मोहब्बत थी… या सज़ा?

उससे पहली मुलाक़ात बिल्कुल फ़िल्मी नहीं थी। ना बारिश थी, ना स्लो मोशन। बस एक जेल की दीवार थी…
और मैं, जो वहाँ एक crime story cover करने गया था।

वो सलाखों के उस पार खड़ी थी।
आँखों में डर नहीं, बल्कि ऐसा सुकून जैसे उसने सब पहले से स्वीकार कर लिया हो।

उसने मुझसे सिर्फ़ एक सवाल पूछा— अगर कोई इंसान मोहब्बत में किसी को मार दे तो…
तो वो गुनहगार होता है या मजबूर?

मैं मुस्कुरा दिया।
मुझे लगा ये बस एक और केस है।

लेकिन उसी रात एक आदमी की लाश मिली— ठीक उसी तरह, जैसा उसने अपने बयान में बताया था। अब सवाल ये नहीं था कि वो लड़की निर्दोष है या नहीं बल्कि सवाल ये था कि—
उसे सब पहले से कैसे पता था?

और सबसे डरावनी बात…
अगली मुलाक़ात में उसने कहा— अब आप मेरी कहानी का हिस्सा हो चुके हैं। उसी पल मुझे समझ आ गया— ये मोहब्बत की कहानी नहीं है बल्कि ये सज़ा की शुरुआत है।

अगली सुबह शहर नींद से जगा ही नहीं था कि खबर फैल गई—
एक मर्डर।

वही आदमी, वही तरीका, और वही निशान…
जो उसने मुझसे कल रात बताए थे।

मैं मौके पर पहुँचा तो पुलिस पहले से मौजूद थी। लाश के पास एक छोटा-सा काग़ज़ पड़ा था—
उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी: मोहब्बत की क़ीमत चुकाई गई।

मेरे हाथ काँप गए।
ये कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं था।

शाम को जब मैं उससे मिलने फिर जेल पहुँचा,  वो पहले से मुस्कुरा रही थी जैसे सब कुछ उसकी योजना का हिस्सा हो।

मैंने गुस्से में पूछा, तुम्हें कैसे पता था ये सब होगा?

उसने आँखें उठाईं और बोली क्योंकि मैंने उसे मरते देखा था…
उससे पहले कि वो मरा।

उसने बताया—
वो आदमी उसका पति था जिसने उसे सालों तक पीटा, जला देने की कोशिश की, और फिर उसे छोड़ दिया।

मैंने उसे मारा नहीं,
वो बोली।
मैंने बस इंतज़ार किय कि कोई और उसे ख़त्म कर दे।

उस पल मुझे एहसास हुआ—
ये कहानी सिर्फ़ क्राइम नहीं है।

ये बदले की मोहब्बत है और मैं धीरे-धीरे उस बदले का गवाह नहीं…
हिस्सा बन रहा था।

तीन दिन बाद दूसरी लाश मिली। इस बार शहर के बीचों-बीच। भीड़, कैमरे, पुलिस—सब कुछ था।
बस एक चीज़ नहीं थी…
कोई सबूत।

मैंने लाश की हालत देखी तो दिल बैठ गया। चोट के निशान बिल्कुल वैसे ही थे जैसे उसने जेल में मुझे बताए थे—
शब्द दर शब्द, जख़्म दर जख़्म।

अब शक सिर्फ़ उस पर नहीं था बल्कि शक मुझ पर भी होने लगा था।

पुलिस ने मुझे कमरे में बुलाया।
सवाल सीधे थे—
आप हर मर्डर से पहले उससे क्यों मिलते हैं?
आपको इतना कैसे पता होता है?

मैं जवाब दे भी नहीं पाया।
क्योंकि सच ये था मुझे भी नहीं पता था कि मैं कब उसका मोहरा बन गया।

उस रात जब मैं उससे मिलने गया, वो पहली बार रोई और सच में रोई कोई दिखावा नही किया।

मैंने किसी और की मौत नहीं चाही, वो बोली।
लेकिन हर बार जब कोई मुझे छोड़ता है… तो कोई मर जाता है।

मैंने उसका हाथ थाम लिया।
गलत था, मैं जानता था लेकिन उस पल मुझे उससे डर नहीं लगा बल्कि मुझे उससे लगाव हो गया था, अब पता नहीं ये लगाव मुझे बर्बाद करता या आबाद- मै ये सोच ही रहा था की तभी उसने धीरे से कहा—
अब अगला नाम आपका भी हो सकता है, ये सुनते ही मैने अपने कदम पीछे कर लिए और उसी पल मुझे समझ आया— ये मोहब्बत नहीं थी। ये फँसाने की शुरुआत थी।

उस रात नींद नहीं आई उसका आख़िरी वाक्य दिमाग़ में गूँजता रहा—
अगला नाम… आपका भी हो सकता है।

सुबह होते ही मैंने पुराने केस फाइल्स निकलवाईं।
तीनों मर्डर अलग-अलग लगते थे, लेकिन एक बात common थी—
तीनों पीड़ितों पर घरेलू हिंसा और धोखाधड़ी के केस पहले से दर्ज थे और फिर मुझे एक नाम मिला—
डॉ. आर्यन मल्होत्रा। क्रिमिनल साइकोलॉजिस्ट। सालों पहले सस्पेंड किया गया था।

जेल में जब मैंने उससे उसका नाम लिया, वो पहली बार चुप हो गई।
उसकी आँखों में डर नहीं था— पहचान थी।

वो मुझे बचाने आया था, वो बोली। जब कोई और नहीं आया।

सच सामने आने लगा— डॉ. आर्यन ऐसे टूटे लोगों को ढूँढता था, जिन्हें समाज ने छोड़ दिया हो। वो उन्हें सिखाता था कि कैसे अपने ज़ुल्म करने वालों को क़ानूनी हादसा बना दिया जाए।

और वो लड़की?
वो उसकी सबसे कामयाब कहानी थी।

तभी मुझे समझ आया— मर्डर उसने नहीं किए थे। उसने बस लोगों को मरने के लिए सही जगह पर खड़ा किया था और अब…
वो मुझे भी उसी रास्ते पर ला रहा था।

उसने पहली बार मेरा नाम प्यार से लिया और उसी पल मुझे समझ आ गया—
अब खतरा बाहर नहीं, मेरे अंदर है।

जेल की मुलाक़ात में वो बिल्कुल बदली हुई थी आवाज़ नरम, नज़रें झुकी हुईं।
आप मेरे जैसे नहीं हैं, वो बोली।
आप मुझे समझते हैं।

मैं जानता था—
ये वही पल है जहाँ लोग गलती करते हैं और मैंने भी वही की। मैंने उसे डॉ. आर्यन के बारे में सब बता दिया।
और उसी रात तीसरी लाश मिली।

इस बार मौत हादसा नहीं थी— कत्ल था।
सीधा, बेरहम।

और सबूत?
सब मेरी तरफ़ इशारा कर रहे थे।

मेरी कॉल रिकॉर्ड्स, मेरी लोकेशन, और सबसे खतरनाक— उसकी गवाही।

वो पुलिस के सामने रोई, काँपी, और बोली—
वो मुझे मजबूर करता था।

उस पल मुझे समझ आया— डॉ. आर्यन ने मुझे नहीं फँसाया था बल्कि उसने तो मुझे उसके हाथों में सौंप दिया था।

और सबसे डरावनी बात?
जब पुलिस मुझे ले जा रही थी, वो मेरी तरफ़ देख कर मुस्कुरा रही थी जैसे उसका कोई मक्सद पूरा हो गया हो।

जैसे कह रही हो— मोहब्बत थी… या सज़ा?

जेल की दीवारें बाहर से मोटी होती हैं, अंदर से दिमाग़ को तोड़ देती हैं। मैं वही बैठा था जहाँ कभी वो थी। लेकिन इस बार मैं आरोपी था और वो… सरकारी गवाह।

रात को एक कैदी मेरे पास आया। धीमी आवाज़ में बोला, डॉ. आर्यन तुम्हें ढूँढ रहा है।

मुझे हँसी आ गई ये सोचकर जो आदमी सब चला रहा था, वो अब भी आज़ाद था।

अगली पेशी से पहले मुझे एक पुराना रिकॉर्ड मिला—
डॉ. आर्यन की थीसिस।

“लव-इंड्यूस्ड क्राइम सिंड्रोम” इसे पढ़ते ही रूह काँप गई।

उसमें लिखा था—
अगर किसी इंसान को यह यक़ीन दिला दिया जाए कि वो किसी और की दुनिया है, तो वो उसके लिए जुर्म भी कर सकता है…
और खुद सज़ा भी भुगत लेगा।

वो लड़की…
उसकी experiment थी।

और मैं?
मैं proof बन चुका था।

तभी मुझे एहसास हुआ—
अगर मैं चुप रहा, तो वो जीत जाएगा और अगर मैंने बोला तो किसी और की ज़िंदगी बचेगी।

पहली बार मैंने फैसला किया ये मोहब्बत नहीं थी। ये एक अपराध था।
और अब… इसे खत्म करना मेरी सज़ा थी।

कोर्टरूम खचाखच भरा था। सबकी नज़रें मुझ पर थीं— एक पत्रकार जो कातिल बना दिया गया था।

तभी मैंने बोलना शुरू किया। मैंने डॉ. आर्यन की थीसिस, उसके पुराने केस, और कॉल रिकॉर्ड्स सामने रख दिए।
एक-एक करके उसके शिकारों के नाम पढ़े और फिर मैंने उसकी सबसे बड़ी गलती दिखाई।

वो लड़की। जो हर मौत से पहले उसी पैटर्न में टूटती थी।

जज ने उससे सवाल किया तो वो रोई…
लेकिन इस बार आँसू काम नहीं आए।

डॉ. आर्यन को गिरफ्तार किया गया और उसने कबूल किया— मैं लोगों को मारता नहीं था…
मैं उन्हें प्यार देता था। बाक़ी काम वो खुद कर लेते थे।

फैसला आया।
मैं बरी हो गया।
वो लड़की मानसिक इलाज के लिए भेजी गई।

महीनों बाद मैं जेल के बाहर खड़ा था।
वो दूर से देख रही थी।

मैंने पूछा—
मोहब्बत थी… या सज़ा?

वो बोली—
जो मैंने चाहा…
वही मेरी सज़ा बन गया।

मैं मुड़ा और चला गया।

क्योंकि कुछ प्यार
मिलकर नहीं…
छूटकर पूरे होते हैं।

 

 

 

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