रात के लगभग साढ़े दस बजे थे। हल्की बारिश के बाद सड़क पर गीली मिट्टी की खुशबू फैली हुई थी। स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में सब कुछ धुंधला-सा लग रहा था। आरव रोज़ की तरह ऑफिस से घर लौट रहा था कि अचानक उसकी नज़र सड़क के किनारे पड़ी एक काली डायरी पर जा टिकी। डायरी अजीब तरह से साफ थी, जैसे अभी-अभी किसी ने उसे वहाँ रखा हो।
जिज्ञासा में उसने डायरी उठा ली। कवर पर उभरे हुए अक्षरों में लिखा था— जो कुछ भी लिखा है, वही होगा। यह पढ़कर वह हल्का-सा मुस्कुराया, उसे यह कोई मज़ाक या सस्ता सा ड्रामा लगा। घर पहुँचकर उसने दरवाज़ा बंद किया और डायरी खोली। पहला पन्ना आज की तारीख से भरा था। नीचे साफ-साफ लिखा था—
रात 11:15 बजे सामने वाली बिल्डिंग में आग लगेगी। कोई मरेगा नहीं, पर एक गहरा सच सामने आएगा।
आरव ने घड़ी देखी—10:58। उसका दिल थोड़ा तेज़ धड़कने लगा, पर उसने खुद को समझाया कि यह महज़ संयोग होगा। लेकिन ठीक 11:15 पर बाहर भारी शोर मच गया। खिड़की से देखा तो सामने वाली बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल से धुआँ उठ रहा था।
उसके हाथ काँपने लगे। उसने घबराकर डायरी दोबारा खोली। आखिरी लाइन पढ़ते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया— क्योकि उसमे लिखा था,
आरव यह सब अपनी आँखों से देखेगा… और यही उसकी कहानी की शुरुआत होगी।
उसका नाम… साफ-साफ लिखा था। जो की किसी चम्तकार से कम नहीं था।
अगली सुबह आरव की आँखें भारी थीं, मानो पूरी रात नींद ने उससे दूरी बना ली हो। बार-बार उसके दिमाग में वही सवाल घूम रहा था—क्या सच में डायरी भविष्य बता रही है, या कोई उसके साथ खेल खेल रहा है? काँपते हाथों से उसने डायरी फिर खोली। आज की तारीख पहले से लिखी थी। नीचे साफ शब्दों में लिखा था— दोपहर 2:30 बजे ऑफिस में बड़ा खुलासा होगा। जिस पर सबसे ज्यादा भरोसा है, वही गुनहगार निकलेगा। आरव सच जानने की कोशिश करेगा।
उसका दिल बैठ गया। वह ऑफिस पहुँचा तो सब कुछ सामान्य लग रहा था। सहकर्मी हँस रहे थे, काम चल रहा था, लेकिन उसके भीतर बेचैनी बढ़ती जा रही थी। घड़ी की सुइयाँ जैसे जानबूझकर धीरे चल रही थीं। ठीक 2:25 पर अचानक अकाउंट्स विभाग में हड़कंप मच गया। कंपनी के सिस्टम से बड़ी रकम गायब थी। मैनेजमेंट ने तुरंत जांच शुरू की।
2:30…
आईटी टीम ने लॉग्स चेक किए और सबकी साँसें थम गईं। गड़बड़ी जिस आईडी से हुई थी, वह रोहन की थी—वही रोहन, जिसे सब ईमानदार और सीधा समझते थे। ऑफिस में सन्नाटा छा गया। रोहन बार-बार कह रहा था कि उसने कुछ नहीं किया, लेकिन सबूत उसके खिलाफ थे।
आरव के माथे पर पसीना आ गया। डायरी का हर शब्द सच हो चुका था। उसने तुरंत वॉशरूम में जाकर डायरी खोली। नीचे एक नई लाइन उभरी हुई थी, जो उसने पहले नहीं देखी थी— आरव जितना गहराई में जाएगा, खतरा उतना करीब आएगा।
अब उसे यकीन हो गया था कि यह सिर्फ संयोग नहीं है। कोई अदृश्य ताकत उसकी हर चाल जानती थी। लेकिन सवाल यह था—क्या वह इस खेल का मोहरा है, या अगला शिकार?
रोहन की गिरफ़्तारी के बाद से आरव का डर और गहरा हो चुका था। उसे अब यकीन था कि डायरी सिर्फ घटनाएँ नहीं लिखती, बल्कि किसी अनदेखी ताकत की योजना बयान करती है। उस रात उसने हिम्मत जुटाकर डायरी के आगे के पन्ने पलटे। जैसे-जैसे वह पन्ने पलटता गया, उसकी सांसें भारी होती गईं। कई छोटी-छोटी घटनाएँ लिखी थीं—किसी का एक्सीडेंट, किसी का झगड़ा, किसी का अचानक गायब हो जाना—और हर घटना के सामने समय और तारीख दर्ज थी।
फिर उसकी नजर एक पन्ने पर टिक गई। तारीख थी—17 नवंबर 2026। नीचे मोटे अक्षरों में लिखा था—
आरव की मृत्यु शाम 7:20 बजे होगी। कारण—वह सच जानने की कोशिश करेगा।
उसके हाथ सुन्न पड़ गए। दिल की धड़कन इतनी तेज हो गई कि उसे लगा सीने से बाहर निकल आएगी। उसने तुरंत अगली लाइन पढ़ी—
वह इस नियति को बदलने की कोशिश करेगा, लेकिन वही कोशिश उसे अंत तक ले जाएगी।
आरव ने गुस्से में डायरी बंद कर दी। यह सब बकवास है, उसने खुद से ही कहा। लेकिन भीतर कहीं न कहीं उसे पता था कि अब तक डायरी की हर बात सच ही साबित हुई है।
अगले दिन उसने तय किया कि वह इस रहस्य की जड़ तक जाएगा। उसने डायरी के पिछले हिस्से को ध्यान से देखा। कवर के अंदर एक हल्का-सा उभरा निशान था—एक अजीब सा प्रतीक, जो किसी पुराने संगठन या गुप्त समूह का लगता था।
उसी रात उसे एक अनजान नंबर से कॉल आया। दूसरी तरफ सिर्फ एक धीमी आवाज थी—
डायरी पढ़ना बंद कर दो… वरना आखिरी पन्ना जल्दी सच हो जाएगा।
फोन कट गया।
अब यह सिर्फ भविष्य जानने का खेल नहीं था।
कोई उसे देख रहा था।
और शायद… वही इस कहानी का असली लेखक था।
फोन कॉल के बाद आरव पूरी रात सो नहीं पाया। वह समझ चुका था कि डायरी कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित खेल है। सवाल यह था—कौन खेल रहा है? और क्यों? अगली सुबह उसने तय किया कि वह उस अजीब प्रतीक का पता लगाएगा जो डायरी के अंदर बना हुआ था। उसने इंटरनेट खंगाला, पुराने लेख पढ़े, लेकिन कुछ खास नहीं मिला।
दोपहर में उसे याद आया कि उसके कॉलेज का दोस्त निखिल अब क्राइम ब्रांच में काम करता है। उसने निखिल से मिलने का फैसला किया। कैफे में बैठकर उसने सारी बात बताई—डायरी, घटनाएँ, मौत की तारीख और वह रहस्यमयी कॉल। निखिल ने पहले तो इसे मज़ाक समझा, लेकिन जब आरव ने डायरी के पन्ने दिखाए और पिछली घटनाओं का समय बताया, तो उसका चेहरा गंभीर हो गया।
निखिल की नजर उस प्रतीक पर टिक गई। उसने धीमे स्वर में कहा, यह चिन्ह ‘अंतर्चक्र’ नाम के एक गुप्त समूह से मिलता-जुलता है। सालों पहले यह समूह लोगों की ज़िंदगी से खेलकर ‘भाग्य’ को नियंत्रित करने का दावा करता था। लेकिन कुछ साल पहले यह अचानक गायब हो गया।
आरव के रोंगटे खड़े हो गए। मतलब कोई अभी भी यह सब चला रहा है?
निखिल ने चेतावनी दी, अगर यह वही लोग हैं, तो तुम बहुत खतरनाक खेल में फंस चुके हो। वे लोगों को मानसिक रूप से तोड़ते हैं… और फिर उनकी नियति तय करते हैं।
उसी शाम आरव ने डायरी दोबारा खोली। एक नई लाइन उभर चुकी थी—
आरव सच के और करीब आ रहा है। अगला कदम उसे सीधे लेखक तक ले जाएगा।
उसके नीचे एक पता लिखा था।
आरव समझ गया—अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं।
या तो वह सच का सामना करेगा…
या डायरी उसकी कहानी का अंत खुद लिख देगी।
डायरी में लिखा हुआ पता शहर के पुराने औद्योगिक इलाके का था—एक बंद पड़ी प्रिंटिंग प्रेस, जो सालों से वीरान मानी जाती थी। शाम ढलते ही आरव वहाँ पहुँचा। टूटी खिड़कियाँ, जंग लगे शटर और अंदर से आती स्याही की हल्की-सी गंध… मानो समय यहाँ रुक गया हो। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था, लेकिन अब लौटना संभव नहीं था।
अंदर कदम रखते ही उसे दीवारों पर वही प्रतीक दिखाई दिया—अंतर्चक्र का चिन्ह। कमरे के बीचों-बीच एक पुरानी प्रिंटिंग मशीन थी, और उसके पास मेज पर कई काली डायरी रखी थीं। हर डायरी के कवर पर अलग-अलग नाम उकेरे हुए थे।
अचानक पीछे से आवाज आई—
तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था, आरव।
वह पलटा। सामने एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था, चेहरे पर अजीब-सी शांति।
कौन हो तुम? आरव ने काँपती आवाज में पूछा।
वह मुस्कुराया। हम लेखक नहीं… बस संपादक हैं। लोग अपनी किस्मत खुद लिखते हैं। हम सिर्फ उसे समय पर छाप देते हैं।
आरव ने गुस्से में डायरी उठाई। तो मेरी मौत भी तुमने छापी है?
आदमी ने सिर हिलाया। नहीं। तुम्हारी जिद ने लिखी है। तुम जितना सच के पीछे भागोगे, उतना ही वह तुम्हें निगल जाएगा।
उसी पल मशीन अपने आप चलने लगी। कागज़ बाहर निकलने लगा। आरव ने काँपते हाथों से नया पन्ना उठाया। उस पर लिखा था—
आरव आज 7:20 से पहले फैसला करेगा। या तो डायरी जलाएगा… या खुद जल जाएगा।
घड़ी में 6:55 हो रहे थे।
उसने चारों तरफ देखा—कमरे के कोनों में कैमरे लगे थे। यह सिर्फ अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक संगठित खेल था।
अब उसके पास सिर्फ पच्चीस मिनट थे।
या तो वह इस जाल को खत्म करेगा…
या यह जाल उसकी कहानी का आखिरी अध्याय लिख देगा।
लेकिन अब डर की जगह उसके भीतर गुस्सा था। 7:00 बज चुके थे। उसने कमरे में रखी बाकी डायरियों को तेजी से पलटना शुरू किया। हर डायरी में अलग-अलग लोगों की “भविष्यवाणियाँ” थीं—पर कुछ पन्नों के किनारों पर हल्के पेंसिल के निशान दिख रहे थे, जैसे पहले ड्राफ्ट लिखे गए हों और फिर पेन से फाइनल कॉपी छापी गई हो।
आरव समझ गया—यह भाग्य नहीं, मनोवैज्ञानिक जाल था। लोगों को पहले डराओ, फिर परिस्थितियाँ पैदा करो, और अंत में घटना को “भविष्य” साबित कर दो।
7:10। उसने पास रखे कैमरों की वायर खींच दी। अधेड़ आदमी चिल्लाया, “तुम खेल बिगाड़ रहे हो!”
आरव ने प्रिंटिंग मशीन में फंसा नया पन्ना फाड़ दिया। उस पर आधी लाइन छपी थी—
आरव आग में— उसने मेज से लाइटर उठाया और सारी डायरियों को आग लगा दी। लपटें तेज़ उठीं। आदमी उसे रोकने दौड़ा, लेकिन धुएँ में घिर गया।
7:19।
आरव बाहर भागा। ठीक 7:20 पर अंदर जोरदार धमाका हुआ।
आग में प्रिंटिंग प्रेस जल चुकी थी—और उसके साथ “अंतर्चक्र” का खेल भी।
उस रात पहली बार उसने डायरी के बिना भविष्य देखा।
और इस बार… कहानी उसने खुद लिखी।

