शहर में ये बात धीरे-धीरे नहीं, अचानक फैली थी—जो भी रातों-रात viral होता है, कुछ ही दिनों में गायब हो जाता है। पहले लोग इसे इत्तेफ़ाक समझते रहे। कोई influencer था, कोई local singer, कोई street artist—सबका एक सा ही pattern था। एक वीडियो, लाखों views, खबरों में नाम, और फिर… चुप्पी। सोशल मीडिया से अकाउंट गायब, फोन बंद, और परिवार के पास कोई जवाब नहीं। पुलिस हर बार यही कहती रही कि मामला voluntary disappearance का है। लेकिन जब तीसरा मामला एक ही महीने में हुआ, तब शक ने आकार लेना शुरू किया।
मैं ये सब तब समझने लगा जब मेरी बनाई एक short documentary अचानक viral हो गई। वीडियो में कोई सनसनी नहीं थी—बस शहर के पुराने flyover के नीचे रहने वाले लोगों की ज़िंदगी दिखाई गई थी। लेकिन views जिस रफ्तार से बढ़े, उसने मुझे भी चौंका दिया। दो दिन में लाखों लोग, अनजान नंबरों से कॉल, और कुछ ऐसे messages जिनमें तारीफ़ से ज़्यादा निगरानी महसूस हो रही थी। उसी रात मुझे पहली बार एहसास हुआ कि viral होना सिर्फ़ पहचान नहीं, खतरा भी हो सकता है।
अगले दिन मुझे एक ई-mail मिला, बिना किसी नाम के। उसमें सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—“अब तुम दिखने लगे हो।” उस पल मुझे समझ आया कि viral होना यहाँ मशहूर होना नहीं, चिन्हित होना है। जब मैंने पीछे मुड़कर उन लोगों की लिस्ट देखी जो पहले गायब हुए थे, तो एक बात साफ़ थी—सबने किसी न किसी सच को अनजाने में उजागर किया था। कोई सिस्टम की गंदगी, कोई गलत लेन-देन, कोई ऐसी चीज़ जो दिखनी नहीं चाहिए थी।
रात होते-होते मेरा वीडियो हर प्लेटफॉर्म से अपने-आप हटने लगा। अकाउंट suspend हो गया, और उसी के साथ मेरे घर के बाहर एक अनजान गाड़ी घंटों खड़ी रहने लगी। तभी मुझे समझ आया—जो भी viral होता है, वो बस गायब नहीं होता… उसे हटाया जाता है। और अब अगला नाम शायद मेरा था।
अगली सुबह मैं गायब नहीं हुआ था, लेकिन शहर में मेरे नाम की मौजूदगी कम होने लगी थी। मेरा वीडियो किसी भी प्लेटफॉर्म पर अब नहीं था, जैसे वो कभी बना ही नहीं। जिन लोगों ने शेयर किया था, उनके अकाउंट पर भी वही चेतावनी दिख रही थी—content violation। अजीब बात ये थी कि violation क्या था, ये किसी को नहीं बताया गया। उसी दिन मुझे समझ आ गया कि ये सोशल मीडिया का काम नहीं था, ये उससे कहीं ऊपर का सिस्टम था।
मैंने उन तीन लोगों की फाइलें फिर से निकालीं जो मुझसे पहले viral होकर गायब हुए थे। पहली एक लड़की थी जिसने एक सरकारी अस्पताल की हालत दिखाते हुए वीडियो डाला था। दूसरा एक singer था, जिसने एक political rally में अचानक कुछ ऐसा बोल दिया था जो script में नहीं था। तीसरा एक delivery boy, जिसने अपने helmet कैमरे से एक accident रिकॉर्ड किया था—जिसमें accident से ज़्यादा cover-up दिख रहा था। तीनों अलग थे, लेकिन तीनों ने कुछ ऐसा दिखा दिया था जो नहीं दिखना चाहिए था।
अब मुझे pattern साफ़ दिखने लगा था। Viral होना असल में एक अलार्म था—सिस्टम के लिए। जैसे ही कोई वीडियो तय सीमा से ज़्यादा फैलता, वो इंसान रिस्क बन जाता। पहले उसका content हटाया जाता, फिर उसकी online पहचान, और आखिर में… उसका physical existence। लोग गायब नहीं होते थे,बल्कि उन्हें step by step erase किया जाता था।
शाम को मुझे एक कॉल आया। नंबर private था, आवाज़ शांत और बिल्कुल भावहीन। उस आवाज़ ने कोई धमकी नहीं दी, बस इतना कहा कि मेरा video “गलत जगह पहुँच गया था” और अगर मैं चाहता हूँ कि ज़िंदगी सामान्य रहे, तो मुझे आगे कुछ भी record नहीं करना चाहिए। उस कॉल के बाद पहली बार मुझे डर नहीं लगा—मुझे बहुत गुस्सा आया। क्योंकि अब ये साफ़ था कि ये सब accident नहीं, एक सोची समझी साजिश है।
रात को जब मैंने अपने घर की balcony से नीचे देखा, वही अनजान गाड़ी फिर खड़ी थी। फर्क बस इतना था कि अब मैं जानता था—अगर मैं चुप रहा, तो मैं बच सकता हूँ। और अगर मैंने कुछ और रिकॉर्ड किया, तो मैं viral नहीं होऊँगा… मैं गायब हो जाऊँगा।
मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं अकेला नहीं हूँ, जब एक पुराना नाम अचानक ज़िंदा होकर मेरे सामने आया। वो delivery boy, जिसे सब लोग गायब मान चुके थे, उसकी एक तस्वीर मुझे एक encrypted mail में मिली। तस्वीर नई थी। उसका चेहरा बदला हुआ था, बाल छोटे, आँखों में डर नहीं बल्कि थकान थी। साथ में सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—हम मरे नहीं हैं, हमें छुपा दिया गया है।
अब तस्वीर साफ़ होने लगी थी। ये लोग मारे नहीं जाते थे, इन्हें हटाया जाता था। एक ऐसे सिस्टम के ज़रिए जो viral data को खतरे की तरह देखता था। जो भी वीडियो बहुत तेज़ी से फैलता, वो सिर्फ़ content नहीं रहता, वो evidence बन जाता। और evidence को या तो मिटाया जाता है, या control में रखा जाता है। इन लोगों को नए नाम, नई जगह, और एक सख़्त चेतावनी दी जाती थी—अगर दोबारा दिखे, तो अगली बार मौका नहीं मिलेगा।
मुझे पता चला कि इस पूरे खेल के पीछे कोई shadowy mafia नहीं, बल्कि एक legal-looking private organization था, जो government और tech companies के बीच “damage control” का काम करता था। उनका काम था—viral होने से पहले सच को रोकना, और viral हो जाने के बाद सच बोलने वाले को। काग़ज़ों में वो लोग consultants थे, असलियत में censor।
अब मुझे ये भी समझ आ गया कि मेरी documentary सिर्फ़ एक शुरुआत थी। असली वजह ये थी कि मैंने गलती से एक ऐसे इलाके को रिकॉर्ड कर लिया था, जहाँ एक बड़ा project काग़ज़ों में पूरा हो चुका था, लेकिन ज़मीन पर कभी बना ही नहीं। पैसा जा चुका था, और वीडियो ने उस झूठ को दिखा दिया था।
उस रात पहली बार मुझे ये डर लगा कि शायद मैं बच नहीं पाऊँगा। क्योंकि अब मैं सिर्फ़ viral नहीं था—मैं जानता था। और इस सिस्टम में जानने वालों के लिए दो ही रास्ते होते हैं—या तो चुप्पी, या गायब हो जाना।
और सबसे खतरनाक बात ये थी कि अगला मेल साफ़ तौर पर मेरे नाम से लिखा था, लेकिन भेजा मैंने नहीं था।उस मेल के बाद मैंने एक फैसला किया—अगर सिस्टम मुझे देख रहा है, तो मैं भी उसे कुछ दिखाऊँगा। मैंने जानबूझकर एक छोटा सा वीडियो अपलोड किया, बिल्कुल harmless, ऐसा जिसे देखकर लगे कि मैं डर गया हूँ और अब कुछ भी सच दिखाने की हिम्मत नहीं रखता। वीडियो वायरल नहीं हुआ, लेकिन उसका असर तुरंत दिखा। वही अनजान गाड़ी फिर दिखाई दी, इस बार ज़्यादा पास,और ज़्यादा देर तक।
उसी रात मुझे एक दूसरा मेल मिला, पहले से अलग,और ज़्यादा सीधा। उसमें चेतावनी नहीं थी, बल्कि निर्देश थे—कहाँ जाना है, कब जाना है, और किससे मिलना है। अब ये साफ़ हो चुका था कि वो मुझे हटाना नहीं, पहले परखना चाहते हैं। अगर मैं उनके नियम मान लेता, तो शायद मैं भी उन्हीं लोगों की तरह सुरक्षित हो जाता जो दुनिया से गायब कर दिए गए थे। लेकिन यह जाल था और पहली बार, मैंने उसमें जानबूझकर पैर रखा।
बताई गई जगह शहर के बाहर थी—एक अधूरा सा ऑफिस, न नाम, न बोर्ड। अंदर सब कुछ ज़रूरत से ज़्यादा शांत था। मुझे समझाया गया कि ये कोई सज़ा नहीं, बल्कि सुरक्षा है। जो लोग सच दिखा देते हैं, उन्हें मिटाया नहीं जाता, बस हटा दिया जाता है। नई पहचान, नई जगह, और एक शर्त—कभी दोबारा कुछ रिकॉर्ड नहीं करना।
मुझे उन लोगों की लिस्ट दिखाई गई जो “सुरक्षित” थे। वही नाम, वही चेहरे, जिन्हें दुनिया गायब मान चुकी थी। अब साफ़ था कि ये सिस्टम डर से नहीं, सहमति से चलता है। अगर मैं हाँ कह देता, तो ज़िंदा रह सकता था, लेकिन बिना आवाज़ के। बाहर निकलते समय मुझे एहसास हुआ कि असली खतरा मरना नहीं है, बल्कि इस तरह ज़िंदा रहना है जहाँ कोई आपको पहचान ही न सके।और तभी मुझे समझ आया—यहाँ से कोई वापस नहीं जाता।
उस जगह से निकलने के बाद मुझे पहली बार यक़ीन हो गया कि अगर मैं चुप रहा, तो ज़िंदा रहूँगा—लेकिन वो ज़िंदगी मेरी नहीं होगी। उसी रात मैंने अपना फ़ैसला कर लिया। मैंने कोई बड़ा खुलासा नहीं किया, कोई सीधा आरोप नहीं लगाया। मैंने बस एक आख़िरी रिकॉर्डिंग की, जिसमें दिखाया कि कैसे viral होने के बाद एक इंसान धीरे-धीरे ऑनलाइन और ऑफ़लाइन मिटा दिया जाता है। न नाम लिया, न संस्था का ज़िक्र किया—सिर्फ़ प्रक्रिया।
मैं जानता था कि ये वीडियो ज़्यादा देर नहीं टिकेगा। लेकिन मुझे ये भी पता था कि उसे हटाने से पहले कोई न कोई उसे देखेगा। और कभी-कभी, एक देखने वाला भी काफ़ी होता है। वीडियो अपलोड करने के बाद मैंने पहली बार चैन की साँस ली। अब जो होगा, वो मेरे कंट्रोल में नहीं था। और शायद यही सबसे खतरनाक बात थी।
वीडियो ज़्यादा देर नहीं रहा, लेकिन जितनी देर रहा, उतना काफ़ी था। अगली सुबह मेरे सारे accounts बंद थे, फोन silent था, और घर के बाहर वही गाड़ी अब छुपी नहीं थी। इस बार कोई warning नहीं आई, कोई मेल नहीं—सीधा action था। मुझे समझ आ गया कि मैंने उनकी सबसे बड़ी लाइन cross कर ली थी: प्रक्रिया को उजागर करना। सच नहीं, तरीका। क्योंकि सच से बहस की जा सकती है, लेकिन तरीके से नहीं।
दोपहर तक मेरे नाम से एक official statement घूमने लगी—जिसमें लिखा था कि मैं मानसिक रूप से अस्थिर हूँ और इलाज के लिए शहर छोड़ रहा हूँ। वही पुराना template, वही “safe disappearance”। फर्क बस इतना था कि इस बार मैं जानता था। और जब कोई जानने लगे, तो सिस्टम उसे बचाता नहीं—उसे जल्दी हटाता है। शाम होते-होते मुझे आख़िरी संदेश मिला: अब दिखना बंद करो और तभी मुझे यक़ीन हो गया—अब अंत करीब है।
अगली सुबह मैं कहीं नहीं गया। न शहर छोड़ा, न छुपा। मैंने बस एक काम किया—खुद को live छोड़ दिया। मैंने एक public जगह चुनी, कैमरा नहीं, बस मौजूदगी। क्योंकि सिस्टम viral कंटेंट से नहीं डरता, वो किसी की नज़र में आने से डरता है। जहाँ बहुत लोग देख रहे हों, वहाँ से मुझे हटाना मुश्किल होता।
मेरे खिलाफ़ जो बयान जारी किया गया था, वही मेरी ढाल बन गया। लोग सवाल पूछने लगे। अचानक गायब करना अब जोखिम बन चुका था। सिस्टम ने पीछे हटना ही सही चुना—शोर से नहीं, चुप्पी से। कोई कार्रवाई नहीं, कोई मेल नहीं, कोई गाड़ी नहीं।
तभी मुझे समझ आया—जो viral होता है, उसे इसलिए गायब किया जाता है क्योंकि वो अकेला होता है।
और जो अकेला नहीं रहता वो बच जाता है जैस मै, जिन लोगो के बीच मै वायरल हुआ उन्होने ही मुझे बचाया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि बस गायब होना रुक गया और मुझे ये भी साफ हो गया कि जिस भी विडीयो या इंसान से SYSTEM की पोल खुलती उन्हे ही वो गयब कर देता ताकि उनके कारनामे जनता की नज़रो में न आ सके।