बंद खिड़की
बंद खिड़की

हर रात ठीक 2:46 बजे खिड़की पर खरोंच की आवाज़ आती थी। शुरुआत में रोहन ने इसे नज़रअंदाज़ किया। नई जगह थी, पुरानी बिल्डिंग, खिड़की के बाहर पेड़ की सूखी टहनियाँ— उसने खुद को समझाया कि हवा की वजह से आवाज़ आती होगी। लेकिन तीसरी रात आवाज़ अलग थी। नियमित। लयबद्ध। जैसे कोई नाखून से काँच को धीरे-धीरे रगड़ रहा हो। कृररर… कृररर…

उस रात वह अचानक उठ बैठा। कमरा अंधेरे में डूबा था। सिर्फ डिजिटल घड़ी की लाल रोशनी चमक रही थी— 2:46 AM। आवाज़ फिर आई। इस बार थोड़ी तेज़। उसका दिल धड़कने लगा। वह धीरे-धीरे बिस्तर से उतरा और खिड़की के पास गया। पर्दा हटाया। बाहर गली सुनसान थी। स्ट्रीट लाइट टिमटिमा रही थी। उसने हिम्मत करके खिड़की खोली— बाहर कोई नहीं था। नीचे सड़क खाली। सामने की इमारत अंधेरी।

वह खुद पर हँसा। “ओवरथिंक मत कर,” उसने खुद से कहा। खिड़की बंद की और वापस सो गया।

लेकिन सुबह जब उसकी आँख खुली तो उसकी रूह काँप गई। बेड के सामने वाली दीवार पर काले, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था—

मैं अंदर आ गया हूँ।

उसका गला सूख गया। वह कुछ देर तक वहीं खड़ा दीवार को घूरता रहा। यह मज़ाक नहीं हो सकता था। दरवाज़ा अंदर से बंद था। खिड़की भी। कोई अंदर आया कैसे?

उसने तुरंत दीवार साफ की। पेंट पर हल्का दाग रह गया, लेकिन शब्द मिट गए। उसने फैसला किया— आज रात वह जागेगा।

दूसरी रात 2:46 से पहले ही वह जागकर बैठ गया। कमरे की लाइट बंद, सिर्फ मोबाइल की हल्की रोशनी। और ठीक समय पर— वही आवाज़। कृररर…

इस बार उसने खिड़की नहीं खोली। वह वहीं बैठा सुनता रहा। आवाज़ पाँच मिनट तक चलती रही… फिर अचानक बंद।

सुबह उसकी धड़कन तेज़ थी। वह धीरे-धीरे उठा। दीवार की तरफ देखा—

इस बार लिखा था—

खिड़की क्यों नहीं खोली?

उसकी टाँगों से जैसे ताकत निकल गई। लेकिन इस बार एक और चीज़ थी— खिड़की के काँच पर अंदर की तरफ खरोंच के निशान।

जैसे कोई बाहर से नहीं… अंदर से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो।

अब डर के साथ शक भी जुड़ गया। रोहन पिछले तीन महीने से इस शहर में छिपकर रह रहा था। किसी को उसका पता नहीं होना चाहिए था। उसने अपना नाम बदला था, नौकरी बदली थी, नंबर बदला था। क्योंकि तीन महीने पहले एक लड़की— निहारिका— अचानक गायब हो गई थी। आखिरी बार वो रोहन के साथ देखी गई थी। पुलिस ने पूछताछ की थी, लेकिन सबूत नहीं मिले।

रोहन ने कभी किसी को नहीं बताया कि उस रात क्या हुआ था।

झगड़ा हुआ था। गुस्सा बढ़ा था। धक्का लगा था। और निहारिका सीढ़ियों से गिर गई थी। वह हिल नहीं रही थी। रोहन घबरा गया था। उसने सोचा— अगर पुलिस को बताया तो सब खत्म। उसने लाश को कार में डाला और शहर छोड़ दिया।

अब, इस नए शहर में, नई पहचान के साथ, वह सब भूल जाना चाहता था।

लेकिन दीवार पर उभरे शब्द जैसे उसी की ओर इशारा कर रहे थे।

मैं अंदर आ गया हूँ।

क्या कोई उसे ब्लैकमेल कर रहा है? क्या किसी ने सब देख लिया था?

उसने पूरे कमरे की तलाशी ली। बिस्तर के नीचे, अलमारी, बाथरूम— सब खाली। दरवाज़े की चेन ज्यों की त्यों।

फिर उसकी नज़र खिड़की के बाहर पड़ी।

नीचे सड़क पर, स्ट्रीट लाइट के नीचे, मिट्टी में हल्का-सा निशान था। जैसे किसी ने भारी चीज़ घसीटी हो।

उसकी सांस अटक गई।

उसे याद आया— निहारिका की लाश भी उसने ऐसे ही घसीटी थी… कार तक।

तभी उसके फोन पर एक मैसेज आया।

Unknown Number:
तुम सोचते हो शहर बदलने से पाप छुप जाते हैं?

उसके हाथ काँपने लगे।

दूसरा मैसेज—
आज रात खिड़की खोलना। वरना अगली सुबह दीवार पर सिर्फ शब्द नहीं होंगे।

कमरे में फिर वही खरोंच की हल्की आवाज़ गूँजी।

लेकिन इस बार उसे साफ समझ आ गया—

कोई बाहर नहीं था।

कोई अंदर भी नहीं था।

कोई उसके दिमाग के भीतर था।

और शायद… उसे सब पता था।

अब डर शक में बदल चुका था। रोहन ने तय किया कि आज सब रिकॉर्ड करेगा। उसने कमरे में दो कैमरे लगा दिए— एक सीधे खिड़की की ओर, दूसरा पूरे कमरे को कवर करता हुआ। दरवाज़ा अंदर से लॉक, खिड़की पर मोटी रॉड, और मोबाइल साइलेंट पर।

2:46 से पहले ही उसकी धड़कन तेज़ थी।

और फिर—

कृररर… कृररर…

आवाज़ शुरू हो गई।

उसने जानबूझकर खिड़की की ओर नहीं देखा। पाँच मिनट तक आवाज़ चलती रही। फिर अचानक सब शांत।

सुबह उसने काँपते हाथों से फुटेज चेक की।

वीडियो में वह बिस्तर पर बैठा दिखाई दे रहा था। 2:46 पर आवाज़ शुरू हुई। वह कुछ सेकंड तक स्थिर बैठा रहा… फिर धीरे-धीरे उठा।

लेकिन उसे याद था— वह उठा ही नहीं था।

वीडियो में रोहन खिड़की के पास गया। काँच के बिल्कुल पास झुका। जैसे किसी से फुसफुसाकर बात कर रहा हो।

ऑडियो ऑन किया।

हल्की-सी आवाज़ सुनाई दी—

मैंने नहीं चाहा था… वो खुद गिर गई…

रोहन का चेहरा सफेद पड़ गया।

फुटेज में वह खुद अपने अपराध का इज़हार कर रहा था।

फिर वीडियो में वह दीवार के पास गया। कैमरे के सामने उसकी पीठ थी। हाथ दीवार पर चल रहा था। जैसे कुछ लिख रहा हो।

सुबह जो शब्द दीवार पर थे—

अब सच बाहर आएगा।

वो उसी की लिखावट थी।

रोहन का सिर घूमने लगा। क्या वह नींद में चलकर ये सब कर रहा है? या कोई उसे मानसिक रूप से तोड़ रहा है?

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।

पुलिस।

मिस्टर रोहन, हमें आपसे कुछ सवाल करने हैं।

उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

ऑफिस के एक सहकर्मी ने पुलिस को सूचना दी थी कि रोहन अक्सर रात में चिल्लाता है— मैंने नहीं मारा…

पुलिस ने उसका फोन जब्त किया।

और उसमें एक अनसेंड ड्राफ्ट मैसेज मिला—

निहारिका का एक्सीडेंट नहीं था…

रोहन कसम खा रहा था कि उसने ये नहीं लिखा।

लेकिन सबूत उसके खिलाफ खड़े थे।

पुलिस चली गई, लेकिन अब रोहन जान चुका था— मामला सिर्फ डर का नहीं है। कोई उसे मानसिक रूप से तोड़ रहा है।

उसने पूरे फ्लैट की बारीकी से जाँच शुरू की।

खिड़की के फ्रेम को हटाया— अंदर एक छोटा-सा माइक्रो स्पीकर छुपा था।

उसकी साँस रुक गई।

तो खरोंच की आवाज़… असली नहीं थी।

किसी ने जानबूझकर लगाई थी।

उसने दीवार के पीछे थपथपाया। खोखली आवाज़ आई। पैनल हटाया— अंदर एक छोटा कैमरा फिट था।

कोई उसे देख रहा था।

उसी समय उसके फोन पर कॉल आया— फिर वही Unknown।

इस बार उसने तुरंत रिसीव किया।

“कैसा लगा खेल?” दूसरी तरफ से एक महिला की ठंडी आवाज़ आई।

रोहन का दिल धड़क उठा। आवाज़ जानी-पहचानी थी।

तुम…?

हाँ, रोहन। मैं। निहारिका की बहन।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

तुम्हें लगा था वो रात बस एक हादसा थी? मैंने तुम्हें उस रात देखा था। तुमने उसे धक्का दिया था।

रोहन के हाथ काँपने लगे।

मैंने पुलिस को सीधे सबूत नहीं दिए, आवाज़ बोली। मैं चाहती थी कि तुम खुद अपने अपराध के बोझ से टूटो। खुद कबूल करो।

रोहन दीवार से टिक गया।

तो ये सब— खरोंच, संदेश, कैमरा— सब एक प्लान था।

लेकिन तभी…

फोन पर आवाज़ रुक गई।

लाइन कट गई।

और उसी क्षण—

2:46 AM.

फिर वही खरोंच की आवाज़ गूँजी।

लेकिन इस बार… स्पीकर तो उसने निकाल दिया था।

आवाज़ खिड़की से नहीं…

दीवार के अंदर से आ रही थी।

धीरे-धीरे दीवार पर अपने-आप शब्द उभरने लगे—

वो गिराई नहीं गई थी… उसे धक्का दिया गया था।

रोहन पीछे हट गया।

उसकी साँसें टूटने लगीं।

क्या सच में सब इंसानी खेल था?

या अब…

निहारिका खुद अंदर आ चुकी थी?

रोहन ने खुद अपनी आँखों से देखा था— दीवार पर शब्द अपने-आप उभर रहे थे। कोई हाथ नहीं, कोई मार्कर नहीं। सिर्फ सीलन भरी सतह… और धीरे-धीरे काले अक्षर फैलते हुए—

उसे धक्का दिया गया था।

उसका गला सूख गया। उसने तुरंत दीवार पर हाथ फेरा। पेंट गीला था, जैसे अभी-अभी किसी ने लिखा हो। लेकिन कमरे में वह अकेला था। स्पीकर वह पहले ही निकाल चुका था। कैमरा भी तोड़ दिया था।

ये सब दिमाग का खेल है… वह खुद से बुदबुदाया।

उसी वक्त फोन फिर बजा।

Unknown.

तुम डर रहे हो? दूसरी तरफ वही महिला आवाज़ थी— निहारिका की बहन।

तुमने यहाँ और क्या लगाया है? रोहन चिल्लाया।

मैंने सिर्फ शुरुआत की थी, उसने शांत स्वर में कहा। बाकी काम तुम्हारा गिल्ट कर रहा है।

रोहन के दिमाग में जैसे कुछ टूट गया। तुम मुझे पागल बनाना चाहती हो!

नहीं, जवाब आया, मैं चाहती हूँ कि तुम सच बोलो।

लाइन कट गई।

कमरे में फिर सन्नाटा।

अचानक खिड़की के बाहर किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। इस बार खरोंच नहीं— साफ कदम। रोहन धीरे-धीरे खिड़की के पास गया। नीचे गली में कोई नहीं था।

लेकिन काँच पर अंदर की तरफ धुंध जम गई थी।

और उस धुंध पर उँगलियों से लिखा गया—

रोहन

उसके हाथ काँपने लगे। उसने झटके से खिड़की खोली। बाहर सिर्फ ठंडी हवा।

वापस मुड़ा— तो दीवार पर अब पूरा वाक्य उभर चुका था—

मैंने सब देखा था।

उसके कानों में निहारिका की आखिरी चीख गूँज उठी। वह रात याद आई— बहस, गुस्सा, उसका धक्का… और निहारिका का संतुलन बिगड़ना।

वो गिरते वक्त उसकी आँखों में जो सवाल था— वही सवाल अब दीवार पूछ रही थी।

रोहन जमीन पर बैठ गया। सिर पकड़कर।

उसी क्षण दरवाज़े पर ज़ोरदार दस्तक हुई।

पुलिस।

दरवाज़ा खोलो!

उसकी सांस अटक गई। क्या निहारिका की बहन ने सबूत दे दिए?

लेकिन तभी दीवार पर आखिरी लाइन उभरी—

खुद बोलो… वरना मैं बोलूँगी।

रोहन का शरीर काँप उठा।

थाने में बैठा रोहन पसीने से तर था। पुलिस के सामने उसके खिलाफ अभी तक पक्के सबूत नहीं थे— सिर्फ शक।

आप उस रात उसके साथ थे? इंस्पेक्टर ने पूछा।

रोहन चुप।

घड़ी की टिक-टिक कमरे में गूँज रही थी।

2:45 AM.

उसे अचानक महसूस हुआ जैसे वही खरोंच की आवाज़ उसके दिमाग में चल रही हो।

कृररर… कृररर…

2:46.

थाने की दीवार पर टंगी पुरानी पेंटिंग हल्की-सी हिली। इंस्पेक्टर ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन रोहन की नज़र वहीं टिक गई।

उसे लगा जैसे पेंटिंग के पीछे से कोई देख रहा है।

उसके कानों में फुसफुसाहट आई—

अब सच बोलो…

उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

मैंने… धक्का दिया था, उसके मुँह से अचानक निकल गया।

कमरे में सन्नाटा छा गया। इंस्पेक्टर सीधा बैठ गया।

क्या कहा आपने?

रोहन की आँखों से आँसू बह निकले।

मैंने जानबूझकर नहीं… लेकिन गुस्से में धक्का दिया। वो गिर गई… मैं डर गया… मैंने लाश छुपा दी…

शब्द बाहर आते गए। जैसे कोई अंदर से मजबूर कर रहा हो।

इंस्पेक्टर ने तुरंत रिकॉर्डिंग ऑन कर दी।

कुछ ही घंटों में पुलिस को वह जगह मिल गई जहाँ रोहन ने निहारिका को दफनाया था।

जब उसे हथकड़ी लगाई जा रही थी, उसने आखिरी बार घड़ी की तरफ देखा।

2:46 AM.

इस बार कोई खरोंच की आवाज़ नहीं थी।

सिर्फ शांति।

जेल की कोठरी में बैठा वह दीवार को घूर रहा था।

धीरे-धीरे उसे लगा— दीवार पर कोई शब्द उभर रहे हैं।

वो काँप उठा।

लेकिन इस बार लिखा था—

अब मैं बाहर आ गई हूँ।

रोहन समझ गया।

निहारिका की बहन ने उसे मानसिक खेल से तोड़ा।

लेकिन शायद… सिर्फ वो नहीं थी।

क्योंकि 2:46 का समय अब भी हर रात आता था।

और हर बार उसे महसूस होता—

खिड़की बंद है।

लेकिन कोई अंदर आ चुका है।

जेल की कोठरी में पहली रात रोहन ने सोचा था कि अब सब खत्म हो गया। सच बाहर आ चुका था। निहारिका की लाश बरामद हो चुकी थी। पुलिस केस मजबूत था। अब डरने के लिए कुछ बचा नहीं था।

लेकिन रात के ठीक 2:46 बजे उसकी आँख अचानक खुल गई।

कोठरी में हल्की पीली रोशनी थी। बाहर गलियारे में पहरेदार के कदमों की आवाज़ आ रही थी। सब सामान्य।

फिर भी… उसे वही एहसास हुआ।

कृररर… कृररर…

खरोंच की आवाज़।

उसने झटके से सिर उठाया। कोठरी में कोई खिड़की नहीं थी— सिर्फ मोटी सलाखें।

आवाज़ फिर आई।

लेकिन इस बार… दीवार से नहीं।

उसके सिर के अंदर से।

वो दोनों कान बंद करके बैठ गया। नहीं… अब नहीं…

तभी सामने की दीवार पर हल्की-सी नमी उभरने लगी। जेल की पुरानी दीवारों पर सीलन आम बात थी। लेकिन यह सीलन धीरे-धीरे एक आकृति लेने लगी।

जैसे किसी ने उँगलियों से पानी में शब्द बनाए हों।

क्या अब भी सोचते हो ये खेल था?

रोहन की साँस रुक गई।

ये तुम्हारा गिल्ट है… उसने खुद से कहा।

लेकिन तभी उसके ठीक सामने, सलाखों के उस पार, उसे एक लड़की खड़ी दिखाई दी। सफेद कपड़े, बिखरे बाल। चेहरा शांत।

निहारिका।

वो कुछ नहीं बोल रही थी। बस देख रही थी।

रोहन घुटनों के बल गिर पड़ा। मैंने जानबूझकर नहीं किया… मैं डर गया था…

लड़की धीरे-धीरे मुस्कुराई।

और फिर… गायब हो गई।

उसी क्षण जेल का पहरेदार चिल्लाया, कौन बात कर रहा है अंदर?

रोहन ने सिर उठाया। आपने उसे देखा?

किसे? पहरेदार झल्लाया। “तुम अकेले हो।

रोहन हँसने लगा। हल्की, टूटी हुई हँसी।

अगले दिन निहारिका की बहन उससे मिलने आई। उसके चेहरे पर संतोष था, लेकिन आँखों में अजीब-सी थकान।

तुम जीत गई, रोहन ने खाली आवाज़ में कहा।

मैंने कुछ नहीं किया, उसने शांत स्वर में जवाब दिया। मैंने सिर्फ तुम्हें याद दिलाया कि सच छुपता नहीं।

स्पीकर… कैमरा… मैसेज?

हाँ, वो मैंने लगाया था। लेकिन दीवार पर आखिरी लाइन मैंने नहीं लिखी थी।

रोहन का दिल धड़कना बंद सा हो गया।

क्या मतलब?

वो कुछ सेकंड चुप रही।

जिस रात तुमने कबूल किया… मैं उस वक्त शहर में भी नहीं थी।

उसके शब्द हवा में ठहर गए।

रोहन की आँखें फैल गईं।

तो फिर… 2:46 पर थाने की दीवार पर जो साया हिला था…

कोठरी में जो नमी से शब्द बने…

वो कौन था?

उस रात फिर 2:46 बजे उसकी आँख खुली।

इस बार कोई आवाज़ नहीं थी।

सिर्फ गहरी शांति।

और दीवार पर धीरे-धीरे एक आखिरी वाक्य उभरा—

खिड़की बाहर नहीं थी… तुम्हारे अंदर थी।

रोहन ने आँखें बंद कर लीं।

उसे समझ आ गया— असली सज़ा जेल नहीं थी।

असली सज़ा वो बंद खिड़की थी… जो उसने अपने भीतर सालों से बंद कर रखी थी।

और अब—

वो हमेशा खुली रहेगी।

By अन्वी शब्द

मैं अन्वी हूँ। शब्द मेरे लिए सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक रहस्यमयी दुनिया के दरवाज़े हैं। मुझे उन अनकहे एहसासों को कहानी में पिरोना पसंद है जो दिल की गहराइयों में छुपे रहते हैं। मेरी कहानियों में कभी हल्की-सी मोहब्बत की खुशबू होती है, तो कभी किसी अनदेखे रहस्य की आहट। मैं चाहती हूँ कि जब आप मेरी कहानी पढ़ें, तो कुछ पल के लिए समय ठहर जाए और आप खुद को उस दुनिया का हिस्सा महसूस करें।

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