जिस दिन उसने ‘I Love You’ कहा, उसी दिन मैं ग़ायब हो गया

उस दिन सब कुछ बिल्कुल सामान्य था, इतना सामान्य कि मुझे याद भी नहीं रहता अगर वही दिन मेरी ज़िंदगी का आख़िरी साधारण दिन न बन गया होता। शहर अपनी रोज़मर्रा की आवाज़ों में डूबा हुआ था, लोग अपने-अपने कामों में उलझे थे, और मैं भी उन्हीं में से एक था—ज़िंदा, मौजूद, पहचान वाला। लेकिन जैसे ही उसने वो तीन शब्द कहे, कुछ ऐसा टूटा जो दिखाई नहीं देता, पर महसूस होता है। ऐसा लगा जैसे मेरे अंदर से किसी ने चुपचाप कुंडी खोल दी हो और मैं अपने ही शरीर से बाहर खिसकने लगा हूँ। हवा भारी हो गई, सांस लेना आसान था पर सांस मेरी नहीं लग रही थी। उस पल मुझे कोई डर नहीं लगा, बल्कि एक अजीब सी राहत ने घेर लिया, जैसे किसी लंबे बोझ से आज़ादी मिल रही हो। दुनिया वही थी, रंग वही थे, लेकिन सब कुछ मुझसे थोड़ा दूर खिसक गया था। लोग चल रहे थे, समय आगे बढ़ रहा था, पर मैं उस प्रवाह से कट चुका था।

उसके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी, बल्कि एक सुकून था—जैसे उसने वही कहा हो जिसका इंतज़ार बहुत पहले से था। मुझे तब समझ नहीं आया कि प्यार हमेशा जोड़ने नहीं आता, कभी-कभी वो अलग करने भी आता है। उस पल के बाद मेरा शरीर वहीं था, पर मैं उसमें पूरा नहीं था। जैसे किसी ने मेरी आत्मा को धीमे से खींच कर आधा बाहर निकाल लिया हो और बाक़ी आधा वहीं छोड़ दिया हो ताकि किसी को शक न हो। मुझे लगा ये एहसास कुछ देर का होगा, लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, मेरी मौजूदगी हल्की होती चली गई।

मैं अब दिख तो रहा था, पर दर्ज नहीं हो रहा था। जैसे मैं इस दुनिया का हिस्सा होते हुए भी इसकी सूची से कट चुका था। और सबसे डरावनी बात ये नहीं थी कि मैं ग़ायब हो रहा था, बल्कि ये थी कि जिसने मुझे इस हाल में पहुँचाया था, वो मुझे खोने का शोक नहीं मना रही थी। उसके लिए ये कोई हादसा नहीं था, बल्कि एक तयशुदा मंज़िल थी।

और मुझे तब पहली बार एहसास हुआ— जिस दिन उसने ‘I love you’ कहा, उसी दिन मैं ग़ायब नहीं हुआ…
उसी दिन मुझे आज़ाद किया गया था। अगली सुबह जब आँख खुली, तो एहसास सबसे पहले यही हुआ कि नींद पूरी हुई है, लेकिन मैं पूरा नहीं हूँ। शरीर बिस्तर पर था, सांसें चल रही थीं, दिल की धड़कन भी वैसी ही थी, मगर उन सबके बीच मैं खुद को किसी दर्शक की तरह महसूस कर रहा था। जैसे ये शरीर मेरा है, पर मेरा नहीं रहा। मैं उठता हूँ, चलता हूँ, रोज़मर्रा के काम करता हूँ, लेकिन हर हरकत में एक हल्की सी देरी है, जैसे मैं अपने ही कदमों के पीछे चल रहा हूँ। आईने में जो चेहरा दिखता है, वो जाना-पहचाना है, लेकिन उसमें वो अपनापन नहीं है। आँखों में देखता हूँ तो लगता है जैसे कोई और अंदर से झांक रहा हो और मैं बाहर खड़ा उसे देख रहा हूँ।

दिन के उजाले में सब कुछ सामान्य दिखता है, मगर हर रोशनी के साथ मेरी परछाईं थोड़ी और गहरी होती जा रही है। कभी-कभी लगता है परछाईं मेरी नकल नहीं कर रही, बल्कि मैं उसकी नकल कर रहा हूँ। मैं जहाँ जाता हूँ, वो मुझसे एक क़दम आगे होती है, जैसे रास्ता वही तय कर रही हो। लोगों से मिलते वक़्त वो मुझसे बात कर रहे होते हैं, पर जवाब किसी और की तरफ़ से जाता है। मेरी आवाज़ मेरे कानों तक लौटती है, लेकिन उसमें मेरा वजन नहीं होता। अब मै अपने ही शरीर में एक मेहमान हूँ, और मेरी परछाईं—मालिक बनने की तैयारी कर रही है।

अब मुझे यक़ीन होने लगा था कि जो कुछ भी मेरे साथ हो रहा है, वो अचानक नहीं है। उसमें एक अजीब सी योजना छुपी हुई है, और उस योजना का केंद्र वही है। जब मैं उसके आसपास होता हूँ, तो मेरी बेचैनी कम होने के बजाय और साफ़ हो जाती है, जैसे कोई बीमारी सही नाम मिलने के बाद और तीखी महसूस होने लगती है। मुझे धीरे-धीरे समझ आने लगता है कि वो मेरी हालत को देख नहीं रही, बल्कि माप रही है। जैसे कोई डॉक्टर बीमारी की प्रगति देखता है, वैसे ही वो मेरी मौजूदगी के घटने-बढ़ने को महसूस कर रही है। जब मेरी परछाईं ज़्यादा गहरी होती है, उसके चेहरे पर सुकून होता है। जब मैं थोड़ी देर के लिए खुद को ज़्यादा महसूस करता हूँ, तो उसके आसपास की हवा बदल जाती है। ऐसा लगता है कि मेरे होने या न होने से कहीं ज़्यादा कुछ दांव पर लगा है।

मुझे एहसास होता है कि वो मुझे खोने से नहीं डर रही, बल्कि उस पल का इंतज़ार कर रही है जब मैं पूरी तरह से दो हिस्सों में बंट जाऊँगा। अब ये साफ़ हो चुका है कि उसने ‘I love you’ यूँ ही नहीं कहा था। वो शब्द किसी एहसास का इज़हार नहीं थे, बल्कि एक क्रिया की शुरुआत थे। और मैं सिर्फ़ उसका असर नहीं झेल रहा था, मैं उसका हिस्सा बन चुका था।

सबसे डरावनी बात ये थी कि इसमें कोई ज़बरदस्ती नहीं थी। न वो मुझे धक्का दे रही थी, न खींच रही थी। सब कुछ मेरी सहमति से हो रहा था, और शायद यही सबसे बड़ा जाल था। मुझे लगने लगा कि अगर मैं चाहूँ तो रुक सकता हूँ, लेकिन हर बार रुकने की कोशिश में एक गहरी थकान घेर लेती थी। जैसे रुकना ही ग़लत दिशा हो।

अब सवाल साफ़ था—ये प्यार था या रिहाई। और अगर ये रिहाई थी, तो किस क़ैद से। शरीर की, पहचान की, या उस इंसान की जो मैं अब तक खुद को समझता आया था। मुझे धीरे-धीरे ये भी महसूस होने लगा कि शायद मैं कभी पूरी तरह इस दुनिया का था ही नहीं। शायद मैं बस यहाँ रुका हुआ था, और उसके प्यार ने मुझे याद दिला दिया कि मुझे आगे जाना है।

आखिरकार वो दिन आ ही गया जब मैने उसे देखा, जिस दिन मैंने उसे देखा, उस दिन पहली बार मुझे सच में डर लगा। अब तक जो कुछ भी हो रहा था, वो अजीब था, बेचैन करने वाला था, लेकिन उसमें एक अस्पष्टता थी—जैसे कुछ अधूरा, कुछ धुंधला। मगर अब धुंध छंट रही थी। मेरे ही घर में, उन्हीं दीवारों के बीच जहाँ मेरी सांसों की आदतें बसी थीं, कोई और उसी सहजता से मौजूद था जैसे मैं कभी हुआ करता था। उसकी चाल, उसका ठहराव, उसके हाथों की हरकतें—सब कुछ जाना-पहचाना था। फर्क बस इतना था कि उसमें वो हिचक नहीं थी जो मुझमें अब भर गई थी। वो यहाँ पूरी तरह मौजूद था, और मैं नहीं।

लोग उसके आसपास वैसे ही थे जैसे कभी मेरे आसपास हुआ करते थे। उनकी आँखों में कोई शक नहीं था, कोई सवाल नहीं था। जैसे मेरी जगह कभी खाली हुई ही नहीं। मुझे एहसास हुआ कि मेरी अनुपस्थिति किसी को महसूस नहीं हो रही, क्योंकि किसी और ने उसे बिना शोर के भर दिया था। वो सिर्फ़ मेरे जैसा नहीं था, वो मुझसे बेहतर था—ज़्यादा स्थिर, ज़्यादा ठोस, ज़्यादा विश्वसनीय। जैसे यही असली संस्करण हो और मैं कोई ड्राफ्ट, जिसे अब हटाया जा रहा हो।

सबसे डरावनी बात ये नहीं थी कि कोई और मेरी जगह ले रहा था, बल्कि ये थी कि वो जगह पहले से ही उसके लिए तैयार थी। मेरी यादें, मेरी आदतें, मेरी पहचान—सब कुछ उसे ऐसे स्वीकार कर रहा था जैसे वो ही सही उत्तर हो। और मैं, जो कभी इस जीवन का केंद्र था, अब उसकी परछाईं बन चुका था।

मुझे समझ आने लगा कि ये कोई हमला नहीं है, कोई साज़िश नहीं है, बल्कि एक प्रतिस्थापन है—शांत, सटीक और अंतिम। जैसे प्रकृति ख़ाली जगह सहन नहीं कर सकती, वैसे ही इस दुनिया ने मेरी कमी को तुरंत भर लिया था। और अब सवाल ये नहीं था कि वो कौन है, बल्कि ये था कि मैं अब क्या हूँ।

अब सबसे अजीब बदलाव मेरी मौजूदगी में नहीं, मेरी यादों में होने लगा था। पहले मैं खुद को हल्का महसूस करता था, अब खुद को खाली महसूस करने लगा था। मेरी ज़िंदगी के हिस्से—जो कभी मेरी पहचान हुआ करते थे—अब जैसे मुझसे छूटते नहीं थे, बल्कि मुझसे वापस लिए जा रहे थे। जब मैं किसी पुरानी तस्वीर को देखता, तो चेहरा पहचाना हुआ लगता, मगर उस पल की गर्मी, उस समय की अनुभूति, सब कुछ गायब होता। यादें अब जानकारी बन चुकी थीं, एहसास नहीं। जैसे कोई पुरानी फ़ाइल पढ़ रहा हूँ जिसमें नाम मेरा है, लेकिन कहानी किसी और की है।

लोगों के साथ बिताए गए पल अब मुझसे जवाब नहीं माँगते थे। माँ की चिंता, दोस्तों की हँसी, घर की दीवारों से जुड़ी आदतें—सब कुछ मौजूद था, लेकिन मुझसे जुड़ा नहीं था। मुझे महसूस होने लगा कि यादें सिर्फ़ दिमाग़ की चीज़ नहीं होतीं, वो इस दुनिया में किसी इंसान को बाँधने की रस्सियाँ होती हैं। और मेरी रस्सियाँ अब एक-एक कर ढीली की जा रही थीं।

सबसे डरावना ये था कि ये यादें कहीं जा नहीं रही थीं, बस मेरी नहीं रहीं। मैं देख सकता था कि वो दूसरा—जो मेरी जगह था—उन्हें पूरी सहजता से जी रहा था। उसे वो सब याद था, जो मुझे अब याद नहीं रहा। जैसे मेरी ज़िंदगी का अधिकार चुपचाप ट्रांसफर हो गया हो।

अब मुझे समझ आने लगा कि अगर यही चलता रहा, तो एक दिन मैं सब कुछ जानता हुआ भी कुछ भी महसूस नहीं कर पाऊँगा। मैं इतिहास बन जाऊँगा, मौजूद लेकिन अप्रासंगिक। और शायद यही असली मौत थी—शरीर के रुकने से पहले होने वाली, धीरे-धीरे घटती हुई।अब ये साफ़ था कि अगला कदम सच का होगा। क्योंकि यादें जाने से पहले हमेशा वजह सामने आती है। और मुझे एहसास था कि वो वजह वही है।

अब तक मैं जिस अंधेरे में टटोल रहा था, वो अंधेरा अज्ञान का नहीं था, बल्कि टाले गए सच का था। मुझे धीरे-धीरे ये एहसास होने लगा कि वो जो कुछ जानती थी, उसे छुपा नहीं रही थी, बस सही वक़्त का इंतज़ार कर रही थी। उसकी मौजूदगी अब मुझे डराती नहीं थी, बल्कि एक अजीब तरह की स्पष्टता देती थी। जैसे किसी लंबे भ्रम के बाद अचानक चीज़ें अपने असली आकार में दिखने लगती हैं।

मुझे समझ आने लगा कि वो इस दुनिया की नहीं थी—कम से कम उस तरह से नहीं, जैसे हम होते हैं। वो किसी शरीर में क़ैद आत्मा नहीं थी, बल्कि एक ऐसी सत्ता थी जिसका काम आत्माओं को उनकी ग़लत जगहों से निकालना था। कुछ लोग इस दुनिया में गलती से नहीं आते, बल्कि रुक जाते हैं। मैं भी उन्हीं में से एक था। मैं ज़िंदा था, सांस ले रहा था, मगर पूरी तरह से यहाँ का नहीं था। मेरी बेचैनी, मेरा हमेशा अलग महसूस करना, सब इसी वजह से था।

उसने मुझे इसलिए नहीं चुना क्योंकि वो मुझसे प्यार करती थी, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं तैयार था। मेरे अंदर का खालीपन कोई कमी नहीं था, बल्कि एक दरवाज़ा था। उसके तीन शब्द उस दरवाज़े पर दस्तक नहीं थे, बल्कि ताला खोलने की आख़िरी चाबी थे।

अब मुझे ये भी समझ आ गया कि जो मेरी जगह ले रहा था, वो कोई दुश्मन नहीं था। वो इस दुनिया के लिए सही संस्करण था—ठोस, पूरा, स्वीकार्य। और मैं? मैं एक ऐसा टुकड़ा था जिसे यहाँ से आगे बढ़ना था। ये सच सुनकर मुझे दुख नहीं हुआ। बल्कि पहली बार मुझे लगा कि जो हो रहा है, वो ग़लत नहीं है। डर बस इस बात का था कि आगे क्या है। क्योंकि सच हमेशा राहत नहीं देता, कभी-कभी वो अगले डर का दरवाज़ा खोल देता है।

जैसे-जैसे मेरी पकड़ इस दुनिया पर ढीली होती गई, एक नई परत खुलती चली गई। ये कोई दूसरी दुनिया नहीं थी, बल्कि इसी दुनिया का वो हिस्सा था जिसे ज़िंदा लोग महसूस नहीं कर पाते। वहाँ वक़्त रुकता नहीं था, लेकिन बहता भी नहीं था। सब कुछ स्थिर था, हल्का और बेहद शांत। वहाँ शरीर की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि वहाँ दर्द नहीं था, भूख नहीं थी, और डर भी अधूरा था। लेकिन उसी शांति के बीच मुझे एक अजीब सी कमी महसूस हुई। वहाँ प्यार था, मगर छूने की चाह नहीं थी। सुकून था, मगर संघर्ष नहीं था। मुझे समझ आने लगा कि ये जगह अंत नहीं है, बल्कि एक बीच का पड़ाव है—उनके लिए जो कहीं फिट नहीं होते। और वहीं खड़े होकर मैंने पहली बार इस दुनिया की कमी महसूस की, जहाँ दर्द के साथ-साथ अपनापन भी था।

अब सवाल सामने साफ़ था, और उसे टालने की कोई जगह नहीं बची थी। या तो मैं पूरी तरह इस हल्केपन को स्वीकार कर लूँ और खुद को पीछे छोड़ दूँ, या फिर वापस उस भारी, अधूरी लेकिन जानी-पहचानी ज़िंदगी में लौट जाऊँ। ये कोई नैतिक फैसला नहीं था, बल्कि पहचान का था। मैंने महसूस किया कि अगर मैं पूरी तरह चला गया, तो कोई मुझे याद भी नहीं करेगा, और अगर लौटा, तो मैं वैसा कभी नहीं रहूँगा जैसा पहले था। यही आख़िरी इम्तिहान था—खोकर शांति या अधूरा रहकर ज़िंदगी। और मैंने वही चुना, जिससे डर सबसे ज़्यादा लगा।

मैं वापस तो आ गया, लेकिन लौटना वैसा नहीं था जैसा फिल्मों में दिखाया जाता है। कोई चमत्कार नहीं हुआ, कोई अचानक जागना नहीं, कोई राहत की सांस नहीं। ज़िंदगी बस वहीं से चल पड़ी जहाँ से छूट गई थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो। लोग मुझे पहचानते थे, मेरा नाम लेते थे, मेरी मौजूदगी स्वीकार करते थे, लेकिन उस स्वीकार में वो गर्मी नहीं थी जो कभी हुआ करती थी। और शायद गलती मेरी ही थी, क्योंकि मैं अब उस गर्मी को पकड़ पाने लायक़ नहीं रहा था।

मेरे अंदर कुछ लौट आया था, मगर सब कुछ नहीं। यादें वापस थीं, लेकिन उनमें भाव नहीं था। रिश्ते मौजूद थे, लेकिन उनमें पकड़ नहीं थी। मैं हँसता था, काम करता था, रोज़मर्रा की ज़िंदगी निभाता था, मगर हर काम में एक दूरी बनी रहती थी। जैसे मैं खुद अपनी ज़िंदगी का प्रतिनिधि बन गया हूँ, मालिक नहीं।

कभी-कभी मुझे महसूस होता है कि वो दूसरा अब भी कहीं मौजूद है, शायद किसी परछाईं में, शायद किसी आदत में। और वो भी, जिसने मुझे आज़ाद किया था, कहीं न कहीं इस दुनिया में किसी और को देख रही होगी—ये जानने के लिए कि कौन अगला है जो यहाँ रुक गया है।

सबसे अजीब बात ये है कि अब मुझे डर नहीं लगता। क्योंकि मुझे समझ आ गया है कि ग़ायब होना हमेशा खो जाना नहीं होता। कभी-कभी वो एक चेतावनी होती है। मैं हूँ, ये सच है। लेकिन जो मैं था… वो अब नहीं हूँ।

 

 

 

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