shaadi
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शादी के बाद का वो पहला हफ्ता था… जब सब कुछ नया, सुंदर और थोड़ा अजनबी लगता है। मैं इस घर की हर चीज़ को धीरे-धीरे अपनाने की कोशिश कर रही थी—दीवारों पर लगी तस्वीरें, पुराने फर्नीचर की खुशबू, और उन लोगों के चेहरे जो अब मेरे अपने कहलाते थे। पाओलो मेरे साथ था, ख्याल रखने वाला, समझदार… लेकिन उसकी आँखों में कभी-कभी एक अजीब सी खामोशी दिखती थी, जिसे मैं समझ नहीं पाती थी।

उस दिन दोपहर को मैं घर में अकेली थी। सास किसी रिश्तेदार के यहाँ गई थीं और पाओलो ऑफिस। हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी, और मैं यूँ ही घर के पुराने सामान को देख रही थी। तभी मेरी नजर स्टोर रूम के आधे खुले दरवाज़े पर पड़ी। पता नहीं क्यों… लेकिन अंदर जाने का मन हुआ।

कमरे में हल्की सी सीलन थी। पुराने बक्से, धूल से ढकी अलमारियाँ, और कोनों में जाले। मैं धीरे-धीरे अंदर बढ़ी, जैसे कोई मुझे वहाँ बुला रहा हो। एक लकड़ी का बड़ा सा ट्रंक रखा था—थोड़ा खुला हुआ।

मैंने झुककर उसे खोला।

अंदर कुछ पुराने कपड़े थे… और उनके नीचे एक फोटो एलबम।

दिल थोड़ी तेज़ी से धड़कने लगा।

मैंने एलबम खोला… और जैसे ही पहली तस्वीर सामने आई—

मेरे हाथ कांप गए।

तस्वीर में एक दुल्हन थी… लाल जोड़े में… बिल्कुल मेरी तरह।

नहीं… सिर्फ ‘मेरी तरह’ नहीं—

वो मैं ही थी

मैंने घबराकर पन्ने पलटे। हर तस्वीर में वही चेहरा… वही मुस्कान… वही आँखें।

“ये… कैसे हो सकता है?” मैंने खुद से फुसफुसाया।

तभी पीछे से किसी के कदमों की आहट आई।

मैंने धीरे से मुड़कर देखा—

दरवाज़े पर पाओलो खड़ा था।

उसका चेहरा बिल्कुल सख्त था… और आँखों में वो डर था… जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।

“तुमने ये… कहाँ से पाया?” उसकी आवाज़ धीमी थी… लेकिन उसमें घबराहट साफ थी।

मेरे होंठ सूख गए।

“ये लड़की… कौन है?” मैंने कांपती आवाज़ में पूछा।

कुछ पल के लिए कमरे में खामोशी छा गई।

फिर उसने धीरे से कहा—

“ये… मेरी पहली पत्नी है।”

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

“लेकिन… ये तो मैं हूँ…

कमरे में सन्नाटा जम चुका था। मेरी उंगलियाँ अब भी उस एलबम के पन्नों को पकड़े हुए थीं, लेकिन पकड़ ढीली पड़ती जा रही थी। दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसकी आवाज़ मुझे खुद सुनाई दे रही थी।

“ये… मेरी पहली पत्नी है।”

पाओलो के शब्द अभी भी हवा में तैर रहे थे।

मैंने उसकी आँखों में देखा—“लेकिन… ये तो मैं हूँ।”

कुछ पल के लिए उसने नजरें फेर लीं, जैसे वो इस सवाल से बचना चाहता हो। लेकिन अब मैं रुकने वाली नहीं थी।

मैंने एलबम जोर से बंद किया और खड़ी हो गई—“मुझे सच जानना है, पाओलो। अभी… इसी वक्त।”

उसने गहरी साँस ली—“तुम अभी परेशान हो, बाद में बात करेंगे।”

“नहीं!” मेरी आवाज़ अचानक तेज़ हो गई। “बाद में नहीं। हर बार तुम बात टाल देते हो। लेकिन आज नहीं। ये कोई छोटी बात नहीं है… ये मेरी ज़िंदगी है!”

मेरी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन इस बार उसमें डर कम और जिद ज्यादा थी।

पाओलो ने पहली बार सीधे मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में घबराहट थी… और शायद थोड़ा सा डर भी।

“तुम सच सुनना चाहती हो?” उसने धीमे से पूछा।

“हाँ,” मैंने बिना सोचे जवाब दिया, “चाहे जो भी हो।”

कुछ सेकंड तक वो मुझे देखता रहा, जैसे तय कर रहा हो कि कितना बताना है।

फिर वो धीरे-धीरे कमरे के अंदर आया और दरवाज़ा बंद कर दिया।

क्लिक।

उस छोटी सी आवाज़ ने पूरे माहौल को और भारी बना दिया।

“उसका नाम… एलेना था,” उसने कहना शुरू किया।

मेरे दिल में अजीब सी टीस उठी।

“हमारी शादी को सिर्फ छह महीने हुए थे… जब वो अचानक गायब हो गई।”

“गायब?” मैंने दोहराया, “मतलब…?”

“मतलब… एक दिन वो घर से निकली… और फिर कभी वापस नहीं आई।”

कमरे में ठंड सी फैल गई।

“पुलिस?” मैंने पूछा।

“सब किया,” उसने तुरंत कहा, “पुलिस, investigation, posters… लेकिन कुछ नहीं मिला। जैसे वो… कभी थी ही नहीं।”

मैंने उसकी बात सुनी… लेकिन दिमाग अब भी उसी फोटो में अटका था।

“लेकिन ये सब मुझे क्यों नहीं बताया गया?” मैंने पूछा, “और सबसे बड़ा सवाल—वो मेरी तरह क्यों दिखती है?”

पाओलो चुप हो गया।

उसकी खामोशी अब सबसे बड़ा जवाब लग रही थी।

मैं उसके करीब गई—“तुम मुझे कुछ छुपा रहे हो।”

“नहीं…” उसने धीरे से कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में भरोसा नहीं था।

“झूठ मत बोलो!” मैंने लगभग चिल्लाते हुए कहा, “मैं पागल नहीं हूँ! मैंने अपनी शक्ल देखी है… और मैंने उस लड़की को भी देखा है। वो मैं हूँ, पाओलो!”

उसने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया।

“तुम वो नहीं हो!” उसने तेज़ी से कहा।

उसकी पकड़ मजबूत थी… इतनी कि मुझे दर्द महसूस हुआ।

“तो फिर मैं कौन हूँ?” मैंने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।

वो कुछ बोल नहीं पाया।

बस मेरी तरफ देखता रहा… जैसे उसके पास जवाब है, लेकिन वो उसे कह नहीं सकता।

मैंने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया।

“सच बताओ…” इस बार मेरी आवाज़ धीमी थी… लेकिन और गहरी, “क्या मैं तुम्हारी पहली पत्नी जैसी दिखती हूँ… या मैं वही हूँ?”

ये सवाल हवा में ठहर गया।

पाओलो ने आँखें बंद कर लीं, जैसे वो इस पल से भागना चाहता हो।

“ये इतना simple नहीं है…” उसने बमुश्किल कहा।

“तो complex ही सही, लेकिन सच बताओ!”

मेरे शब्दों में अब थकान भी थी… और डर भी।

कुछ सेकंड बाद उसने जेब से कुछ निकाला।

एक छोटी सी चाबी।

मैंने उसे ध्यान से देखा—“ये क्या है?”

उसने मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा—“अगर तुम्हें सच जानना है… तो ये खोलो।”

“क्या खोलो?” मैंने पूछा।

उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा—

“हमारा बेडरूम… लेकिन वो वाला दरवाज़ा… जिसे तुमने कभी नोटिस नहीं किया।”

मेरे शरीर में एक ठंडी लहर दौड़ गई।

“वो दरवाज़ा… जो हमेशा बंद रहता है?” मैंने धीमे से पूछा।

उसने सिर हिलाया।

“उसके अंदर… तुम्हें तुम्हारे सारे जवाब मिल जाएंगे।”

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

मैंने चाबी अपने हाथ में ली। वो ठंडी थी… लेकिन उसका असर मेरे पूरे शरीर पर हो रहा था।

“और तुम?” मैंने पूछा।

“मैं… अंदर नहीं आ सकता,” उसने नजरें झुकाते हुए कहा।

“क्यों?”

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

अब मुझे समझ आ रहा था—ये सिर्फ एक कहानी नहीं है… ये कुछ और है।

कुछ ऐसा… जिससे वो खुद भी डरता है।

मैंने बिना कुछ कहे कमरे से बाहर कदम रखा।

दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि हर कदम भारी लग रहा था।

बेडरूम के बाहर पहुँचकर मैं रुक गई।

वो दरवाज़ा… जिसे मैंने कभी ध्यान से नहीं देखा था… आज साफ नजर आ रहा था।

छोटा सा… लकड़ी का… और पूरी तरह बंद।

मैंने धीरे से चाबी आगे बढ़ाई।

हाथ काँप रहा था।

“अगर तुम ये पढ़ रही हो… तो तुम मैं ही हो…”

अचानक वो लाइन मेरे दिमाग में गूंज गई—हालाँकि मैंने अभी तक कोई डायरी नहीं पढ़ी थी… लेकिन ये शब्द जैसे कहीं अंदर से आ रहे थे।

मैंने सिर झटका।

“ये सब क्या हो रहा है…” मैंने खुद से कहा।

और फिर…

मैंने चाबी ताले में डाल दी।

क्लिक।

दरवाज़ा खुलने ही वाला था…

और मुझे एहसास हो रहा था—

जो भी अंदर है… वो मेरी ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल देगा।

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

अंदर से एक ठंडी, बासी हवा बाहर आई… जैसे उस कमरे ने सालों से साँस ही न ली हो। मैंने एक पल के लिए आँखें बंद कीं… फिर खुद को संभालकर अंदर कदम रखा।

कमरा छोटा था… लेकिन हर चीज़ बेहद सलीके से रखी हुई थी। दीवारों पर हल्की रोशनी पड़ रही थी—शायद खिड़की के पर्दे के पीछे से।

पहली नजर में वो एक आम कमरा लगा…

लेकिन अगली ही पल—

मेरी साँस अटक गई।

दीवार पर लगी तस्वीरें…

मेरी थीं।

नहीं… सिर्फ मेरी जैसी नहीं—

वो मैं ही थी।

हर तस्वीर में—अलग-अलग पल… अलग कपड़े… अलग जगहें…
लेकिन चेहरा… वही।

मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ी। हाथ अपने आप एक फोटो की तरफ उठा।

उसमें मैं… पाओलो के साथ खड़ी थी… मुस्कुरा रही थी… बिल्कुल वैसे जैसे शादी वाले दिन मुस्कुराई थी।

लेकिन… ये फोटो पुरानी थी।

बहुत पुरानी।

“ये… कैसे…” मेरे होंठ काँप गए।

तभी मेरी नजर कमरे के कोने में रखी एक टेबल पर पड़ी।

वहाँ एक डायरी रखी थी।

काली कवर… हल्की धूल जमी हुई।

दिल की धड़कन और तेज़ हो गई।

मैंने धीरे से उसे उठाया… और पहला पन्ना खोला।

हाथ काँप रहे थे।

और जैसे ही मैंने पढ़ना शुरू किया—

मेरी दुनिया रुक गई।

“अगर तुम ये पढ़ रही हो… तो तुम मैं ही हो।”

मेरी उंगलियाँ जम गईं।

आँखें उस एक लाइन पर अटक गईं।

“नहीं… ये सच नहीं हो सकता…” मैंने खुद से फुसफुसाया।

लेकिन दिल… मान चुका था।

मैंने अगला पन्ना पलटा।

“मेरा नाम एलेना है… और अगर तुम ये पढ़ रही हो, तो इसका मतलब है कि पाओलो ने तुम्हें भी वही कहानी सुनाई होगी… जो उसने मुझे सुनाई थी।”

मेरे सीने में घुटन सी होने लगी।

मैंने तेजी से पन्ने पलटने शुरू किए—

हर पन्ने में… डर था।

हर शब्द में… सच्चाई।

“मैं गायब नहीं हुई थी… मुझे भुला दिया गया।”

मेरी आँखों से आँसू निकलने लगे।

“एक accident के बाद… मैं कुछ दिन coma में थी। जब मैं जागी… तो मुझे कुछ याद नहीं था।”

मेरे हाथ अपने आप मेरे सिर तक गए।

एक हल्का सा दर्द… जो मैं हमेशा ignore करती आई थी…

अचानक बहुत भारी लगने लगा।

“पाओलो ने कहा… मैं नई शुरुआत कर सकती हूँ। उसने मेरी मदद की… मुझे फिर से ‘मैं’ बनने में…”

मेरी साँसें तेज़ हो गईं।

“लेकिन धीरे-धीरे… मुझे एहसास हुआ—मैं खुद नहीं बन रही थी… मुझे बनाया जा रहा था।”

कमरे की दीवारें जैसे मेरे करीब आने लगीं।

“उसने मेरी यादें बदल दीं… मेरा नाम… मेरी पहचान… सब कुछ।”

“नहीं…” मैंने जोर से कहा, “नहीं, ये झूठ है…”

लेकिन मेरी आवाज़ ही मुझे झूठी लग रही थी।

मैंने आखिरी पन्ना खोला—

और जो लिखा था… उसने सब कुछ खत्म कर दिया।

“तुम उसकी दूसरी पत्नी नहीं हो… तुम उसकी पहली पत्नी हो—जिसे वो बार-बार खोकर… फिर से बना रहा है।”

डायरी मेरे हाथ से गिर गई।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

मेरे कानों में सिर्फ अपनी धड़कन की आवाज़ गूंज रही थी।

तभी—

दरवाज़े के बाहर कदमों की आहट आई।

मैंने धीरे से सिर उठाया।

पाओलो दरवाज़े पर खड़ा था।

इस बार उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था।

बस… एक अजीब सी शांति।

“तुमने पढ़ लिया…” उसने धीमे से कहा।

मैं पीछे हट गई।

“ये सब… क्या है?” मेरी आवाज़ टूट रही थी, “मैं… एलेना हूँ?”

वो कुछ पल चुप रहा।

फिर धीरे से बोला—

“हाँ।”

मेरी दुनिया वहीं रुक गई।

“हर बार… जब तुम मुझे छोड़कर जाने लगती हो… जब तुम्हें सच का थोड़ा सा भी एहसास होता है…”

उसने एक कदम आगे बढ़ाया—

“मैं तुम्हें खो नहीं सकता।”

मेरी आँखों में डर साफ था।

“इसलिए… मैं तुम्हें फिर से शुरू करता हूँ।”

“मतलब…?” मेरी आवाज़ barely सुनाई दे रही थी।

उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा—

“तुम्हारी यादें… erase कर देता हूँ।”

मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।

“तुम… पागल हो…” मैंने फुसफुसाया।

वो हल्का सा मुस्कुराया—

“नहीं… मैं सिर्फ तुम्हें खोना नहीं चाहता।”

मैंने सिर हिलाया—“ये प्यार नहीं है… ये कैद है!”

कुछ पल के लिए उसकी मुस्कान फीकी पड़ गई।

लेकिन फिर…

वो फिर से वैसा ही हो गया।

शांत… ठंडा।

“शायद,” उसने कहा, “लेकिन तुम्हें हर बार फिर से मुझसे प्यार हो जाता है।”

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

तभी उसने जेब से कुछ निकाला।

एक छोटा सा syringe।

मेरी साँस रुक गई।

“इस बार… मैं गलती नहीं करूँगा,” उसने धीरे से कहा।

मैं पीछे हटने लगी—

“नहीं… पाओलो… प्लीज…”

लेकिन कमरे में पीछे जाने की जगह नहीं थी।

वो धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ रहा था।

हर कदम… मेरे अंत की तरह लग रहा था।

मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही आवाज़ गूंज रही थी—

भागो…

लेकिन शरीर… जैसे जम गया था।

तभी मेरी नजर नीचे गिरी डायरी पर पड़ी।

आखिरी पन्ने के नीचे… कुछ और लिखा था—

बहुत छोटा… जैसे जल्दी में लिखा गया हो।

मैंने झट से उसे उठाया… और पढ़ा—

“अगर तुम ये पढ़ रही हो… तो याद रखना—इस बार हारना मत।”

मेरे अंदर कुछ जाग गया।

डर… अचानक गुस्से में बदल गया।

जैसे ही पाओलो मेरे करीब आया—

मैंने पूरी ताकत से उसे धक्का दिया।

वो पीछे लड़खड़ाया।

मैंने मौका नहीं गंवाया—

सीधे दरवाज़े की तरफ भागी।

“रुको!” उसकी आवाज़ पीछे से आई।

लेकिन इस बार…

मैं नहीं रुकी।

मैं भागती रही…

उस घर से बाहर…

उस सच्चाई से दूर नहीं—

बल्कि खुद को वापस पाने के लिए।

और उसी पल मुझे एहसास हुआ—

इस बार कहानी खत्म नहीं होगी…

इस बार…

मैं खुद अपनी कहानी बदलूँगी।

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