शादी करना किसी के लिए धूम-धाम मचाना होता है तो कही किसी के लिए शांति और परिवार के बीच करना होता है… और अगर शादी की बात करे तो इससे बड़ा त्यौहार कोई है ही नहीं… छोटी छोटी तैयारिया भी दिमाग धूमा देती है और बड़ी तैयारिया तो बड़ा हिस्सा होती ही है… दुल्हा दुल्हन का तो मानों आखरी दिन तक बैंड़ बज जाता है… और इन्ही धूम- धाम के बीच एक शादी की कहानी मैं आपको बताने वाली हूँ.
शादी का उत्सव खत्म हुआ और दुल्हन अपने कमरे में एकदम अकेली थी। महमानों के चले जाने के बाद पहली रात का ये सन्नाटा पूरे घर में फैला हुआ था। कमरे की हल्की रोशनी में वह अपने हाथों में डायरी लिए बैठी थी। यह डायरी उसने कभी देखी नहीं थी, पर अचानक उसे खींचने जैसा कुछ हुआ। जैसे ही उसने पन्ने पलटे, वहां लिखी कुछ लाइनें उसे चौंका गईं—पहली रात में सच सामने आएगा। वह नहीं जान पाई कि यह किसकी डायरी है, और किसका सच सामने आएगा, पर हर शब्द उसके दिल को धड़काने लगा। उसके मन में डर और उत्सुकता का अजीब सा मिश्रण हुआ था। बाहर हल्की हवा की सरसराहट और कमरे के कोने में अंधेरे की छाया उसे और रहस्यमय लग रही थी। उसकी आँखें हर पन्ने पर टिक गईं और अचानक उसे ऐसा लगा जैसे किसी की नजरें उस पर हों। पहली रात की मासूमियत और अजीब डर की गूंज उसके दिल में समा गई।
दूसरे दिन दुल्हन का डर कम होने के बजाय और गहरा हो गया। रात की अधूरी नींद और मन में उठते सवालों ने उसके दिमाग को जैसे जकड़ लिया था। वह अपने पति के पास ही बैठी थी, उसकी बातों पर हल्की मुस्कान भी दे रही थी, लेकिन भीतर कहीं एक अनजानी बेचैनी घर कर चुकी थी। उसे लगने लगा था कि हर सामान्य सी बात के पीछे कोई छुपा अर्थ है, हर मुस्कान के पीछे कोई राज़ दबा हुआ है।
डायरी के पन्नों में लिखे शब्द बार-बार उसके मन में गूंजते—“सावधान रहो… सच सामने आएगा…”। ये शब्द अब उसके विचारों का हिस्सा बन चुके थे। वह घर के हर सदस्य को नए नज़रिए से देखने लगी। किसी की धीमी फुसफुसाहट, किसी की अचानक चुप्पी—सब उसे अपने खिलाफ साज़िश जैसे लगते।
रात होते-होते उसका डर और बढ़ जाता। कमरे की हल्की खटखटाहट, खिड़की से आती हवा की आवाज़, दीवारों पर हिलती परछाइयाँ—सब मिलकर माहौल को रहस्यमय बना देतीं। उसे लगता जैसे अंधेरा उसे घूर रहा हो। फिर भी, जब उसका पति उसकी तरफ प्यार से देखता, उसकी आँखों में सच्चाई की एक हल्की चमक दिखती, तो उसके मन को थोड़ी राहत मिलती।
लेकिन असली वजह सिर्फ शक नहीं थी—वह इस घर में बिल्कुल नई थी। हर चेहरा उसके लिए अजनबी था, हर आवाज़ अनपहचानी। वह किसी के स्वभाव, किसी की आदतों से परिचित नहीं थी। यही अनजानपन उसके डर को और गहरा बना रहा था। प्यार और भय के बीच झूलती वह खुद से पूछ रही थी—क्या ये सब सिर्फ उसका भ्रम है, या सच में कुछ ऐसा है जो सामने आने का इंतज़ार कर रहा है?
तीसरे दिन दुल्हन ने महसूस किया कि उसके पति के व्यवहार में कुछ बदल गया है। पहले तो वह प्यार से बात करता था, पर अब उसकी निगाहें अक्सर टेढ़ी-मेढ़ी लगने लगी थीं। दुल्हन का दिल अजीब तरह से बैठता था—हर छोटी बात पर उसका मन शक करने लगता। और सबसे अजीब बात यह थी कि पति का सबसे भरोसेमंद दोस्त भी हर समय उनके आसपास ही घूमता रहता। कभी अचानक कमरे में आकर चुपचाप कुछ नोटिस करता, कभी मुस्कुराकर अनदेखा कर देता। दुल्हन को यह सब बातें बेहद संदिग्ध लगीं। डायरी में लिखी हर चेतावनी उसके दिमाग में बार-बार बज रही थी। उसने खुद को समझाया कि शायद उसका डर ज्यादा है, लेकिन मन में शंका लगातार बढ़ रही थी। उसे ऐसा लगने लगा जैसे उसके चारों तरफ कोई खेल खेल रहा हो, और वह हर पल उसकी हरकतों का निरीक्षण कर रहा हो। रात होते-होते डर और बेचैनी उसके दिल में जगह बना चुके थे। और वह जान चुकी थी—अब कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।
छठी रात आ चुकी थी, और दुल्हन अब पूरी तरह टूटने की कगार पर थी। पिछले पाँच दिनों से डर, बेचैनी और पति की रहस्यमयी हरकतों ने उसके मन को जैसे जकड़ लिया था। जो हाथ कभी उसे सहारा देते थे, अब उन्हीं में उसे कोई अनजाना साया महसूस होता था। कमरे की घड़ी की टिक-टिक उसकी धड़कनों के साथ ताल मिला रही थी, और हर बीतता सेकंड उसे सातवीं रात के और करीब ले जा रहा था।
काँपते हाथों से उसने अपनी डायरी खोली। हर पन्ने पर लिखे शब्द उसके भीतर के द्वंद्व का आईना थे—प्यार भी था, शक भी… भरोसा भी था, और एक गहरा डर भी। उसे याद आया कि उसने खुद से वादा किया था—सात दिन, बस सात दिन। आँसू उसकी पलकों से फिसलकर कागज़ पर गिरने लगे, स्याही थोड़ी धुंधली हो गई, जैसे उसकी ज़िंदगी की सच्चाई भी धुंध में खो रही हो।
अचानक खिड़की से आई ठंडी हवा ने कमरे की खामोशी तोड़ दी। परदों की परछाइयाँ दीवारों पर नाचने लगीं। वह ज़मीन पर बैठ गई, पर इस बार उसकी आँखों में सिर्फ डर नहीं था—एक अजीब सा संकल्प भी था। उसने तय कर लिया, अब भागेगी नहीं। जो सच है, उसे सामने लाएगी।और ये तमाशा हमेशा के लिए बंद कर देेगी, छठी रात ने उसे तोड़ा भी था, लेकिन उसी ने उसे सातवीं रात के सच का सामना करने के लिए मजबूत भी बना दिया था।
सातवीं रात का सन्नाटा पूरे घर पर चादर की तरह फैला हुआ था। घड़ी की धीमी टिक-टिक और खिड़की से आती ठंडी हवा उस खामोशी को और गहरा बना रही थी। दुल्हन जमीन पर बैठी थी, हाथ में अपनी डायरी थामे—चेहरा शांत, लेकिन आँखों में अडिग दृढ़ता। कमरे में जलती हल्की लाल रोशनी दीवारों पर अजीब परछाइयाँ बना रही थी, जैसे अंधेरा खुद उसके इर्द-गिर्द घूम रहा हो।
अचानक पीछे हलचल हुई। एक साया दरवाज़े के पास हिला—भय का संकेत, जैसे मौत धीरे-धीरे आगे कदम रख रही हो। उसका दिल तेज़ धड़कने लगा, मगर इस बार डर ने नहीं, हिम्मत ने उसकी धड़कनों को दिशा दी थी। तभी उसके पति और उसका दोस्त कमरे में दाखिल हुए। दोनों के चेहरे पर तनाव था, पर दुल्हन अब सब समझ चुकी थी। पिछले छह दिनों की हर छोटी-बड़ी बात, हर झूठ, हर अजीब हरकत उसकी डायरी के पन्नों में दर्ज थी।
तभी फर्श पर खून की एक बूंद गिरी। सन्नाटा और गहरा हो गया। सच सामने था—उसका पति नहीं, बल्कि उसका दोस्त ही इस पूरे डर और रहस्य का असली सूत्रधार था। वह शादी के बहाने दुल्हन को मानसिक रूप से तोड़ना चाहता था और शक की दीवार खड़ी कर पति को फँसाना चाहता था।
लेकिन दुल्हन ने समझदारी से पूरा खेल पलट दिया। अपनी सूझबूझ और हिम्मत से उसने उसे बेनकाब कर दिया। सातवीं रात का अंधेरा अब सच की रोशनी में बदल चुका था। डर खत्म हो चुका था। अब वहाँ सिर्फ एक मजबूत, आत्मविश्वासी स्त्री खड़ी थी—जो सच के साथ थी और अपने फैसले खुद लेने को तैयार थी।
मैं अन्वी हूँ। शब्द मेरे लिए सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक रहस्यमयी दुनिया के दरवाज़े हैं। मुझे उन अनकहे एहसासों को कहानी में पिरोना पसंद है जो दिल की गहराइयों में छुपे रहते हैं। मेरी कहानियों में कभी हल्की-सी मोहब्बत की खुशबू होती है, तो कभी किसी अनदेखे रहस्य की आहट। मैं चाहती हूँ कि जब आप मेरी कहानी पढ़ें, तो कुछ पल के लिए समय ठहर जाए और आप खुद को उस दुनिया का हिस्सा महसूस करें।