7 din ki dulhan
7 din ki dulhan

एक शादी… दो दुल्हनें… और 2:17 AM का राज़

शादी को सिर्फ सात दिन हुए थे। घर में अभी भी नई दुल्हन वाली खुशबू थी। रिश्तेदारों की बातें, हँसी की गूंज, और नए जीवन की हल्की-सी घबराहट। मैं खुद को खुश मानने की पूरी कोशिश कर रही थी। वो मेरा बहुत ख्याल रखता था… हर छोटी बात पर मुस्कुराता, हर वादा निभाने की बात करता। मुझे लगता था मैं किस्मत वाली हूँ।

पर कल रात 2:17 AM पर मेरी नींद अचानक खुल गई। दिल अजीब तरह से धड़क रहा था। मैंने हाथ बढ़ाकर उसके कंधे को छूना चाहा… पर बिस्तर का वो हिस्सा ठंडा था।मैने आंख खोली तो जगह खाली।

मैंने सोचा शायद पानी पीने गया होगा। लेकिन नीचे से धीमी-सी फुसफुसाहट सुनाई दे रही थी। जैसे कोई किसी से बात कर रहा हो। आवाज़ में दर्द था… और विनती भी।

डर और जिज्ञासा के बीच मैं धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगी। हर कदम भारी लग रहा था। नीचे हॉल की हल्की रोशनी जल रही थी।

और फिर मैंने उसे देखा।

वो घुटनों पर बैठा था।

उसके सामने एक लड़की थी। सफेद कपड़ों में। लंबे खुले बाल। सिर थोड़ा झुका हुआ।

वो उसका हाथ पकड़कर रो रहा था।

मैंने कोशिश की तुम्हें भूलने की… पर मैं नहीं भूल पाया, वो कह रहा था।

मेरे कदम वहीं जम गए।

मैंने उस लड़की का चेहरा देखने की कोशिश की… और मेरी सांस रुक गई।

उसकी आँखें खुली थीं।

पर उनमें कोई हरकत नहीं थी।

चेहरा बेजान। होंठ हल्के नीले।

वो जिंदा नहीं थी।

मैं चीखना चाहती थी… पर आवाज़ जैसे गले में कैद हो गई।

और तभी उस लड़की का सिर धीरे-धीरे मेरी तरफ घूमने लगा…

उसका चेहरा अब पूरी तरह मेरी तरफ था। उसकी आँखें सीधे मुझे देख रही थीं। खाली… ठंडी… मगर अजीब तरह से जागती हुई। मेरे हाथ-पैर सुन्न हो गए। मैंने खुद को समझाने की कोशिश की — शायद मैं सपना देख रही हूँ। शायद ये कोई भ्रम है।

पर फिर मैंने उसे साफ-साफ बोलते सुना।

तुमने वादा किया था…

उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे दूर कुएँ से आ रही हो।

मेरा पति सिसक पड़ा। मैं मजबूर था… सबने कहा आगे बढ़ जाओ। पर मैं कैसे बढ़ जाऊँ? तुमसे किया वादा कैसे तोड़ दूँ?

मुझे याद आया — शादी से पहले उसने कभी अपनी पुरानी ज़िंदगी के बारे में खुलकर बात नहीं की थी। बस इतना कहा था कि एक हादसा हुआ था… और वो बहुत टूट गया था।

मैंने हिम्मत जुटाकर लाइट का स्विच ऑन किया।

जैसे ही रोशनी फैली — वहाँ कोई नहीं था।

न वो लड़की।
न वो अजीब साया।

सिर्फ मेरा पति, अकेला… घुटनों पर बैठा हुआ।

वो मुझे देखकर चौंक गया। तुम यहाँ क्या कर रही हो?

मैंने काँपती आवाज़ में पूछा, तुम किससे बात कर रहे थे?

वो कुछ सेकंड तक मुझे घूरता रहा… फिर अचानक गुस्से में बोला, तुम्हें वहम हो रहा है!

वहम?

मैंने साफ देखा था। साफ सुना था।

तभी मेरी नज़र टेबल पर रखी एक पुरानी फोटो फ्रेम पर पड़ी। उसमें वही लड़की थी। मुस्कुराती हुई। वही सफेद ड्रेस।

नीचे छोटा-सा नाम लिखा था — आर्या

और तारीख…

उसकी मौत से सिर्फ दो दिन पहले की।

मेरे दिल में एक सवाल गूंज रहा था —

क्या वो सच में मरी थी?

या वो अब भी इसी घर में है…
और मैं इस कहानी में सिर्फ दूसरी औरत हूँ?

सुबह होते ही मैंने खुद को समझाने की कोशिश की कि जो कुछ भी देखा, वो मेरे दिमाग का खेल था। लेकिन दिल मानने को तैयार नहीं था। उसके चेहरे की बेचैनी, उसकी आँखों में डर — वो सब नकली नहीं हो सकता था।

नाश्ते की मेज़ पर वो बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रहा था। जैसे कुछ हुआ ही न हो। मुस्कुरा रहा था, मेरे लिए चाय बना रहा था। पर उसकी कलाई पर खरोंच के निशान थे… जैसे किसी ने ज़ोर से उसे पिछली रात कसकर पकड़ा हो।

वो निशान देखकर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने पूछा, ये चोट कैसे लगी?

वो एक पल के लिए रुका, फिर बोला, कल रात दरवाज़े से टकरा गया।

झूठ।

मुझे साफ याद था — वो घुटनों पर था, और कोई उसका हाथ पकड़े हुए था।

दोपहर में जब वो ऑफिस चला गया, मैंने पूरे घर को ध्यान से देखना शुरू किया। हर अलमारी, हर दराज़। तभी मुझे ऊपर की मंज़िल पर एक कमरा मिला, जो हमेशा बंद ही रहता था। और कल रात जो हुआ उसके बाद मैने उस कमरे में जाना चाहा क्योकि मुझे महसूस हो रहा था कि वहा कुछ मिल सक्ता है।

उस पर ताला लगा था।

पर अजीब बात ये थी कि दरवाज़े के नीचे से हल्की-सी खुशबू आ रही थी — वही खुशबू जो उसकी फोटो में उस लड़की के आसपास  मुझे महसूस  हो रही थी।

मैंने स्टोर से चाबी ढूंढनी शुरू की। काफी देर बाद एक पुरानी चाबी हाथ लगी। मैने उससे ताला खोलना शुरू किया, दिल ज़ोर से धड़क रहा था। और…. और-

ताला खुल गया।

कमरे के अंदर कदम रखते ही मेरी रूह काँप गई।

दीवारों पर उसकी तस्वीरें थीं। हर कोने में। कुछ में वो मुस्कुरा रही थी, कुछ में उदास। बीच में एक छोटी-सी मेज़ थी, जिस पर ताज़े फूल रखे थे।

ताज़े।

मतलब कोई रोज़ यहाँ आता है।

और तभी पीछे से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई।

मैंने मुड़कर देखा…

वो दरवाज़े पर खड़ा था।

और उसकी आँखों में प्यार नहीं… पागलपन था।

दरवाज़ा बंद होते ही कमरे की हवा भारी हो गई। वो धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगा। उसकी आँखों में अजीब चमक थी, जैसे वो मुझे नहीं… किसी और को देख रहा हो।

तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था, उसने ठंडी आवाज़ में मुझसे कहा।

मैंने काँपते हुए पूछा, ये सब क्या है? ये कमरा… ये तस्वीरें… तुम रोज़ यहाँ आते हो?

वो हँस पड़ा। वो अभी भी यहीं है।

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

कौन? मैंने फुसफुसाया।

आर्या, उसने जवाब दिया। वो मुझसे नाराज़ है… क्योंकि मैंने शादी कर ली।

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। तो फिर मुझसे शादी क्यों की?

वो कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, क्योंकि सबको लगा मुझे आगे बढ़ जाना चाहिए। पर मैं आज भी उसी दिन में अटका हूँ… जिस दिन वो मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चली गई थी।

मैंने हिम्मत करके कहा, वो मर चुकी है!

अचानक कमरे का दरवाज़ा ज़ोर से अपने आप बंद हुआ। खिड़की के शीशे हिलने लगे। हवा ठंडी हो गई।

और फिर…

आईने में मुझे अपना नहीं, किसी और का चेहरा दिखा।

सफेद कपड़े। नीले होंठ। खाली आँखें।

आर्या।

उसने मेरे कान के पास आकर फुसफुसाया, ये शादी मेरी थी…

मैं चीख पड़ी।

वो मुझे पकड़ने के लिए आगे बढ़ा, पर तभी अचानक उसकी पकड़ ढीली पड़ गई। वो जैसे किसी अदृश्य ताकत से पीछे धकेल दिया गया।

कमरे में एक ही आवाज़ गूंज रही थी —

वादा अधूरा है…

मैं समझ गई।

ये सिर्फ एक भूत की कहानी नहीं है।

ये अधूरी कसम की कहानी है।

और अगर सच सामने नहीं आया…

तो अगली लाश शायद मेरी होगी।

उस रात के बाद घर बदल गया। दीवारें वही थीं, पर सन्नाटा अलग था। वो मुझसे नज़रें चुराने लगा। हर रात 2:17 AM पर उसकी आँख खुल जाती… और वो बिस्तर से उठकर चुपचाप बाहर चला जाता।

मैं अब डर नहीं रही थी। अब मुझे सच जानना था।

अगले दिन जब वो घर से निकला, मैं सीधे उसी बंद कमरे में गई। इस बार डर कम था, और गुस्सा ज़्यादा। मैंने मेज़ के दराज़ खोले। पुराने ख़त, तस्वीरें… और एक डायरी।

डायरी आर्या की थी।

हाथ काँपते हुए मैंने पढ़ना शुरू किया।

अगर ये डायरी किसी को मिले… तो समझ लेना मेरी मौत कोई हादसा नहीं थी।

मेरी सांस रुक गई और आंखे फटी की फटी रह गई।

आगे लिखा था —
उसे डर था कि मैं उसे छोड़ दूँगी। वो मुझे खो नहीं सकता था। इसलिए उसने कहा, अगर तुम मेरी नहीं हुई… तो किसी की नहीं होगी।

मेरी आँखों के सामने सब साफ होने लगा।

वो एक्सीडेंट नहीं था।

वो धक्का था।

सीढ़ियों से।

मैं पीछे हट गई। दिल बेकाबू धड़क रहा था।

तभी पीछे से उसकी आवाज़ आई —
तुम्हें ये नहीं पढ़ना चाहिए था।

मैंने पलटकर देखा। उसके हाथ में वही चाबी थी… और चेहरे पर कोई पछतावा नहीं।

तुमने उसे मारा, मैंने कहा।

वो कुछ पल चुप रहा… फिर बोला, मैंने उसे खो दिया था। और अब… मैं तुम्हें भी खो नहीं सकता।

उसकी आँखों में वही पागलपन लौट आया था।

और मुझे समझ आ गया —
आर्या की आत्मा बदला लेने नहीं आई थी।

वो मुझे चेतावनी देने आई थी।

उस रात मैंने सोने का नाटक किया।

घड़ी की सुई जैसे-जैसे 2:17 के करीब पहुँची, मेरा दिल तेज़ होता गया। जैसे ही समय हुआ… वो धीरे से उठा।

मैं उसके पीछे-पीछे नीचे गई।

वो उसी कमरे में गया। घुटनों पर बैठ गया। मैंने सब ठीक कर दिया, वो बुदबुदाया। वो कुछ नहीं करेगी…

मैंने लाइट ऑन कर दी।

सब जान चुकी हूँ, मैंने कहा।

वो खड़ा हुआ। उसकी आँखों में डर और गुस्सा दोनों थे। तुम समझती क्यों नहीं? मैं तुमसे भी प्यार करता हूँ!

प्यार? मैं हँसी। या पागलपन?

अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

हवा ठंडी हो गई।

आईने में फिर वही चेहरा उभरा — आर्या।

इस बार उसकी आँखों में खालीपन नहीं था… सुकून था।

वो धीरे-धीरे उसके पीछे खड़ी हो गई।

वो घबराकर पीछे मुड़ा —
पर वहाँ कोई नहीं था।

अचानक उसके पैरों के नीचे फर्श जैसे फिसल गया। वो संतुलन खो बैठा… और सीढ़ियों की तरफ गिर पड़ा।

सब कुछ कुछ सेकंड में खत्म हो गया।

खामोशी।

घड़ी फिर 2:17 पर रुक गई।

सुबह पुलिस आई। सबने इसे हादसा माना।

पर मैं जानती थी…

ये हादसा नहीं था।

ये अधूरी कसम का अंत था।

और उस दिन के बाद…

घर में कभी 2:17 AM पर कोई आवाज़ नहीं आई।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *