… और उसे उठाया। मेरा दिल जैसे रुक गया—दुष्यंत का हाथ… हवा में था। वो हिल रहा था। ये सपना नहीं था।

“ये… क्या हो रहा है?” मैंने काँपती आवाज़ में पूछा।

रीमा मुस्कुराई, लेकिन वो मुस्कान सुकून देने वाली नहीं थी… डर पैदा करने वाली थी। “छह साल बहुत लंबा समय होता है, मैडम… किसी को सुलाने के लिए,” उसने धीरे से कहा।

मेरे कानों में जैसे धमाका हुआ। “सुलाने के लिए… मतलब?” मैंने हकलाते हुए पूछा।

कमला ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया, जैसे अब मुझे कहीं जाने नहीं देगी। “आपको हमेशा यही लगता रहा कि साहब बेहोश हैं… लेकिन असली कहानी कुछ और है,” उसने ठंडे लहजे में कहा।

मेरी नज़र फिर दुष्यंत पर गई—इस बार उसकी आँखें… हल्की सी खुल रही थीं।

मैं पीछे हट गई। “नहीं… ये झूठ है… ये सब झूठ है…”

रीमा धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगी। “झूठ?” उसने धीमे से कहा, “या वो सच… जिसे आप कभी देख ही नहीं पाईं?”

कमरे की हवा भारी हो चुकी थी। हर साँस जैसे मुश्किल लग रही थी। और तभी—दुष्यंत के होंठ हल्के से हिले…

जैसे वो कुछ बोलने की कोशिश कर रहा हो।

लेकिन सवाल ये था—

वो मेरे लिए जाग रहा था…

या किसी और के लिए?

मेरे कानों में सिर्फ अपनी ही धड़कनों की आवाज़ गूंज रही थी। दुष्यंत के होंठ फिर से हिले… इस बार थोड़ा साफ। मैंने खुद को संभालते हुए उसकी तरफ एक कदम बढ़ाया। “दुष्यंत…?” मेरी आवाज़ टूट रही थी।

लेकिन इससे पहले कि मैं उसके पास पहुँच पाती, कमला ने मुझे जोर से पीछे खींच लिया। “इतनी जल्दी नहीं, मैडम…” उसने ठंडी हँसी के साथ कहा।

रीमा अब बिल्कुल मेरे सामने खड़ी थी। उसकी आँखों में अजीब सा आत्मविश्वास था, जैसे सब कुछ उसी के कंट्रोल में हो। “आप हमेशा सोचती रहीं कि आप उनकी सबसे बड़ी देखभाल करने वाली हैं… लेकिन सच ये है कि आप सिर्फ एक मोहरा थीं,” उसने धीरे-धीरे कहा।

“क्या बकवास कर रही हो तुम!” मैंने गुस्से में कहा, लेकिन अंदर डर अब भी था।

रीमा ने पास रखी टेबल से एक छोटी शीशी उठाई—पारदर्शी, जिसमें हल्का नीला लिक्विड था। “ये देख रही हैं आप?” उसने उसे मेरी आँखों के सामने लहराया, “ये है वो दवा… जो पिछले छह सालों से आपके पति को ‘जगने’ नहीं दे रही थी।”

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “नहीं… ये झूठ है… डॉक्टर—”

“डॉक्टर भी हमारे थे,” कमला ने बीच में ही बात काट दी।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

मेरी साँसें तेज़ हो गईं। “क्यों…? ऐसा क्यों किया तुम लोगों ने?” मैंने मुश्किल से पूछा।

रीमा की मुस्कान और गहरी हो गई। “क्योंकि दुष्यंत को सब पता चल गया था…” उसने कहा।

“क्या?” मैं चिल्लाई।

रीमा ने मेरी आँखों में देखते हुए धीरे से कहा, “आपके बारे में।”

एक पल के लिए समय जैसे रुक गया।

“मेरे बारे में…?” मेरे होंठ सूख गए।

दुष्यंत की आँखें अब आधी खुल चुकी थीं… और वो सीधा मेरी तरफ देख रहा था।

उसकी नज़र में डर नहीं था…

सिर्फ एक अजीब सा सच था।

और तभी उसने बहुत मुश्किल से, टूटती आवाज़ में एक शब्द कहा—

“तुम…”

मेरे कानों में वो एक शब्द गूंजता रह गया—“तुम…”

कमरा जैसे घूमने लगा। मैं दुष्यंत को घूरती रह गई… उसकी आँखें अब पूरी तरह खुल चुकी थीं, और उनमें जो था—वो प्यार नहीं था… भरोसा नहीं था… बल्कि एक कड़वा सच था।

“मैं…?” मेरे होंठ काँप गए।

रीमा धीरे से हँसी, “हाँ मैडम… आप।”

कमला ने मेरी पकड़ और कस दी, जैसे अब भागने का कोई रास्ता ही नहीं था।

दुष्यंत ने बड़ी मुश्किल से बोलना शुरू किया, हर शब्द जैसे उसके गले में अटक रहा था—
“छह साल पहले… एक्सीडेंट नहीं था…”

मेरी साँस अटक गई।

“वो… प्लान था…” उसने कहा।

मेरे दिमाग में जैसे सब कुछ टूटने लगा। “नहीं… ये झूठ है…”

रीमा ने बीच में ही कहा, “उन्हें सब पता चल गया था—आपके अफेयर के बारे में… और उस रात आप उन्हें हमेशा के लिए रास्ते से हटाना चाहती थीं।”

मेरी आँखों के सामने वो रात घूम गई… वो बहस… वो गुस्सा… वो धक्का…

“मैंने… मैं—” मेरी आवाज़ बंद हो गई।

“लेकिन वो मरे नहीं,” कमला ने ठंडे लहजे में कहा, “बस कोमा में चले गए… और तभी हमने मौका देखा।”

रीमा ने आगे बढ़कर कहा, “हमने उन्हें जिंदा रखा… लेकिन जगने नहीं दिया। क्योंकि अगर ये जाग जाते… तो सबसे पहले आपका सच सामने आता।”

कमरे में भारी खामोशी छा गई।

मेरी आँखों से आँसू बहने लगे… लेकिन अब सब खत्म हो चुका था।

दुष्यंत मुझे देख रहा था… उसी एक नजर से, जिसमें सब कुछ था—नफरत, दर्द… और सच्चाई।

और तभी—

दरवाज़ा जोर से खुला।

पुलिस अंदर आ चुकी थी।

इंस्पेक्टर ने सख्त आवाज़ में कहा—
“आयुषी… आपको गिरफ़्तार किया जाता है, अपने पति की हत्या की कोशिश के आरोप में।”

मेरे हाथों में हथकड़ी लग गई।

मैं आखिरी बार दुष्यंत की तरफ देखी…

वो जिंदा था। सच जिंदा था।

और मेरा हर झूठ… अब खत्म। कमरे में फिर से वही सन्नाटा था…

लेकिन इस बार—  Game truly over.

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