प्यार ने जो किया, मौत भी नहीं कर पाई

कहते हैं कुछ मुलाक़ातें इत्तेफ़ाक़ नहीं होतीं — वो पहले से तय होती हैं। मुझे इस बात पर कभी यक़ीन नहीं था…
जब तक अनाया मेरी ज़िंदगी में नहीं आई थी ।

बारिश की वो शाम थी। पुरानी लाइब्रेरी, गीली ज़मीन की मिट्टी की ख़ुशबू, और खिड़की से टकराती बूंदें।
मैं —आरव, अपनी अधूरी ज़िंदगी के पन्ने पढ़ रहा था, जब उसने सामने वाली कुर्सी खींची, तो वो मुस्कुराई।
ऐसी मुस्कान, जिसमें सुकून भी था और कोई छुपा हुआ दर्द भी।

तुम हमेशा वही किताब क्यों पढ़ते हो? उसने पूछा
उसकी आवाज़ में अपनापन था… जैसे वो मुझे पहले से जानती हो और देखती हो।

मैं हँसा, और कहाँ कुछ कहानियाँ बदलती नहीं। उसने मेरी आँखों में देखा — और कहा, कुछ लोग भी नहीं।

उस दिन के बाद, हम हर शाम वहीं मिलने लगे। कॉफी, किताबें, और वो बातें…
जो अजनबी कभी नहीं करते।

लेकिन अनाया के बारे में कुछ अजीब था। वो कभी अपने घर की बात नहीं करती थी।
उसका फोन हमेशा बंद रहता था और जब भी मैं उसका हाथ पकड़ता —
उसकी उंगलियाँ ठंडी होतीं…
बहुत ठंडी।

एक दिन मैंने पूछा,
तुम मुझसे डरती हो क्या?

वो मुस्कुराई, और बोली नहीं आरव… मैं तुमसे प्यार करती हूँ और यही सबसे ख़तरनाक है।

उस रात पहली बार उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ा।
उसकी आँखों में आँसू थे और मुझे ना पा पाने का ड़र भी था।

अगर मैं अचानक ग़ायब हो जाऊँ…
तो क्या तुम मुझे ढूँढोगे?

मैंने बिना सोचे कहा, मौत तक।

उसने मेरी तरफ देखा —
और बहुत धीरे से बोली, मौत… मुझे रोक नहीं पाई आरव।
प्यार ने जो किया है… वो भी नहीं कर पाएगी।

उस पल, मुझे नहीं पता था कि ये मोहब्बत मुझे ज़िंदा रखने नहीं…
मुझसे ज़िंदगी छीनने आई है और ये तो बस शुरुआत थी।

अगले दिन मै लाइब्रेरी पहुचा तो बारिश नहीं थी, फिर भी हवा में वही ठंडक थी—जो अनाया के हाथों में होती थी।

मैंने उसे कॉल किया।
फोन स्विच्ड ऑफ।

शाम को मैं उसी घंटो तक उसी कुर्सी पर बैठा रहा, जहाँ वो बैठती थी लेकिन अनाया नहीं आई।

तीसरे दिन, मैं बेचैन होकर लाइब्रेरी के केयरटेकर से मिला।
मैंने अनाया की फोटो दिखाई।

वो सन्न रह गया, काफी देर चुप रहा… फिर बोला- बेटा, ये लड़की… तीन साल पहले मर चुकी है। ये सुनते ही मुझे बहुत गुस्सा आया और मैने चीख़कर बोला- क्या बकवास है! मैं उससे रोज़ मिलता हूँ।

उसने मुझे अख़बार की कटिंग दी। कार एक्सीडेंट। रात 11:11 बजे। लड़की की मौके पर मौत। नाम—अनाया मल्होत्रा। मेरा हाथ काँपने लगा। घड़ी देखी—11:10।

मैं भागता हुआ लाइब्रेरी पहुँचा और जो देखा उसने मेरे सामने कई सवाल खड़े कर दिए क्योकि वो वहीं थी कुर्सी में बैठकर मुस्कुरा रही थी।

तुम लेट हो आरव, उसने कहा।
मैं पीछे हटा और तुरंत पूछा, तुम… ज़िंदा नहीं हो।

वो चुप रही। फिर बोली, प्यार करने के लिए ज़िंदा होना ज़रूरी नहीं आरव…

लाइट्स झपकने लगीं। उसका चेहरा बदलने लगा— आँखें गहरी और आवाज़ भारी होने लगी। तुमने कहा था… मौत तक ढूँढोगे।

घड़ी ने 11:11 बजाए।

और तभी—
उसने मेरा हाथ पकड़ा।
पहली बार… वो गर्म था। क्योकि मेरे इस सवाल से वो बहुत गुस्सा हो गई थी।

उस रात मैं भागा नहीं, पता नहीं क्यों।

अनाया का गुस्सा धीरे धीरे शांत हुआ और वो मेरे सामने बैठी— अब डरावनी नहीं लग रही थी… बल्कि टूटी हुई लग रही थी।

मैंने किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया, टूटी आवाज़ में उसने कहा।
मैं बस… रुक गई।

उसने बताया— उस रात वो किसी से मिलने जा रही थी। किसी ऐसे से, जिसने उसे कभी अपनाया नहीं। और फिर रास्ते में ही उसका एक्सीडेंट…

वो बोली, मौत आई पर मैं गई नहीं। क्योंकि मैं अधूरी थी। जहा एक तरफ वो अपनी बाते बता रही थी तो दूसरी तरफ मेरे मन  में भी कई सवाल चल रहे थे।

तो मैंने पूछा,
तो मैं क्यों?

कुछ देर वो मेरी आँखों में देखती रही। और बोली क्योंकि तुमने मुझे देखा… जैसे मैं जिंदा हूँ।

फिर उसने सच कहा— वो अकेली नहीं रह सकती थी।
उसे कोई चाहिए था… जो उसे बाँध सके इस दुनिया से।

प्यार, उसने फुसफुसाया, सबसे मज़बूत ज़ंजीर है।

मुझे जाना चाहिए था पर मैंने उसका हाथ थाम लिया और उसी पल— मेरे सीने में दर्द उठा। जैसे कुछ खिंच रहा हो।

अगर तुमने मुझे चुना, अनाया बोली,
तो तुम आधे मेरे हो जाओगे।

मैं हँसा—
और पूछा अगर नहीं चुना तो?

वो उदास मुस्कुराई और बोली।
तो मैं किसी और को ढूँढ लूँगी… और तुम हर रात मुझे सपनों में देखते रहोगे।

मैंने पहली बार उसे रोते देखा और वही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।

मैंने कहा— मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।

कमरे की हवा भारी हो गई और मुझे लगा— मैंने किसी से प्यार नहीं किया…
बल्कि मैंने सौदा कर लिया है।

उस रात तूफ़ान था, बिलकुल वैसा ही… जैसा उसकी मौत की रात था।

अनाया ने कहा, आज फैसला होगा।

लाइब्रेरी के शीशे अपने आप टूटने लगे। दीवारों पर परछाइयाँ रेंग रही थीं।

अगर मैं इस दुनिया में रहूँ, उसने कहा,
तो तुम्हें दूसरी से जाना होगा।

मुझे समझ आ गया।
ये सिर्फ़ साथ रहने की बात नहीं थी बल्कि ये जगह बदलने की बात थी।

मैं नहीं चाहता तुम यूँ भटको, मैंने कहा।
अगर कोई जाएगा… तो मैं।

वो चिल्लाई,
नहीं! ये प्यार नहीं है!

मैं मुस्कुराया।
शायद… यही है।

घड़ी ने 11:11 बजाए।

मैंने उसे सीने से लगाया।
ठंडक… फिर अजीब सी शांति।

मेरी साँसें धीमी होने लगीं।
आवाज़ें दूर जाती रहीं।

आख़िरी चीज़ जो मैंने देखी—
अनाया की आँखों में ज़िंदगी लौट रही थी।

सुबह…
लाइब्रेरी में एक लड़का बेहोश पड़ा था।

और शहर में कहा गया—
तीन साल बाद,
एक लड़की एक्सीडेंट से बच गई।

अनाया ज़िंदा थी और कहीं…
मैं अब भी हूँ।
पर इस शरीर में नहीं।

अनाया ज़िंदा थी।
अख़बारों में उसकी तस्वीर छपी थी —
मुस्कुराती हुई, अस्पताल के बिस्तर पर।

डॉक्टर बोले,
चमत्कार है। तीन साल बाद इस हालत से लौटना नामुमकिन था।

लेकिन कोई नहीं जानता था —
कि उस रात, किसी और ने उसकी जगह ले ली थी।

अनाया ने पहली बार आईने में खुद को देखा।
चेहरा वही था… पर आँखें अलग।

जब वो मुस्कुराती, तो मुस्कान देर से आती थी। जैसे किसी और को याद दिलाना पड़ता हो — कि अब हँसना है।

रात को उसे सपने आते। लाइब्रेरी, टूटी खिड़कियाँ,और मैं —
पर बिना चेहरे के।

वो अचानक बोल उठती,
आरव?

लेकिन कमरे में कोई नहीं था। उसे महसूस होने लगा — कोई उसके भीतर साँस ले रहा है। उसकी धड़कनों से पहले…
किसी और की धड़कन।

एक शाम वो किताब पढ़ रही थी और पन्ने अपने आप पलटने लगे।
वही किताब — जो मैं हमेशा पढ़ता था।

अचानक उसकी उँगलियाँ रुक गईं।
एक पंक्ति पर —

प्यार अगर अधूरा रह जाए,
तो किसी न किसी को पूरा निगल लेता है।

उस रात,
आईने में उसे परछाईं दिखी।

मेरी।

पर मेरी आँखों में डर नहीं था।
बस एक सवाल था।

तुम ठीक तो हो, अनाया?

वो चीख पड़ी। तुम ज़िंदा नहीं हो!

आईने से आवाज़ आई —
बहुत शांत, बहुत पास —

और तुम पूरी तरह ज़िंदा भी नहीं हो।

अनाया पीछे हटी।
क्योंकि अब उसे समझ आ रहा था —वो मुझे बचाकर लौटी नहीं थी।

वो मुझे अपने साथ लेकर लौटी थी।

अनाया अब समझ चुकी थी—
मैं सिर्फ़ उसकी याद नहीं था।
मैं उसके अंदर था क्योकि उस रात के बाद वो एक जिस्म दो जान बन चुके थे, एक ही शरीर में दो-दो आत्मा थी।

जब वो आईने के सामने खड़ी होती,
मैं उसकी आँखों से झाँकता।
जब वो बोलती, कभी-कभी मेरी आवाज़ निकल जाती।

वो डर गई थी।
प्यार से नहीं— उस क़ीमत से, जो उसने चुकाई थी।

उसने तांत्रिक को बुलाया।
कहा गया—
ये आत्मा नहीं है। ये अधूरा प्यार है।
और ये सबसे खतरनाक होता है।

तांत्रिक ने पूछा,
इसे जाने दोगी?

अनाया रो पड़ी।
और कहने लगी अगर ये गया… तो मैं भी मर जाऊँगी।

मुझे पहली बार गुस्सा आया।
मैंने सोचा था—
मैंने कुर्बानी दी, ताकि वो ज़िंदा रहे।
पर वो मुझे बोझ समझ रही थी।

उस रात, मैंने उसका हाथ उठवाया—
और आईने पर लिखा: प्यार ने जो किया, मौत भी नहीं कर पाई।

अनाया काँप गई।
तुम मुझे कंट्रोल कर रहे हो…

मैंने जवाब दिया—
नहीं।
मैं वही कर रहा हूँ,
जो तुमने मुझसे करवाया था—
रुकना।

अब सच सामने आ चुका था कि मैंने उसे बचाया नहीं था बल्कि मैंने उसे बाँध लिया था पर अब फैसला मेरा था क्योकि अगर मैं पूरी तरह लौटता— तो अनाया मिट जाती और अगर मैं चला जाता— तो वो भी अधूरी रह जाती।

पहली बार,
मुझे प्यार छोड़ना था।

मैंने आईने से पीछे हटना शुरू किया। कमरा काँपने लगा और अनाया चीखने लगी— नहीं आरव!
मुझे अकेला मत छोड़ो!

और तभी— उसके दिल की धड़कन रुक गई।

डॉक्टर बोले— हार्ट फेल्योर।

पर मैं जानता था की ये अंत नहीं है।

ये बस
अंत की शुरुआत है।

अनाया की मौत को लोग एक और दुर्भाग्य कहकर भूल गए। अख़बारों में छोटी-सी ख़बर छपी —
युवती की रहस्यमयी मौत, हार्ट फेल्योर बताया गया कारण।

कोई नहीं जानता था कि उसका दिल नहीं… उसका प्यार थक गया था।

उस रात, जब उसकी धड़कन रुकी, मैंने पहली बार खुद को हल्का महसूस किया जैसे कोई बोझ उतर गया हो।

कमरा शांत था। आईना साफ़ और अब कोई परछाईं नहीं।

मैं अब उसके भीतर नहीं था बल्कि मैं कहीं भी नहीं था…
और यही पहली आज़ादी थी।

सुबह, जब लोग उसका कमरा साफ़ करने आए, तो उन्होंने देखा — आईने के सामने ज़मीन पर एक डायरी पड़ी थी। आख़िरी पन्ने पर लिखा था:

“मैंने आरव से प्यार किया।
उसने मुझे ज़िंदगी दी।
और मैंने उसे बाँध लिया।
प्यार अगर आज़ादी न दे —
तो वो मोहब्बत नहीं, सज़ा बन जाता है।”

वहीं पास,
आईने के कोने में उँगली से लिखा एक वाक्य था — बहुत हल्का, लगभग मिटा हुआ: अब हम दोनों आज़ाद हैं।

उस रात के बाद, उस लाइब्रेरी में कभी कोई 11:11 नहीं देख पाया। घड़ियाँ उस वक़्त पर रुक जातीं।

कुछ लोग कहते हैं — कभी-कभी वहाँ बैठने पर अजीब-सी शांति मिलती है। जैसे किसी ने बहुत भारी कहानी, अंततः बंद कर दी हो।

और मैं? मैं किसी आईने में नहीं हूँ। किसी जिस्म में नहीं हूँ। मैं बस उस एहसास में हूँ जो दो लोगों के बीच रह जाता है जब प्यार पूरा होकर… ख़ुद को छोड़ देता है।

क्योंकि सच यही है —

प्यार ने जो किया,
मौत भी नहीं कर पाई।

लेकिन आख़िरकार,
प्यार ने ही
सब कुछ ख़त्म कर दिया।

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