Second Face
Second Face

आरव की ज़िंदगी बिल्कुल सामान्य थी—सुबह ऑफिस, शाम घर, और बीच में वही रोज़मर्रा की भागदौड़। उस दिन भी वह एक मॉल में क्लाइंट मीटिंग के बाद कॉफी लेने गया था। भीड़ के बीच अचानक उसकी नज़र सामने खड़े एक आदमी पर पड़ी… और उसका दिल एक पल के लिए थम गया। वह आदमी हूबहू उसी जैसा दिख रहा था—वही चेहरा, वही हेयरस्टाइल, यहाँ तक कि वही नीली शर्ट। फर्क सिर्फ इतना था कि उस आदमी की आँखों में एक अजीब ठंडापन और हल्की-सी व्यंग्य भरी मुस्कान थी। आरव कुछ सेकंड तक जड़ हो गया। जब तक वह संभलता, वह हमशक्ल मुड़कर एस्केलेटर की तरफ बढ़ गया। आरव घबराकर उसके पीछे दौड़ा, भीड़ को धक्का देते हुए नीचे पहुँचा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। उसने चारों तरफ नज़र दौड़ाई—हर चेहरा अजनबी था। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। क्या यह सिर्फ भ्रम था? तभी उसके फोन पर मैसेज की टोन बजी। स्क्रीन पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—तुम मुझसे भाग नहीं सकते। नंबर अनजान था। आरव ने ऊपर देखा… दूसरी मंज़िल की रेलिंग पर वही आदमी खड़ा था, उसे घूरते हुए। अगले ही पल, वह भीड़ में फिर से गायब हो गया।

मॉल वाली घटना के बाद से आरव की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसने खुद को समझाने की कोशिश की कि यह सिर्फ थकान या तनाव का असर होगा। लेकिन रात को जब वह घर पहुँचा और बाथरूम के आईने के सामने खड़ा हुआ, तो उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। कुछ पल के लिए उसे लगा कि आईने में दिख रहा चेहरा उसकी हरकतों से आधा सेकंड पीछे चल रहा है। उसने हाथ उठाया—आईने वाला चेहरा भी उठा, पर उसकी मुस्कान अलग थी। वह मुस्कान आरव ने नहीं दी थी। वह ठंडी, तिरछी और जैसे किसी राज़ से भरी हुई थी। घबराकर उसने आँखें बंद कीं और दोबारा देखा—सब सामान्य था।

अगले दिन ऑफिस में भी उसका ध्यान काम पर नहीं लग पाया। उसे बार-बार महसूस होता रहा कि कोई उसे देख रहा है। लंच ब्रेक में उसने वॉशरूम के शीशे में फिर झाँका—इस बार चेहरा सामान्य था, लेकिन आईने पर उंगली से लिखा एक शब्द साफ दिख रहा था—जागो। वह घबरा गया। आसपास कोई नहीं था। उसने तुरंत पानी से शीशा साफ किया, लेकिन अब दिल में डर बैठ चुका था। क्या उसका हमशक्ल अब सिर्फ बाहर नहीं… उसके अंदर भी था?

अब आरव को यकीन हो चुका था कि यह सिर्फ उसका वहम नहीं है। ऑफिस की पार्किंग में उसे फिर वही हमशक्ल दिखाई दिया—दूर खड़ा, कारों के बीच से उसे घूरता हुआ। वो इन सब चीज़ो से बहुत परेशान हो गया था लेकिन इस बार आरव ने हिम्मत नहीं हारी। वह तिलमिला कर सीधे सिक्योरिटी रूम में गया और गार्ड से सीसीटीवी फुटेज दिखाने को कहा। स्क्रीन पर रिकॉर्डिंग चलने लगी। कैमरे में साफ दिखाई दे रहा था—आरव पार्किंग में अकेला खड़ा है, बार-बार इधर-उधर देख रहा है, जैसे किसी को ढूँढ रहा हो। लेकिन वहाँ दूसरा कोई नहीं था।

आरव का गला सूख गया। उसने दूसरी एंगल से फुटेज चलवाई। हर कैमरे में वही नतीजा—वह अकेला। गार्ड ने हँसते हुए कहा, सर, शायद ज़्यादा काम का स्ट्रेस है। पास खड़े दो सहकर्मी भी उसे अजीब नज़रों से देखने लगे।

कमरे से बाहर निकलते समय आरव ने काँच की दीवार में अपना प्रतिबिंब देखा। कुछ पल के लिए उसे लगा कि काँच में खड़ा उसका चेहरा हल्का-सा मुस्कुराया… जबकि उसके होंठ सख्त और स्थिर थे।

उसी शाम उसे एक और मैसेज आया—सबूत ढूँढना बंद करो। सच तुम्हारे अंदर है।

अब सवाल यह नहीं था कि वह हमशक्ल कहाँ है…
सवाल यह था कि क्या वह सच में कभी बाहर था भी?

अब आरव हर जगह सतर्क रहने लगा था। सड़क पार करते समय, मेट्रो स्टेशन पर, यहाँ तक कि ऑफिस के कॉरिडोर में भी उसे महसूस होता कि कोई उसकी हर हरकत पर नज़र रख रहा है। एक शाम जब वह देर से घर लौट रहा था, स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में उसने उसे फिर देखा—वही चेहरा, वही कद, लेकिन इस बार वह मुस्कुरा नहीं रहा था। उसकी आँखें गुस्से से भरी थीं।

आरव का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। इस बार उसने भागने के बजाय उसका पीछा करने का फैसला किया। वह आदमी मुड़कर एक सुनसान गली में चला गया। आरव भी तेज़ कदमों से पीछे गया। गली के अंत में सिर्फ एक बंद दीवार थी। कोई दरवाज़ा नहीं, कोई मोड़ नहीं। फिर भी वह आदमी वहाँ नहीं था।

आरव उलझन में चारों तरफ देखने लगा। तभी पीछे से किसी के कदमों की आहट आई। उसने मुड़कर देखा—कोई नहीं था। लेकिन दीवार पर लगी टूटी खिड़की के काँच में उसे अपना प्रतिबिंब दिखा… और इस बार काँच में खड़ा उसका हमशक्ल उसके बिल्कुल पीछे खड़ा था।

आरव ने घबराकर पीछे मुड़कर देखा—वहाँ कोई नहीं था।

लेकिन काँच में दिख रहा चेहरा धीरे-धीरे उसके करीब आ रहा था। धबराकर आरव उलटे पॉव सीधा अपने घर पहुचा।

उस रात आरव सो नहीं पाया। जैसे ही वह आँखें बंद करता, उसे अपने हमशक्ल की ठंडी आँखें याद आ जातीं। अचानक उसके दिमाग में बचपन की कुछ धुंधली यादें उभरने लगीं—स्कूल का एक कमरा, टूटी हुई कुर्सी, और उसके हाथों में खून के हल्के निशान। उसे याद आया कि बचपन में उसे अक्सर गुस्से के ऐसे दौरे पड़ते थे, जिनके बाद उसे कुछ भी याद नहीं रहता था। माँ कहती थीं, तुम कुछ देर के लिए बदल जाते हो। तब डॉक्टर ने इसे स्ट्रेस कहकर टाल दिया था।

अगले दिन उसने अपने पुराने घर का रुख किया। स्टोर रूम में रखे बक्सों में उसे अपनी पुरानी डायरी मिल गई। कुछ पन्नों पर लिखावट उसकी थी, लेकिन शब्द अजनबी—वह मुझे रोकता है… पर मैं वापस आऊँगा। तारीखें उन दिनों की थीं, जब उसे ब्लैंक हो जाने की शिकायत होती थी।

आरव के हाथ काँपने लगे। क्या उसका हमशक्ल कोई बाहरी इंसान नहीं, बल्कि उसकी अपनी दबाई हुई पहचान थी? क्या सालों पहले उसने अपने अंदर किसी हिस्से को बंद कर दिया था—जो अब वापस आ चुका था?

आईने के सामने खड़े होकर उसने खुद को गौर से देखा। उसे लगा, उसकी आँखों में अब दो परछाइयाँ हैं—एक डर की… और दूसरी इंतज़ार की।

अब आरव ने तय किया कि वह किसी विशेषज्ञ से मिलेगा। मनोचिकित्सक डॉ. मेहरा के केबिन में बैठते हुए उसके हाथ पसीने से भीग रहे थे। उसने पूरी कहानी सुनाई—हमशक्ल, मैसेज, आईने की मुस्कान, और बचपन की डायरी। डॉ. मेहरा शांत स्वर में बोले, कभी-कभी हमारा दिमाग खुद को बचाने के लिए एक दूसरी पहचान बना लेता है… जिसे हम स्वीकार नहीं कर पाते। उन्होंने धीरे से पूछा, क्या आपको कभी ऐसा लगा कि किसी और ने आपके शरीर पर नियंत्रण ले लिया हो?

यह सवाल सुनकर आरव सिहर उठा। उसे याद आया—कुछ दिन पहले ऑफिस में हुई एक तीखी बहस, जिसके बाद उसका सहकर्मी अचानक ट्रांसफर के लिए अप्लाई कर गया था। उसे उस दिन की पूरी घटना याद नहीं थी, बस इतना कि उसके अंदर बहुत गुस्सा भरा हुआ था।

डॉ. मेहरा ने कहा, संभव है कि आपका हमशक्ल कोई और नहीं, बल्कि आपकी दबी हुई भावनाओं का रूप हो।

घर लौटते समय आरव के फोन में एक नया मैसेज आया—डॉक्टर से सच नहीं छिपेगा… पर तुम मुझसे नहीं बच सकते।

अब उसे समझ आने लगा था—यह लड़ाई बाहर किसी से नहीं…बल्कि उसके अपने दिमाग के भीतर चल रही थी।

उस रात आरव ने भागने के बजाय इंतज़ार करने का फैसला किया। वह अपने कमरे की सारी लाइटें बंद कर आईने के सामने कुर्सी पर बैठ गया। दिल की धड़कनें तेज़ थीं, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर से ज़्यादा जिद थी। कुछ मिनटों तक सब सामान्य रहा। फिर अचानक कमरे की हवा भारी होने लगी। आईने में उसका प्रतिबिंब धुंधला हुआ… और धीरे-धीरे दूसरा चेहरा उभर आया। वही चेहरा—पर आँखों में गुस्सा, तिरस्कार और आत्मविश्वास।

कब तक मुझे दबाते रहोगे? आईने के भीतर से आवाज़ आई। आरव के होंठ नहीं हिले, लेकिन आवाज़ साफ थी।

तुम कौन हो? उसने फुसफुसाकर पूछा।

मैं तुम ही हूँ। वो हिस्सा जिसे तुमने बचपन में बंद कर दिया था—ताकि सब तुम्हें एक अच्छा लड़का समझें। तुम्हारा गुस्सा, तुम्हारी नफरत, तुम्हारी असली चाहत।

अचानक आरव को कई घटनाएँ याद आने लगीं—ऑफिस की बहस, टूटी हुई चीज़ें, वो लम्हे जब उसे कुछ याद नहीं रहता था। उसका हमशक्ल आगे बढ़ा और बोला, मैं तुम्हें कमजोर नहीं होने दूँगा।

आईने में दिख रहा चेहरा अब मुस्कुरा रहा था—और इस बार, आरव के होंठ भी उसी मुस्कान में ढल चुके थे।

सुबह ऑफिस में अफरा-तफरी मची हुई थी। खबर थी कि कंपनी का एक बड़ा प्रोजेक्ट डाटा लीक हो गया है, और शक सीधे आरव पर जा रहा था। सर्वर रूम की एंट्री लॉग में उसका आईडी कार्ड इस्तेमाल हुआ था। आरव के माथे पर पसीना आ गया—उसे याद ही नहीं था कि वह पिछली रात ऑफिस आया था।

घर लौटकर उसने लैपटॉप खोला। स्क्रीन पर एक वीडियो फाइल थी—देखो। उसने कांपते हाथों से प्ले किया। वीडियो में वही था… लेकिन अलग। उसकी चाल आत्मविश्वासी, आँखें ठंडी, और चेहरे पर वही तिरछी मुस्कान। वह कैमरे की तरफ देखकर बोला, मैं वो कर रहा हूँ, जो तुम कभी कर नहीं पाए।

आरव की साँसें रुक गईं। अब सच साफ था—हमशक्ल कोई भ्रम नहीं था। वह उसकी दूसरी पहचान थी, जिसने नियंत्रण लेना शुरू कर दिया था।

आईने के सामने खड़े होकर उसने खुद को देखा। इस बार प्रतिबिंब सामान्य था। कोई अलग चेहरा नहीं। कोई अलग मुस्कान नहीं।

लेकिन उसकी आँखों में अब डर नहीं था।

सिर्फ एक गहरी, ठंडी स्थिरता थी।

और तभी उसके फोन पर आखिरी मैसेज आया—
अब हम एक हैं।

आईने में सिर्फ एक चेहरा था…
पर वह पहले जैसा नहीं रहा।

 

By अन्वी शब्द

मैं अन्वी हूँ। शब्द मेरे लिए सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक रहस्यमयी दुनिया के दरवाज़े हैं। मुझे उन अनकहे एहसासों को कहानी में पिरोना पसंद है जो दिल की गहराइयों में छुपे रहते हैं। मेरी कहानियों में कभी हल्की-सी मोहब्बत की खुशबू होती है, तो कभी किसी अनदेखे रहस्य की आहट। मैं चाहती हूँ कि जब आप मेरी कहानी पढ़ें, तो कुछ पल के लिए समय ठहर जाए और आप खुद को उस दुनिया का हिस्सा महसूस करें।

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