नायरा की शादी किसी सपने से कम नहीं थी। लाल जोड़े में सजी हुई वह जब मंडप में पहुँची, तो सबकी नज़रें उसी पर ठहर गईं। आर्यव ने उसका हाथ थामा और धीमे से कहा, अब से हर डर मुझसे पहले आएगा। उसकी आवाज़ में भरोसा था, और नायरा के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई। शादी की रस्में, हँसी, परिवार की खुशियाँ—सब कुछ इतना परफेक्ट था कि जैसे ज़िंदगी ने उसे अचानक किसी फिल्म का हिस्सा बना दिया हो।
पहली रात, नए घर के कमरे में हल्की-सी खुशबू थी। दीवारों पर सजे फूल और मोमबत्तियों की रोशनी माहौल को और भी खास बना रही थी। आर्यव ने उसका घूंघट हटाते हुए कहा, डर तो नहीं लग रहा? नायरा ने सिर हिलाया, नहीं… बस थोड़ा अजीब लग रहा है। दोनों देर तक बातें करते रहे और फिर थकान उन्हें नींद में ले गई।
लेकिन रात के ठीक तीन बजे, नायरा की नींद अचानक खुल गई। उसने खुद को एक अंधेरे कमरे में खड़ा पाया। सामने कोई दिखाई नहीं दे रहा था, बस एक भारी आवाज़ गूंज रही थी—
सातवें दिन सच सामने आएगा
वह चीखते हुए उठ बैठी। कमरा वही था, आर्यव उसके पास गहरी नींद में सो रहा था। उसने खुद को समझाया—शादी का तनाव है… बस एक सपना।
पर कहीं अंदर, एक अजीब-सी ठंडक उतर चुकी थी।
दूसरी रात घर में सब कुछ सामान्य था, लेकिन नायरा के मन में अजीब-सी बेचैनी थी। पूरे दिन उसे बार-बार वही सपना याद आता रहा। डाइनिंग टेबल पर बैठी उसने अचानक पूछा, आर्यव, इस घर में कोई पुराना कमरा बंद क्यों रहता है? आर्यव ने पानी का गिलास रखते हुए हल्की मुस्कान दी, ओह, वो? बस स्टोर रूम है… पुरानी बेकार की पुरानी चीज़ें पड़ी हैं। उसकी नज़रें एक पल के लिए झिझकीं, और नायरा ने वही पल पकड़ लिया।
रात को फिर वही हुआ। जैसे ही घड़ी ने तीन बजाए, उसकी सांसें भारी हो गईं। इस बार सपना और साफ़ था। वही अंधेरा कमरा… वही ठंडी हवा… लेकिन आवाज़ अब पास से आई—
गिनती शुरू हो चुकी है।
नायरा ने काँपते हुए पूछा, कौन हो तुम?
कुछ सेकंड की खामोशी… फिर फुसफुसाहट—
तुम यहाँ पहली नहीं हो।
वह हड़बड़ाकर जाग गई। माथे पर पसीना था। उसने तुरंत आर्यव को हिलाया, मुझे फिर वही सपना आया…
आर्यव ने आधी नींद में उसे बाहों में लेते हुए कहा, नायरा, बस दिमाग का खेल है। रिलैक्स।
लेकिन इस बार नायरा को यकीन नहीं हुआ। कमरे की खिड़की अपने आप हल्की-सी खुली हुई थी। परदे हिल रहे थे… और दूर कहीं घर के अंदर से दरवाज़ा बंद होने की धीमी-सी आवाज़ आई।
गिनती सच में शुरू हो चुकी थी।
तीसरे दिन नायरा ने तय कर लिया कि अब वह डरकर नहीं बैठेगी। सुबह आर्यव ऑफिस के लिए निकल गया तो घर में अजीब-सी खामोशी फैल गई। सास-ससुर किसी काम से बाहर थे। पूरा घर जैसे उसे देख रहा हो। उसकी नज़र फिर उसी बंद कमरे पर जा टिक गई। दरवाज़ा बंद था, लेकिन इस बार ताला नहीं लगा था।
दिल की धड़कन तेज़ थी। उसने धीरे से हैंडल घुमाया। कमरा धूल से भरा था, जैसे सालों से खोला न गया हो। दीवारों पर पुराने फ्रेम टंगे थे। एक कोने में ढकी हुई चीज़ पर उसकी नज़र पड़ी। उसने कपड़ा हटाया—एक फोटो फ्रेम।
तस्वीर में आर्यव था… सेहरा पहने, बिल्कुल उसी तरह जैसे उसकी शादी में। लेकिन दुल्हन कोई और थी। लड़की की मुस्कान अजीब थी, जैसे मजबूरी में खींची गई हो। तस्वीर के पीछे कुछ लिखा था—
सात दिन ही काफी थे।
नायरा के हाथ कांपने लगे। तभी पीछे से आवाज़ आई, तुम यहाँ क्या कर रही हो?
वह घबराकर मुड़ी। दरवाज़े पर आर्यव खड़ा था। उसकी आँखों में मुस्कान थी, लेकिन चेहरा सख्त।
मैं… बस यूँ ही देख रही थी, नायरा ने धीमे से कहा।
आर्यव आगे बढ़ा, तस्वीर उसके हाथ से लेकर बोला, पुरानी बातें हैं। हर घर में कुछ यादें होती हैं।
लेकिन जाते-जाते उसने दरवाज़ा फिर से लॉक कर दिया।
उस रात नायरा को पहली बार लगा—यह सिर्फ सपना नहीं… कोई सच छिपाया जा रहा है।
चौथा दिन बाहर से बिल्कुल सामान्य था, लेकिन भीतर सब कुछ बदल चुका था। आर्यव पहले से ज़्यादा ध्यान रखने लगा—हर वक्त पास, हर सवाल का जवाब तैयार। तुम ज़्यादा सोच रही हो, वह मुस्कुराकर कहता, लेकिन उसकी मुस्कान अब आँखों तक नहीं पहुँचती थी।
उस रात नायरा ने सोने का नाटक किया। घड़ी ने तीन बजाए… और इस बार सपना नहीं आया। बल्कि उसे लगा जैसे कोई उसे देख रहा है। उसने धीरे से आँखें खोलीं। कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। बाहर कॉरिडोर की हल्की पीली रोशनी अंदर आ रही थी।
फिर वही फुसफुसाहट—
छह…
उसका दिल ज़ोर से धड़का।
वह उठी और चुपचाप दरवाज़े तक गई। कॉरिडोर खाली था। लेकिन नीचे हॉल से धीमी आवाज़ें आ रही थीं। जैसे कोई वीडियो चल रहा हो।
सीढ़ियों से उतरते हुए उसने देखा—टीवी ऑन था। स्क्रीन पर शादी का मंडप दिखाई दे रहा था। दूल्हा… आर्यव। दुल्हन… वही लड़की जो तस्वीर में थी।
नायरा की साँस रुक गई।
अचानक पीछे से आर्यव की आवाज़ आई—
तुम्हें सो जाना चाहिए था।
वह मुड़ी। उसकी आँखों में अब मुस्कान नहीं थी।
टीवी स्क्रीन अपने आप बंद हो गई।
आर्यव ने धीरे से कहा, कल छठा दिन है… और उसके बाद सब आसान हो जाएगा।
नायरा को पहली बार समझ आया—
वो गिनती सिर्फ़ सपनों में नहीं चल रही थी।
घर के भीतर भी कोई दिन गिन रहा था।
छठे दिन सुबह घर में अजीब-सी शांति थी। नायरा ने नोटिस किया—आज कोई उसे अकेला नहीं छोड़ रहा था। सास उसकी पसंद का नाश्ता बना रही थीं, आर्यव हर कुछ मिनट में पूछ रहा था, तुम ठीक हो ना? लेकिन उस देखभाल में गर्माहट कम, निगरानी ज़्यादा थी।
दिन भर उसके दिमाग में वही शब्द गूंजते रहे— छह…
शाम होते-होते उसने फैसला कर लिया। अगर सच सामने आना है, तो वो उसका इंतज़ार नहीं करेगी—वो उसे ढूँढेगी।
रात को जब सब सो गए, नायरा धीरे से उठी। उसने देखा, आर्यव गहरी नींद में था… या शायद सोने का नाटक कर रहा था। वह चुपचाप कमरे से निकली और नीचे उसी बंद कमरे के सामने खड़ी हो गई।
इस बार ताला नहीं था।
दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुल गया।
अंदर वही पुरानी वेडिंग ड्रेस टंगी थी। लेकिन इस बार उसने ध्यान से देखा—ड्रेस पर हल्के भूरे धब्बे थे। जैसे किसी ने खून धोने की कोशिश की हो। एक कोने में कैमरा रखा था।
काँपते हाथों से उसने कैमरा ऑन किया।
वीडियो चल पड़ा।
पहली क्लिप—वही लड़की। सातवें दिन की रात। वो रो रही थी। आर्यव उसे पकड़कर किसी को सौंप रहा था। कैमरा हिलता है… फिर अंधेरा।
दूसरी क्लिप—दूसरी दुल्हन।
तीसरी… चौथी…
हर वीडियो के आखिर में एक ही लाइन—
Memory Reset Complete.
नायरा की सांस रुक गई।
तो ये हत्या नहीं थी।
कुछ और था।
अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई।
आर्यव अंदर खड़ा था।
तुम्हें ये नहीं देखना चाहिए था, उसने ठंडी आवाज़ में कहा।
अब सातवीं रात आ चुकी थी। और नायरा अब डर नहीं रही थी। उसके भीतर एक अजीब-सी स्पष्टता थी।
आर्यव ने धीरे से कहा, अब समय हो गया है।
वह उसे उसी कमरे में ले गया। कमरे के बीच एक कुर्सी थी। मेडिकल उपकरण, सिर पर लगाने वाली मशीन, स्क्रीन पर चमकती लाइट्स।
ये सब क्या है? नायरा ने शांत स्वर में पूछा।
थेरेपी, आर्यव बोला। तुम्हारी यादें मिटा दी जाएंगी। तुम सब भूल जाओगी। और नई शुरुआत करोगी। जैसे बाकी सबने की।
बाकी सब?
हाँ। वो लड़कियाँ अब ज़िंदा हैं। बस… उन्हें ये सात दिन याद नहीं।
नायरा हँस दी।
आर्यव चौंका। क्या मज़ाक है?
तुम्हें लगता है मैं पहली बार यहाँ बैठ रही हूँ? उसने कुर्सी पर खुद बैठते हुए कहा।
आर्यव का चेहरा सख्त हो गया।
नायरा ने धीमे से कहा, ये experiment मेरा था, आर्यव। मैं देखना चाहती थी—कितनी बार इंसान सच भूल सकता है। लेकिन तुमने सीमा पार कर दी। तुमने इसे खेल बना दिया।
आर्यव पीछे हट गया।
तुम… mastermind हो?
नायरा मुस्कुराई। सातवें दिन सच सामने आता है। लेकिन किसके लिए—ये तुमने कभी नहीं पूछा।
तभी दरवाज़ा खुला। पुलिस अंदर घुस आई।
आर्यव स्तब्ध खड़ा था।
नायरा उठी।
Memory Reset अब तुम्हारे लिए होगा, उसने धीमे से कहा।
कैमरा स्क्रीन पर चमका।
और इस बार—दूल्हा गायब था।
पुलिस आर्यव को ले जा चुकी थी, लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई। सातवें दिन की सुबह नायरा उसी घर में अकेली बैठी थी। खिड़की से आती धूप अब डरावनी नहीं लग रही थी—बल्कि सच्चाई जैसी साफ़ थी।
उसने लैपटॉप खोला। सामने वही फोल्डर—Memory Reset Files।
हर वीडियो, हर रिकॉर्डिंग, हर सात दिन का खेल… सब उसकी प्लानिंग का हिस्सा था।
लेकिन एक फाइल ऐसी थी जो उसने कभी नहीं खोली थी—
Day 0 – Original.
काँपते हाथों से उसने उसे क्लिक किया।
स्क्रीन पर वो खुद थी। सात साल पहले। एक लैब में। उसके साथ खड़ा था—आर्यव। दोनों मुस्कुरा रहे थे।
अगर इंसान अपने दर्द को भूल सके, तो क्या वो बेहतर इंसान बन जाएगा? वीडियो में नायरा पूछ रही थी।
आर्यव ने जवाब दिया था, या फिर वो बिना पछतावे के कुछ भी कर पाएगा।
नायरा की आँखें नम हो गईं।
उसे याद आया—ये प्रयोग प्यार से शुरू हुआ था। दोनों न्यूरोसाइंस रिसर्चर थे। शुरुआत में उन्होंने मरीजों की ट्रॉमा थेरेपी की। फिर धीरे-धीरे सीमा धुंधली हो गई।
आर्यव को भूलने की ताकत पसंद आने लगी। और नायरा को सच याद रखने की ज़िद।
सातवें दिन उसने फैसला किया था—ये खेल यहीं खत्म होगा।
उसने सारे डेटा पुलिस सर्वर पर अपलोड कर दिए। लैपटॉप बंद किया।
फोन पर आख़िरी नोटिफिकेशन आया—
Memory Reset – System Disabled.
नायरा मुस्कुराई।
इस बार सात दिन पूरे हुए थे।
लेकिन कोई गायब नहीं हुआ।
सिर्फ़ एक झूठ खत्म हुआ था।
और गिनती… हमेशा के लिए रुक गई।

