pushtaini kothi
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मां…! मेरी फाइल कहां रखी है? मुझे आज फिर देर हो जाएगी!

चिराग की ऊँची आवाज़ पूरे घर में गूंज गई। रसोई से माँ की थकी हुई आवाज़ आई, बेटा, मेज़ पर ही तो रखी है… रोज़ की तरह।

चिराग बड़बड़ाता हुआ कमरे में गया। फाइल सचमुच मेज़ पर रखी थी। एक पल के लिए उसे अजीब लगा— उसे याद था कि उसने कल रात फाइल बैग में रखी थी। लेकिन उसने इस बात को नजरअंदाज़ कर दिया।

यह पुश्तैनी कोठी शहर के किनारे बनी एक विशाल, पुरानी हवेली थी। ऊँची-ऊँची छतें, मोटी दीवारें और हर कोने में जमी पुरानी यादों की धूल। पिता के गुजरने के बाद से घर और भी शांत हो गया था। माँ अक्सर कहतीं— यह घर जिंदा है, इसे छोड़कर मत जाना।

चिराग को यह बात हमेशा अजीब लगती थी।

पिछले कुछ हफ्तों से उसे घर में बदलाव महसूस हो रहा था। रात को सीढ़ियों पर किसी के चलने की आवाज़ आती, जबकि ऊपर का हिस्सा वर्षों से बंद था। कभी खिड़कियाँ अपने आप खुल जातीं। और सबसे अजीब— उसे कई बार ऐसा लगता जैसे कोई उसे देख रहा हो।

उस शाम जब वह ऑफिस से लौटा, तो माँ पूजा के कमरे में बैठी थीं। उनके सामने दीवार पर टंगी पिता की तस्वीर के पास एक और पुरानी तस्वीर रखी थी— एक औरत की, जिसे चिराग ने पहले कभी नहीं देखा था।

मां, ये कौन है? उसने पूछा।

माँ कुछ क्षण चुप रहीं, फिर बोलीं— तुम्हें याद नहीं आएगा।

चिराग के मन में सिहरन दौड़ गई।

रात को सोते समय उसे लगा जैसे किसी ने उसके कमरे का दरवाज़ा हल्का-सा खोला हो। उसने आँखें खोलीं— बाहर अँधेरा था।

लेकिन दरवाज़ा… सच में आधा खुला था।

और बाहर गलियारे में… किसी के खड़े होने की परछाईं साफ़ दिखाई दे रही थी।

चिराग की सांसें तेज हो गईं। उसने हिम्मत करके आवाज़ लगाई— मां…?

परछाईं हल्की-सी हिली… और फिर धीरे-धीरे गायब हो गई।

चिराग तुरंत उठकर बाहर आया। गलियारा खाली था। सीढ़ियों के पास ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ, जैसे अभी-अभी कोई वहाँ से गुजरा हो।

वह सीधे माँ के कमरे में गया। माँ गहरी नींद में थीं। उनके चेहरे पर अजीब-सी शांति थी।

तो फिर वो कौन था?

अगले दिन उसने तय किया कि वह ऊपर वाले बंद हिस्से को देखेगा। पिता के जाने के बाद से वह हिस्सा कभी नहीं खुला था। माँ हमेशा मना करती थीं।

दोपहर में जब माँ बाजार गईं, चिराग ने चाबी ढूंढ निकाली। सीढ़ियाँ चढ़ते समय उसे लगा जैसे हर कदम पर घर की दीवारें उसकी आहट सुन रही हों।

ऊपर का दरवाज़ा खोलते ही धूल की गंध और ठंडी हवा ने उसका स्वागत किया। कमरा पुरानी चीज़ों से भरा था। एक कोने में लकड़ी की अलमारी थी।

अलमारी के अंदर उसे एक पुरानी डायरी मिली।

डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
अगर यह डायरी चिराग पढ़ रहा है, तो समझो सच्चाई उससे छुपी नहीं रह पाई।

चिराग के हाथ कांपने लगे।

अगले पन्नों में पिता ने लिखा था कि इस कोठी में कोई और भी रहता है। एक ऐसी औरत… जो इस घर की पहली मालकिन थी। जिसकी मौत रहस्यमयी हालात में हुई थी।

और आखिरी पंक्ति—

वह किसी अपने के शरीर में लौट सकती है… और अगर उसे उसका हक़ नहीं मिला, तो वह सब कुछ ले लेगी।

तभी पीछे से दरवाज़ा ज़ोर से बंद हुआ।

चिराग ने पलटकर देखा—

दरवाज़े के बाहर माँ खड़ी थीं।

लेकिन उनकी आँखों में वह पहचान नहीं थी… जो एक बेटे को अपनी माँ की आँखों में दिखती है।

दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ इतनी तेज थी कि पूरा कमरा काँप उठा। चिराग के हाथ से डायरी लगभग छूट गई। उसने घबराकर दरवाज़े की ओर देखा।

माँ सामने खड़ी थीं। चेहरा बिल्कुल शांत… पर आँखों में अजीब-सी कठोरता।

तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था, उनकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें आदेश था।

चिराग ने हिम्मत जुटाई, मां, ये डायरी… पापा ने क्या लिखा है इसमें? कौन थी वो औरत?

कुछ क्षण के लिए माँ का चेहरा बदल गया। जैसे कोई दूसरी भावना भीतर से झलक गई हो। फिर वे धीरे-धीरे कमरे के भीतर आईं और बोलीं, हर घर के कुछ राज़ होते हैं, बेटा। उन्हें जितना दबाकर रखा जाए, उतना अच्छा।

चिराग का दिल मानने को तैयार नहीं था। वह नीचे आया, पर उसका मन अशांत था। रात को उसने फिर डायरी पढ़ी। पिता ने लिखा था कि कोठी की पहली मालकिन शारदा देवी थीं। उनके पति ने उन्हें संपत्ति से बेदखल करने की कोशिश की… और कुछ ही दिनों बाद उनकी रहस्यमयी मौत हो गई।

पिता ने आख़िरी पन्नों में चेतावनी दी थी—
वह अपने हक़ के लिए लौटेगी। और इस बार किसी को छोड़ेगी नहीं।

चिराग ने सोचा— यह सब अंधविश्वास है।

पर उसी रात जब वह सो रहा था, उसे लगा जैसे कोई उसके कान के पास फुसफुसा रहा हो—

मेरा घर… मेरा हक़…

वह घबराकर उठा। कमरे की दीवार पर लगी पिता की तस्वीर टेढ़ी हो चुकी थी।

और उसके नीचे, फर्श पर… गीले पैरों के निशान बने हुए थे।

जो सीधे उसकी माँ के कमरे की ओर जा रहे थे।

चिराग का गला सूख गया। उसने काँपते कदमों से उन पैरों के निशानों का पीछा किया। हर निशान साफ़ था… जैसे अभी-अभी किसी ने भीगे पैरों से चलकर रास्ता बनाया हो।

माँ का दरवाज़ा आधा खुला था। भीतर हल्की-सी रोशनी थी।

चिराग ने दरवाज़ा धकेला।

माँ आईने के सामने खड़ी थीं। उनके बाल खुले थे, और वे खुद से कुछ बुदबुदा रही थीं।

अब कोई मुझे नहीं रोकेगा… अब यह घर मेरा है…

चिराग की सांस अटक गई।

मां?

माँ ने धीरे-धीरे आईने से नज़र हटाई और उसकी तरफ देखा। लेकिन वह नज़र… उसकी अपनी माँ की नहीं थी।

उनकी आवाज़ बदल चुकी थी— भारी, ठंडी और अनजानी।

तुम्हारे पिता ने बहुत कोशिश की थी मुझे रोकने की… लेकिन अब वो नहीं हैं।

चिराग के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। आप क्या कह रही हैं?

माँ हँसीं— एक ऐसी हँसी, जिसमें अपनापन नहीं था।

तुम्हें याद है बचपन में तुम सीढ़ियों से गिरे थे? सबने कहा था कि वो हादसा था… पर वो मेरा पहला प्रयास था।

चिराग के कानों में शोर गूंजने लगा।

उसे अचानक याद आया— बचपन में उसने सच में सीढ़ियों पर किसी को धक्का देते महसूस किया था… पर उसने कभी किसी को बताया नहीं।

तुम इस घर के असली वारिस हो, वह आवाज़ बोली, और जब तक तुम हो… यह घर मेरा नहीं हो सकता।

अचानक कमरे की खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं। तेज हवा चली।

आईने में चिराग ने जो देखा… उससे उसका खून जम गया।

आईने में माँ के पीछे एक और औरत खड़ी थी— सफेद साड़ी में, सूनी आँखों के साथ।

और वही चेहरा… जो उस पुरानी तस्वीर में था।

शारदा देवी।

अब खेल शुरू हो चुका था।

आईने में दिख रही वह औरत धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगी। सफेद साड़ी, बिखरे बाल और आँखें… जिनमें वर्षों का क्रोध भरा था।

चिराग ने झटके से पीछे मुड़कर देखा— कमरे में उसकी माँ अकेली खड़ी थीं।

लेकिन आईने में… शारदा देवी अभी भी उनके पीछे थीं।

तुमने मेरा घर छीन लिया… वह भारी आवाज़ गूंजी, अब तुम्हारी बारी है।

अचानक माँ ज़मीन पर गिर पड़ीं। उनका शरीर ऐंठने लगा, जैसे किसी ने उन्हें भीतर से जकड़ लिया हो।

मां! चिराग चिल्लाया और उन्हें संभालने दौड़ा।

माँ की आँखें खुलीं— अब उनमें पहचान थी, डर था।
चिराग… वो… वो मुझे जाने नहीं दे रही…

कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया। खिड़कियाँ तेज़ी से टकराने लगीं। दीवारों से धूल झरने लगी।

चिराग को पिता की डायरी की आख़िरी पंक्ति याद आई—
अगर कभी वह लौटे… तो उसे उसका सच दिखाओ। उसका अधूरा सच ही उसकी कमजोरी है।

पर उसका सच क्या था?

तभी उसकी नज़र अलमारी के ऊपर रखे एक पुराने लोहे के संदूक पर पड़ी। पिता अक्सर उसे छूने से भी मना करते थे।

हिम्मत करके चिराग ने संदूक खोला।

अंदर पुराने कागज़, कुछ गहने… और एक खून से सना कपड़ा था।

नीचे एक दस्तावेज़ रखा था— संपत्ति का असली कागज़।

जिसमें साफ़ लिखा था कि शारदा देवी इस कोठी की असली मालकिन थीं… और उनकी मौत के बाद उनके पति ने धोखे से सब अपने नाम कर लिया था।

मुझे मेरा हक़ चाहिए… वह आवाज़ फिर गूंजी।

अब चिराग समझ गया— यह सिर्फ़ बदला नहीं था… यह अधूरे अधिकार की आग थी।

पर अगर वह यह घर लौटा दे… तो क्या उसकी माँ बच पाएँगी?

या शारदा देवी का क्रोध सब कुछ खत्म कर देगा?

अगली सुबह माँ बेहद कमजोर थीं। उन्हें पिछली रात की कोई याद नहीं थी।

चिराग पूरी रात नहीं सो पाया। उसने तय कर लिया— इस रहस्य को खत्म करना होगा।

वह शहर के पुराने रिकॉर्ड ऑफिस गया। घंटों की खोज के बाद उसे शारदा देवी की मृत्यु का रिकॉर्ड मिला।

रिपोर्ट में लिखा था—
सीढ़ियों से गिरने से मृत्यु।

चिराग के रोंगटे खड़े हो गए।

क्या यह भी एक हादसा था?

फिर उसे एक पुरानी शिकायत मिली— शारदा देवी ने अपनी जान को खतरा बताया था। उन्होंने अपने पति और एक रिश्तेदार पर संपत्ति हड़पने का आरोप लगाया था।

और वह रिश्तेदार…

चिराग का अपना दादा था।

उसकी सांसें थम गईं।

मतलब यह घर उसके परिवार ने छल से छीना था।

रात को वह फिर ऊपर वाले कमरे में गया।

मैं सच जान चुका हूँ! उसने ऊँची आवाज़ में कहा। यह घर आपका था… और आपके साथ अन्याय हुआ!

कमरे में ठंडी हवा घूमी।

आईने में फिर वही आकृति उभरी।

तो मेरा हक़ लौटाओ…

चिराग ने काँपते हुए कहा, मैं यह घर दान कर दूँगा। आपके नाम से। आपकी आत्मा की शांति के लिए।

कुछ क्षण सन्नाटा रहा।

फिर अचानक कमरे की हवा थम गई।

आईने में खड़ी आकृति धीरे-धीरे धुंधली होने लगी।

लेकिन जाते-जाते वह बोली—

अन्याय की सज़ा खत्म नहीं होती… सिर्फ़ रूप बदलती है।

चिराग समझ नहीं पाया इसका मतलब।

अगले दिन उसने घर बेचने और दान की प्रक्रिया शुरू कर दी।

पर उसी रात…

माँ फिर आईने के सामने खड़ी थीं।

और इस बार…

आईने में चिराग के पीछे कोई और खड़ा था।

सफेद साड़ी में नहीं…

बल्कि उसके अपने चेहरे के साथ।

क्या शारदा देवी चली गईं…
या अब उन्होंने नया शरीर चुन लिया था?

कोठी अब भी खामोश थी।

पर उसकी दीवारों में कैद सच्चाई अभी खत्म नहीं हुई थी।

आईने में जो चेहरा था… वह चिराग का ही था।

लेकिन उसकी आँखें… उसकी अपनी नहीं थीं।

सफेद। गहरी। और ठंडी थी।

चिराग पीछे हट गया। उसका दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसे लगा सीना फट जाएगा।

नहीं… उसने बुदबुदाया, ये सच नहीं है…

आईने में उसका प्रतिबिंब मुस्कुराया।

धीरे-धीरे वही भारी आवाज़ गूंजी—
अन्याय का खून… पीढ़ियों तक जिंदा रहता है।

अचानक उसके दिमाग में जैसे कोई दरवाज़ा खुल गया।

उसे याद आने लगा— बचपन से उसे इस घर से अजीब लगाव था। जब दादा की मौत हुई थी, वह उनकी चीज़ों में छिपकर घंटों बैठा रहता था। उसे पुराने दस्तावेज़, गहने… सब अपने लगते थे।

क्या यह सिर्फ़ लगाव था?

या विरासत में मिला अपराध?

अगली सुबह पड़ोसियों ने देखा— कोठी के बाहर एंबुलेंस खड़ी थी।

चिराग को बेहोशी की हालत में ले जाया जा रहा था। वह बार-बार एक ही बात दोहरा रहा था—

ये घर मेरा है… मेरा…

माँ रो रही थीं। डॉक्टर कह रहे थे—
मानसिक आघात है। शायद पुराने पारिवारिक सच ने इसे तोड़ दिया।

कुछ महीनों बाद कोठी सरकारी संरक्षण में चली गई।

दरवाज़ों पर ताले लग गए।

लोग कहते हैं— रात में अब भी ऊपर वाली खिड़की में एक परछाईं दिखाई देती है।

क्या वो शारदा देवी ही है?

क्या उसकी जीत हो चुकी थी और अब उस कोठी में सिर्फ उसका ही राज़ था?

वो परछाई कभी सफेद साड़ी में दिखती।

कभी एक युवा लड़के के रूप में।

पर सच क्या है—
कोई आत्मा थी?

या पीढ़ियों का अपराधबोध, जो चिराग के मन में रूप लेकर जीवित हो उठा?

कोठी आज भी खामोश है।

लेकिन अगर आप कभी उसके पास से गुजरें…
तो ध्यान से देखिएगा।

कहीं आईने में दिखता चेहरा… आपका तो नहीं?

 

 

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