ghar no 27
ghar no 27

शाम का धुंधलका उतर रहा था जब समर ने टैक्सी से सामान नीचे उतारा। सामने लोहे का पुराना गेट था, जिस पर जंग की परत जमी हुई थी — घर नं. 27। किराया कम था, जगह शांत थी, और समर को लगा था कि नई शुरुआत के लिए यही सही रहेगा। एक साल पहले पत्नी के जाने के बाद उसने शहर बदलने का फैसला किया था। वह अपनी आठ साल की बेटी इरा का हाथ थामे अंदर दाखिल हुआ। घर खाली था, लेकिन अजीब तरह से सजा-संवरा — जैसे कोई अभी-अभी यहाँ से उठा हो।

पापा, यहाँ पहले कौन रहता था? इरा ने धीमे से पूछा।

कोई परिवार होगा… हमें क्या, समर ने हल्की मुस्कान बनाते हुए कहा, हालांकि उसे खुद भी दीवारों पर टंगी कीलों और साफ फर्श को देखकर हैरानी हो रही थी।

पहली रात सामान ठीक करते-करते देर हो गई। इरा जल्दी सो गई। समर किचन में पानी लेने गया तो उसने देखा — स्लैब पर एक गिलास रखा था, आधा भरा हुआ। वह ठिठक गया। उसने तो अभी-अभी बोतल खोली थी। उसने सोचा शायद इरा ने रखा होगा।

सुबह नाश्ते के दौरान इरा ने अचानक कहा, पापा, वो aunty बोल रही थीं कि यहाँ की खिड़की रात को बंद कर देना।

समर ने चौंककर पूछा, कौन aunty?

इरा बिल्कुल सामान्य थी। जो यहाँ रहती हैं। उन्होंने कहा डरने की बात नहीं है।

समर ने बात हँसी में उड़ा दी, बेटा, यहाँ कोई aunty नहीं रहती।

लेकिन उसी पल उसकी नज़र दीवार पर पड़ी। वहाँ हल्के-से अक्षरों में पेंसिल से लिखा था —
खिड़की बंद रखना।

समर का गला सूख गया।
उसने यह लिखा नहीं था।

और इरा… उसे यह पहले से कैसे पता था?

दीवार पर लिखे शब्दों को समर देर तक घूरता रहा — खिड़की बंद रखना। लिखावट हल्की थी, जैसे किसी बच्चे ने पेंसिल से दबाकर लिखी हो। उसने तुरंत कपड़ा लाकर उसे मिटाने की कोशिश की। कुछ निशान हल्के पड़े, पर शब्द पूरी तरह गायब नहीं हुए। जैसे दीवार उन्हें पकड़े बैठी हो।

इरा, तुमने लिखा है क्या? उसने सामान्य स्वर बनाने की कोशिश की।

इरा ने सिर हिलाया, नहीं पापा। aunty ने बताया था बस।

कौन aunty?

जो यहाँ रहती हैं… उन्होंने कहा आपको याद नहीं रहता।

समर के भीतर हल्की झुंझलाहट और बेचैनी एक साथ उठी। उसने सोचा शायद इरा नई जगह से घबराई हुई है। बच्चों का imaginary friend होना सामान्य बात है। उसने खुद को समझाया — यह घर पुराना है, दीवारों पर पहले से लिखा होगा, इरा ने देख लिया होगा।

उस दिन दोपहर में वह पास की किराना दुकान तक गया। दुकान वाले बुज़ुर्ग ने उसका पता सुना तो एक पल को चुप हो गया। सत्ताईस नंबर?

हाँ, क्यों?

बस… पुराना घर है। लोग टिकते नहीं वहाँ।

क्यों?

बुज़ुर्ग ने कंधे उचकाए, कहते हैं पहले भी एक बाप-बेटी रहते थे।

समर ने दिल की धड़कन तेज़ होते महसूस की। अब?

अब कोई नहीं, उसने नज़रें चुराते हुए कहा।

घर लौटकर समर ने देखा कि किचन की खिड़की खुली थी, जबकि उसने जाते वक्त बंद की थी। परदे हवा में नहीं हिल रहे थे — बाहर बिल्कुल हवा नहीं थी।

टेबल पर दो प्लेटें सजी थीं।

इरा कुर्सी पर बैठी मुस्कुरा रही थी।

पापा, aunty ने कहा आप देर कर देते हैं।

समर ने चारों ओर देखा। घर शांत था।

बहुत शांत।

समर ने खुद को शांत रखने की कोशिश की। इरा, ये प्लेट किसने लगाई? उसने सामान्य आवाज़ में पूछा।

मैंने, इरा ने सहजता से कहा। आपके लिए… और aunty के लिए।

लेकिन यहाँ कोई aunty नहीं है।

इरा ने उसकी तरफ ऐसे देखा जैसे वह कुछ बहुत साधारण बात समझ नहीं पा रहा हो। वो कहती हैं आप उन्हें देख नहीं पाते।

समर ने गहरी सांस ली। उसने प्लेट हटाई, खिड़की बंद की और खुद को तर्कों में उलझा लिया — नया शहर, नया घर, इरा का अकेलापन। वह उसे किसी काउंसलर के पास ले जाएगा। बात खत्म।

लेकिन उसी रात बात खत्म नहीं हुई।

करीब साढ़े बारह बजे समर की नींद खुली। घर में हल्की-सी सरसराहट थी — जैसे कागज़ हिल रहे हों। वह उठकर हॉल में आया। टेबल पर रखी डायरी खुली थी, जो वह साथ लाया था — उसकी पत्नी की आख़िरी लिखी हुई डायरी।

उसने पास जाकर देखा। आख़िरी पन्ने पर नई लाइन लिखी थी —
तुमने सुना क्यों नहीं?

समर का खून सूख गया। यह वही सवाल था जो उसकी पत्नी ने आख़िरी रात उससे कहा था।

पीछे से इरा की धीमी आवाज़ आई —
पापा… aunty नाराज़ हैं।

समर पलटा। क्यों?

क्योंकि आपने उनकी बात भी नहीं सुनी थी।

समर के कानों में भनभनाहट होने लगी। किसकी बात?

इरा ने धीरे से कहा, जो यहाँ पहले रहती थीं… उन्होंने भी बहुत बार कहा था कि खिड़की बंद रखना… पर उनके पापा ने नहीं सुना।

समर के हाथ से डायरी गिर गई।

उसे पहली बार लगा — यह सब कल्पना नहीं हो सकता।

क्योंकि जो सवाल उस पन्ने पर लिखा था…
वह सिर्फ दो लोगों के बीच की आख़िरी बात थी।

और उनमें से एक अब ज़िंदा नहीं थी।

डायरी ज़मीन पर खुली पड़ी थी। समर की धड़कनें कानों में गूंज रही थीं। उसने तुरंत पन्ना पलटा — बाकी सब वैसा ही था, स्याही पुरानी, लिखावट वही। लेकिन आख़िरी लाइन… वह ताज़ा थी। उंगलियों से छूकर देखा — ग्रेफाइट की हल्की परत उभर आई। यह पेंसिल से लिखा गया था।

इरा, तुमने लिखा?

इरा दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने धीरे से सिर हिलाया। नहीं पापा… aunty ने।

बस! समर की आवाज़ ऊँची हो गई। कोई aunty नहीं है!

घर अचानक अजीब-सा गूंजने लगा — जैसे खाली कमरों में हवा घूम रही हो। तभी किचन की खिड़की तेज़ आवाज़ से खुली। परदे बेतरतीब फड़फड़ाए। बाहर आसमान बिल्कुल शांत था।

इरा डरकर समर के पास आ गई। पापा, वो नाराज़ हो जाती हैं जब आप चिल्लाते हैं।

समर ने खुद को संभाला। वह सीधा स्टोर रूम की तरफ बढ़ा, जहाँ मकान मालिक ने कुछ पुरानी चीज़ें रख छोड़ी थीं। उसे सच्चाई चाहिए थी। अंदर एक लकड़ी का बक्सा था। उसने उसे खोला। उसमें पुराने अख़बारों की कतरनें थीं।

एक हेडलाइन पर उसकी नज़र अटक गई —
घर नं. 27 में पिता-बेटी की रहस्यमय मौत

तारीख़… ठीक एक साल पुरानी। वही दिन… जिस दिन उसकी पत्नी की मौत हुई थी।

समर के हाथ काँपने लगे। खबर में लिखा था — पड़ोसियों ने खिड़की खुली देखी थी। गैस लीक हुई… और दोनों की मौत हो गई।

उन्होंने खिड़की बंद रखने को कहा था इरा की आवाज़ पीछे से आई।

समर ने अख़बार नीचे किया। किसने

इरा ने धीरे से कहा, बेटी ने… अपने पापा से

समर के दिमाग में झटका लगा।

उस रात भी… उसकी पत्नी ने कहा था —
कृपया मेरी बात सुन लो।

और उसने अनसुना कर दिया था।

घर की लाइट झपकी।

और दीवार पर पेंसिल से एक और लाइन उभर आई —
इस बार भी नहीं सुनोगे?

दीवार पर उभरे शब्दों को देखकर समर पीछे हट गया। उसने साफ देखा — यह कोई पुराना निशान नहीं था। अक्षर अभी-अभी बने थे, जैसे किसी अदृश्य हाथ ने ताज़ा लिखा हो। इस बार भी नहीं सुनोगे?

उसके भीतर कुछ टूटने लगा।

इरा, सच बताओ… तुम्हें ये बातें कौन बता रहा है?

इरा की आँखें नम थीं। पापा… वो कहती हैं कि अगर आपने खिड़की फिर खुली छोड़ दी तो सब दोबारा होगा।

समर का दिमाग तेज़ी से चलने लगा। उसने अख़बार की खबर फिर पढ़ी — गैस लीक… खिड़की खुली… पिता ने चेतावनी अनसुनी की।

उसी पल उसे किचन से बहुत हल्की-सी गंध आई।

गैस।

उसकी सांस अटक गई। वह भागकर किचन में गया। स्टोव बंद था, लेकिन नॉब थोड़ा-सा खुला हुआ था। खिड़की आधी खुली थी।

इरा! वह चिल्लाया।

इरा दरवाज़े पर खड़ी थी। मैंने नहीं खोला पापा… aunty ने कहा था आप भूल जाते हो।

समर के हाथ काँप रहे थे। उसने तुरंत नॉब बंद किया, खिड़की कसकर बंद की और सारे दरवाज़े खोल दिए। दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि सीना फटने लगे।

उसे याद आया — ठीक एक साल पहले… उस रात भी किचन में गैस की हल्की गंध थी। पत्नी ने कहा था — कुछ ठीक नहीं लग रहा। और उसने कहा था — तुम हर बात बढ़ा-चढ़ा देती हो।

कुछ घंटों बाद… सब खत्म हो गया था।

समर की आँखों में डर साफ था।

क्या यह घर उसे चेतावनी दे रहा था?

या वह खुद वही गलती दोहराने वाला था?

उसी समय ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

समर और इरा दोनों ने एक साथ सीढ़ियों की तरफ देखा।

और पहली बार… इरा ने फुसफुसाकर कहा —

पापा… आज aunty आपको दिखेंगी।

सीढ़ियों से आती आवाज़ ने घर की खामोशी चीर दी। समर ने हिम्मत जुटाई और ऊपर बढ़ा। हर कदम भारी था। पीछे इरा खड़ी थी — इस बार वह डरी हुई नहीं लग रही थी… बल्कि अजीब तरह से शांत थी।

स्टोर रूम का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर हल्की रोशनी थी, जबकि वहाँ कोई बल्ब नहीं था। समर ने दरवाज़ा पूरी तरह खोला। कमरे के बीचों-बीच पुराना आईना रखा था — शायद पहले कभी दीवार पर टंगा होगा।

आईने में उसने खुद को देखा… थका हुआ, डरा हुआ।

फिर अचानक प्रतिबिंब बदल गया।

आईने में खड़ा आदमी समर नहीं था। उसका चेहरा जला हुआ था, आंखों में खालीपन। पीछे धुआँ भरा किचन दिख रहा था।

समर पीछे हट गया। ये क्या है…?

नीचे से इरा की आवाज़ आई —
पापा… aunty कह रही हैं सच देख लो।

समर का दिमाग झनझना उठा। यादें तेज़ी से लौटने लगीं। उस रात गैस लीक हुई थी। उसकी पत्नी ने चेतावनी दी थी। वह गुस्से में घर से निकल गया था। लेकिन… विस्फोट के बाद वह लौटा ही नहीं था।

वह अस्पताल पहुँचा था… पर बहुत देर से।

और सच्चाई इससे भी ज़्यादा डरावनी थी।

अख़बार की खबर गलत नहीं थी।

घर नं. 27 में पिता-बेटी की मौत हुई थी।

पिता — समर।

इरा नीचे हॉल में खड़ी थी… लेकिन आईने में वह अकेली थी।

समर की सांस अटक गई।

वह पूरे एक साल से उसी घर में भटक रहा था — यह मानकर कि वह ज़िंदा है और पत्नी मर चुकी है।

असली में — पत्नी और इरा बच गई थीं।

मरने वाला वह खुद था।

आईने में धुंधली आकृति मुस्कुराई।

इस बार… सुन लिया।

अगली सुबह घर नं. 27 फिर खाली था।

खिड़की बंद थी।

और दीवार पर आख़िरी लाइन उभरी हुई थी —
अब शांति है।

 

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