Adhoori takkar
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पापा… ब्रेक लगाओ…

तेज़ बारिश शीशे पर हथेलियों की तरह पड़ रही थी। वाइपर पागलों की तरह चल रहे थे, लेकिन सामने की सड़क धुंधली थी। कबीर की उंगलियाँ स्टीयरिंग पर जकड़ी हुई थीं। उसके कानों में अपनी ही आवाज़ गूंज रही थी — तुम मुझे धोखा दे रही हो, नैना!

पीछे से एक छोटी-सी आवाज़ फिर आई — पापा… डर लग रहा है…

अचानक सामने हेडलाइट की तेज़ सफ़ेद चमक उभरी। एक पल… सिर्फ एक पल के लिए सब थम गया।

और फिर — ज़ोरदार टक्कर।

अंधेरा।

जब कबीर ने आँखें खोलीं, इस बार सामने अस्पताल की सफ़ेद छत थी। दवाइयों की गंध, मशीन की धीमी बीप… और पास बैठी नैना, जिसकी आँखें बुरी तरह सूजी हुई थीं।

तुम छह महीने से कोमा में थे, उसने धीमे से कहा।

छह महीने।

कबीर ने बोलने की कोशिश की, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए। उसके दिमाग में सब कुछ टूटा हुआ था — बारिश, गुस्सा, चीख… और वो छोटी-सी आवाज़।

कुछ दिनों बाद जब वह घर लौटा, सब कुछ अजीब तरह से शांत था। दीवारों का रंग वही, फर्नीचर वही… पर हवा पूरी तरह बदल चुकी थी।

बाथरूम में दो टूथब्रश रखे थे। अलमारी में छोटे साइज की टी-शर्ट। ड्रॉइंग रूम के कोने में एक नीली खिलौना कार पड़ी थी, जिसके पहिए टेढ़े थे।

ये सब किसका है? कबीर ने पूछा।

नैना कुछ पल चुप रही।
पुरानी चीज़ें हैं…

रात को कबीर की नींद खुली। बगल में बिस्तर खाली था।

गलियारे के आख़िरी कमरे से हल्की रोशनी आ रही थी।

अंदर से नैना की धीमी आवाज़ सुनाई दी —
सो जाओ… पापा अब गुस्सा नहीं करेंगे…

कबीर का दिल जोर से धड़कने लगा।

क्योंकि उस घर में… कोई बच्चा नहीं था।

सुबह की धूप खिड़की से भीतर आ रही थी, लेकिन कबीर के भीतर अजीब-सी सिहरन थी। रात का दृश्य उसकी आँखों में अटका हुआ था — नैना फर्श पर बैठी, सामने नीली खिलौना कार, और कमरे में किसी बच्चे की तरह धीमे-धीमे बात करती हुई।

नाश्ते की मेज़ पर सब सामान्य था। नैना चुपचाप चाय रख रही थी। उसके हाथ हल्के-हल्के काँप रहे थे। कबीर ने गौर किया — रसोई की शेल्फ पर एक छोटा स्टील का गिलास रखा था, जिस पर कार्टून बना था।

ये किसका है? उसने सहज बनने की कोशिश की।

नैना एक पल के लिए जड़ हो गई। फिर बिना उसकी तरफ देखे बोली, पुराना है… फेंकना भूल गई।

कबीर की नजरें घर में घूमने लगीं। ड्रॉइंग रूम की दीवार पर लगी तस्वीरों में एक फ्रेम उल्टा रखा था। उसने उसे सीधा किया — शीशा टूटा हुआ था। और तस्वीर गायब थी। उसे सब कुछ बहुत अजीब लग रहा था कि तभी अचानक…

उसके सिर में हल्का-सा दर्द उठा। कुछ यादें चमककर बुझ गईं — बारिश, तेज़ आवाज़, किसी का रोना… पापा…

दोपहर में कबीर धीरे-धीरे उस बंद कमरे की ओर बढ़ा जहाँ रात को रोशनी थी। दरवाज़ा इस बार बंद था। उसने हैंडल घुमाया — लॉक।

ये कमरा बंद क्यों है?

नैना की आवाज़ पीछे से आई, वहाँ कुछ नहीं है।

लेकिन कबीर को लगा जैसे अंदर से हल्की-सी खिलखिलाहट आई हो। वह जड़ हो गया।

रात को फिर उसकी नींद टूटी। इस बार उसे साफ सुनाई दिया —

मम्मा, पापा कब आएँगे?

कबीर का गला ड़र से सूख गया।

वह भागकर दरवाज़े तक पहुँचा और ज़ोर से धक्का मारा। दरवाज़ा खुल गया।

कमरे में धूल जमी थी। दीवारों पर कार्टून स्टिकर उखड़े हुए थे। कोने में एक छोटा बिस्तर पड़ा था… और उस पर रखी थी वही नीली खिलौना कार।

कबीर की सांसें तेज़ हो गईं।

उसे अचानक याद आया —
एक छोटा हाथ… जो स्टीयरिंग के पास उसकी बाजू पकड़ रहा था।

और उस रात… कार में सिर्फ वह और नैना नहीं थे।

उस रात के बाद कबीर ने तय कर लिया कि अब वह अपने दिमाग पर भरोसा नहीं करेगा… सच ढूँढेगा। सुबह नैना मंदिर गई हुई थी। घर में गहरी खामोशी छाई थी।

कबीर धीरे-धीरे उसी कमरे में गया — छोटा बिस्तर, धूल भरी स्टडी टेबल, दीवार पर आधे उखड़े कार्टून स्टिकर। उसने काँपते हाथों से अलमारी खोली। अंदर छोटे-छोटे कपड़े करीने से रखे थे… जैसे कोई अभी आकर पहन लेगा।

नीचे एक ड्रॉअर में उसे एक फाइल मिली। मेडिकल रिपोर्ट।

उसने पढ़ना शुरू किया —
मृतक – आरव कबीर मल्होत्रा। आयु – 5 वर्ष।

कबीर की सांस अटक गई और पूरी दुनिया उलट-पलट गई।

आरव।

उसका सिर चकराने लगा। अचानक उसे एक जन्मदिन याद आया — केक पर पाँच मोमबत्तियाँ, छोटा-सा चेहरा, जो मुस्कुराकर कह रहा था और बोल रहा था— पापा, जल्दी काटो!

उसने खुद से फुसफुसाया, नहीं… ये सच नहीं है…

तभी पीछे से नैना की आवाज़ आई —
तुम्हें ये सब नहीं देखना चाहिए था।

कबीर ने मुड़कर देखा। नैना दरवाज़े पर खड़ी थी। उसकी आँखें खाली थीं, जैसे आँसू भी अब सूख चुके थें।

आरव… हमारा बेटा था?

कुछ पल के लिए हवा भी रुक गई।

नैना की आवाज़ टूटी —
था नहीं… है। मेरे लिए तो वो अभी भी है।

कबीर के दिमाग में अचानक सब कुछ तेज़ी से चमकने लगा —
वो रात।
उसका गुस्सा।
नैना पर शक।
पीछे की सीट पर बैठा आरव… जो रोते हुए कह रहा था, पापा, लड़ो मत…

और फिर —

ब्रेक पर उसका पैर नहीं गया था।

उसने जानबूझकर स्टीयरिंग मोड़ा था।

कबीर के हाथ काँपने लगे।

उसने धीरे से कहा —
उस रात… कार में तुम नहीं थीं?

नैना ने सिर हिलाया।

मैं घर पर थी, कबीर… तुम आरव को लेकर निकले थे और कॉल पर मुझसे बात कर रहे थे।

कमरे में सन्नाटा फैल गया।

कबीर को पहली बार समझ आया —
उसने सिर्फ एक्सीडेंट नहीं किया था…

उसने अपने ही बेटे को मार दिया था।

कमरे की दीवारें जैसे कबीर पर झुकने लगी थीं। मेडिकल रिपोर्ट उसके हाथ से फिसलकर ज़मीन पर गिर गई। आरव कबीर मल्होत्रा… आयु – 5 वर्ष… ये शब्द उसके कानों में हथौड़े की तरह बज रहे थे।

नहीं… नहीं… मैं ऐसा नहीं कर सकता… वह बड़बड़ाया।

नैना धीरे-धीरे कमरे के अंदर आई। उसके कदमों में थकान थी, जैसे वह ये सच छह महीने नहीं, छह जन्मों से ढो रही हो।

तुमने किया, कबीर, उसकी आवाज़ में न गुस्सा था, न नफ़रत… सिर्फ़ टूटा हुआ सच।

कबीर की आँखों में आँसू भर आए। मैंने जानबूझकर नहीं—

तुम गुस्से में थे, नैना ने बात काट दी। तुम्हें लगा मैं किसी और के साथ थी। तुमने कहा था — अगर तुम मेरी नहीं तो किसी की नहीं। लेकिन कार में मैं नहीं थी…

कबीर के कानों में फिर वही छोटी आवाज़ गूँजी —
पापा… घर चलो…

उसने सिर पकड़ लिया। फ्लैशबैक साफ़ होने लगे।
आरव पीछे की सीट पर था।
वो रो रहा था।
कबीर गुस्से में स्टीयरिंग कसकर पकड़े था।
सामने ट्रक की हेडलाइट्स थीं।

और उसने… ब्रेक नहीं दबाया।

तुम बच गए, नैना की आँखों से आँसू बह निकले। डॉक्टर कहते हैं, तुमने आख़िरी पल में दरवाज़ा खोला… खुद को बाहर फेंक दिया। लेकिन आरव… सीट बेल्ट में फँसा रह गया।

ये शब्द सुनते ही कबीर जैसे भीतर से मर गया हो।

कमरे में रखी नीली खिलौना कार अचानक मेज़ से गिरकर ज़मीन पर लुढ़क गई।

कबीर सिहर उठा।

उसे साफ़ सुनाई दिया —
पापा… अब गुस्सा नहीं करेंगे ना?

उसकी साँसें टूटने लगीं।

अब उसे समझ आ गया था —
उसकी सज़ा जेल से पहले शुरू हो चुकी थी।

घर में अजीब-सी शांति थी। बाहर शाम ढल रही थी, लेकिन भीतर समय जैसे रुक गया था। कबीर सोफे पर बैठा था, हाथों में मेडिकल रिपोर्ट, सामने फर्श पर पड़ी नीली खिलौना कार।

मैं पुलिस के पास जाऊँगा, उसने धीमे लेकिन साफ़ शब्दों में कहा।

नैना कुछ पल उसे देखती रही। उसकी आँखों में आँसू थे, पर उनमें अब गुस्सा नहीं था—सिर्फ़ थकान थी।
छह महीने से मैं हर दिन मर रही हूँ, कबीर, उसने कहा। तुम कोमा में थे… और मैं उस कमरे में बैठकर आरव से बात करती थी। क्योंकि अगर मैं मान लूँ कि वो नहीं है… तो मैं भी नहीं बचूँगी।

कबीर का गला भर आया।
क्या… क्या उसने बहुत दर्द सहा?

यह सवाल पूछते ही उसकी आवाज़ टूट गई।

नैना की साँस अटक गई।
डॉक्टर ने कहा… सब कुछ कुछ ही सेकंड में खत्म हो गया।

कबीर ने आँखें बंद कर लीं। उसके दिमाग में आख़िरी दृश्य साफ़ हो गया —
आरव पीछे की सीट पर था।
उसने रोते हुए कहा था, पापा, घर चलो…
और उसने गुस्से में स्टीयरिंग मोड़ दिया था।

दरवाज़े के बाहर पुलिस की गाड़ी की हल्की आवाज़ सुनाई दी।

नैना ने दरवाज़ा खोला। पुलिस अंदर आई।

कबीर उठ खड़ा हुआ। उसके कदम भारी थे, लेकिन इस बार भागने की कोशिश नहीं थी।

हथकड़ी लगते समय उसने आख़िरी बार उस कमरे की ओर देखा।

दरवाज़ा आधा खुला था।

अंदर हल्की-सी रोशनी थी… और नीली कार धीरे-धीरे खुद-ब-खुद घूम रही थी।

कबीर की आँखों से आँसू बह निकले।

अब फैसला अदालत करेगी…
लेकिन सज़ा उसके दिल ने पहले ही सुना दी थी।

कोर्टरूम में सन्नाटा था। जज की आवाज़ गूंज रही थी, लेकिन कबीर के कानों में सिर्फ एक ही आवाज़ थी — पापा…

उसने बिना वकील के, बिना बहस के अपना जुर्म कबूल कर लिया।
मैंने गुस्से में गाड़ी मोड़ी। मुझे लगा मेरी पत्नी मुझे धोखा दे रही है। मैं उसे सज़ा देना चाहता था… पर कार में मेरा बेटा था। मैंने ब्रेक नहीं दबाया।

नैना पीछे खड़ी थी। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उनमें अब कोई उम्मीद नहीं बची थी।

सज़ा सुनाई गई।

लोहे की सलाखों के पीछे बैठा कबीर पहली बार सच में जागा हुआ महसूस कर रहा था। अस्पताल से उठने के बाद से जो धुंध थी, वो अब साफ हो चुकी थी।

रात गहरी थी। जेल की कोठरी में हल्की-सी पीली रोशनी जल रही थी। बाकी कैदी सो चुके थे।

कबीर दीवार से सिर टिकाकर बैठा था।

मैंने तुम्हें मार दिया… वह फुसफुसाया।

अचानक उसे लगा जैसे उसके सामने फर्श पर कुछ लुढ़का।

नीली खिलौना कार।

वह जड़ हो गया।

उसने काँपते हाथों से आगे बढ़कर उसे छूना चाहा, लेकिन कार धीरे-धीरे खुद-ब-खुद उसकी तरफ खिसक आई।

और फिर वही छोटी-सी मासूम आवाज़ कोठरी में गूंजी —पापा… अब आप अकेले नहीं हो।

कबीर की आँखों से आँसू बह निकले। इस बार डर नहीं था… बस असहनीय पछतावा था।

कैमरा धीरे-धीरे पीछे हटता है।

सलाखों के पीछे बैठा एक टूटा हुआ पिता…
और फर्श पर रखी नीली कार, जो धीरे-धीरे अंधेरे में गायब हो जाती है।

क्योंकि कुछ सज़ाएँ अदालत नहीं देती…
कुछ सज़ाएँ ज़िंदगी देती है।

 

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