रात के साढ़े ग्यारह बजे थे। शहर की आख़िरी लोकल बस लगभग खाली हो चुकी थी। बारिश की हल्की बूंदें शीशों से टकरा रही थीं और सड़कें सुनसान पड़ी थीं। एक-एक करके सभी यात्री उतर गए। अब बस में सिर्फ दो लोग बचे थे — ड्राइवर रमेश और पीछे की सीट पर बैठा एक अकेला यात्री।

रमेश ने रियर व्यू मिरर में देखा। वह आदमी शांत बैठा था, सिर थोड़ा झुका हुआ, जैसे किसी गहरी सोच में डूबा हो। उसकी आँखें बस के अंदर नहीं, जैसे कहीं और देख रही थीं।

कहाँ उतरना है? रमेश ने ऊँची आवाज़ में पूछा।

कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहीं आया। फिर धीमी, भारी आवाज़ गूँजी —
जहाँ सबका आख़िरी स्टॉप होता है…

रमेश हल्का सा हँसा, भाई, मज़ाक का टाइम नहीं है। आख़िरी स्टॉप पाँच मिनट में है।

यात्री ने धीरे से सिर उठाया। उसकी आँखों में अजीब सी ठंडक थी।
तुम्हें याद है… पाँच साल पहले इसी रूट पर क्या हुआ था?

रमेश के हाथ स्टीयरिंग पर कस गए। उसने तुरंत नज़र हटा ली।
क्या मतलब?

एक एक्सीडेंट… रात का टाइम… ब्रेक फेल… यात्री ने धीमे-धीमे कहा।

बस के अंदर अचानक सन्नाटा और गहरा हो गया। बाहर बिजली कड़की।

रमेश का गला सूख गया। पाँच साल पहले सच में इसी रूट पर एक हादसा हुआ था… जिसमें एक आदमी की मौत हो गई थी।

रियर व्यू मिरर में उसने फिर देखा — पर इस बार सीट खाली थी।

बस में अब सिर्फ वो था… या शायद नहीं।

रमेश ने घबराकर बस रोकी। पीछे की सीट सच में खाली थी। उसने पूरा केबिन देखा — कोई नहीं।

ये कैसे हो सकता है? वह बुदबुदाया।

तभी बस के दरवाज़े के पास खटखटाहट हुई। रमेश ने पलटकर देखा — वही आदमी बाहर खड़ा था। भीगा हुआ। बिना हिले।

दरवाज़ा अपने-आप खुल गया।

वह अंदर आया और इस बार ड्राइवर के ठीक पीछे वाली सीट पर बैठ गया।
मैंने कहा था… मेरा स्टॉप अभी नहीं आया।

रमेश का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
तुम चाहते क्या हो?

यात्री ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
बस सच सुनना चाहता हूँ… उस रात का सच।

रमेश के दिमाग में वो हादसा घूम गया। उस रात बस के ब्रेक सच में फेल नहीं हुए थे। उसने शराब पी रखी थी… और उसने सच्चाई छुपा दी थी। केस दब गया था।

तुम… कौन हो?

यात्री ने धीरे से अपनी जेब से एक पुरानी, मुड़ी हुई फोटो निकाली। उसमें वही बस थी… और सड़क पर खून से लथपथ एक आदमी।

मैं वही हूँ… जिसे तुमने कहा था — ब्रेक फेल थे।

अचानक बस की लाइट्स झपकने लगीं। स्पीडोमीटर अपने-आप 80 दिखाने लगा जबकि बस खड़ी थी।

रमेश ने मिरर में देखा —
अब पीछे की सारी सीटों पर लोग बैठे थे। चुप। भीगे हुए। और सबकी नज़रें उसी पर थीं।

और सामने सड़क पर… वही पुराना मोड़ दिखाई दे रहा था।

फिर से।

बस बिना ड्राइवर के एक्सीलेटर दबाए आगे बढ़ने लगी। रमेश ने ब्रेक पर पूरा ज़ोर लगाया, लेकिन पैडल बिल्कुल सख्त था — जैसे पाँच साल पहले था। सामने वही खतरनाक मोड़ नज़दीक आता जा रहा था।

पीछे की सीटों पर बैठे लोग अब साफ दिखाई दे रहे थे। उनके कपड़े भीगे हुए थे, चेहरों पर खामोशी और आँखों में आरोप। रमेश ने पहचानने की कोशिश की — ये वही लोग थे जो उस रात बस में बैठे थे।

ड्राइवर सीट के पीछे बैठा आख़री पैसेंजर धीरे से बोला,
इतिहास खुद को दोहराता नहीं… उसे दोहराया जाता है।

रमेश चिल्लाया, मैंने जानबूझकर नहीं किया था! वो बस एक गलती थी!

गलती? पीछे से कई आवाज़ें एक साथ गूँजीं।

अचानक बस के शीशों में दरारें पड़ने लगीं। बाहर तेज़ बारिश शुरू हो गई। स्पीडोमीटर 100 पार कर गया।

रमेश ने आँखें बंद कर लीं।
बस रोक दो… प्लीज़!

आख़री पैसेंजर खड़ा हुआ और धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा।
इस बार फैसला तुम्हारे हाथ में है।

सामने मोड़ बस कुछ ही मीटर दूर था। अचानक रमेश के सामने दो रास्ते उभरे — एक वही पुराना मोड़… और दूसरा एक अंधेरी, अनजान गली की तरफ जाता रास्ता।

सच चुनो… या फिर वही झूठ दोहराओ, आवाज़ गूँजी।

रमेश ने काँपते हाथों से स्टीयरिंग घुमाया…

और बस अंधेरी गली में मुड़ गई।

एक तेज़ झटका लगा — और सब कुछ शांत हो गया।

जब रमेश ने आँखें खोलीं, बस खामोश खड़ी थी। बाहर न बारिश थी, न कोई मोड़। बस एक सुनसान, अंधेरी गली।

पीछे की सारी सीटें खाली थीं। कोई यात्री नहीं।

क्या ये… खत्म हो गया? उसने धीमे से कहा।

तभी उसके सामने विंडशील्ड पर धुंध जमा होने लगी। उस धुंध पर खुद-ब-खुद उंगलियों के निशान उभरे… और एक शब्द लिखा गया — कबूल करो।

रमेश की सांसें तेज़ हो गईं।

आख़री पैसेंजर अचानक उसके बगल वाली सीट पर बैठा था।
तुमने रास्ता बदल दिया… लेकिन सच नहीं बदला।

रमेश की आँखों में आँसू आ गए।
मैं डर गया था… नौकरी चली जाती… जेल हो जाती…

और मेरी ज़िंदगी? यात्री की आवाज़ पहली बार भारी हो गई।

अचानक बस की हेडलाइट अपने-आप जल उठी। सामने सड़क पर एक पुलिस बैरिकेड दिखा। दो पुलिसवाले खड़े थे — जैसे किसी का इंतज़ार कर रहे हों।

ये दूसरा मौका है, आख़री पैसेंजर बोला। इस बार ब्रेक काम करेंगे… अगर तुम सच बोलोगे।

रमेश के हाथ काँप रहे थे। उसने इंजन स्टार्ट किया और धीरे-धीरे बस बैरिकेड की तरफ बढ़ाई।

उसने दरवाज़ा खोला, नीचे उतरा… और पुलिसवालों के सामने जाकर खड़ा हो गया।

पाँच साल पहले जो हादसा हुआ था… वो मेरी गलती थी, उसने कांपती आवाज़ में कहा।

अचानक उसके पीछे से आवाज़ आई —
“अब मेरा स्टॉप आ गया।”

रमेश ने पलटकर देखा —
बस खाली थी।

लेकिन इस बार… वो सच में अकेला था।

रमेश ने जैसे ही अपना जुर्म कबूल किया, पुलिसवालों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। उनमें से एक ने कहा, कौन सा हादसा? यहाँ तो पिछले पाँच साल में कोई केस दर्ज ही नहीं हुआ।

रमेश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
क्या…? लेकिन पाँच साल पहले इसी रूट पर—

इस रूट पर तो पिछले दस साल से कोई एक्सीडेंट नहीं हुआ, दूसरे पुलिसवाले ने सख्ती से कहा।

रमेश ने पीछे मुड़कर बस की तरफ देखा। बस बिल्कुल सामान्य थी। कोई टूटा शीशा नहीं, कोई पानी नहीं, कोई परछाइयाँ नहीं।

वह घबराकर वापस ड्राइवर सीट पर बैठ गया। सीट के पास उसे एक पुरानी, जली हुई फोटो मिली। वही फोटो… जिसमें सड़क पर एक लाश पड़ी थी।

लेकिन इस बार तस्वीर में जो आदमी पड़ा था… उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

वह रमेश खुद था।

तारीख नीचे लिखी थी — आज की।

उसकी सांसें रुकने लगीं। तभी पीछे से वही आवाज़ गूँजी —
हर कहानी में आख़री पैसेंजर एक ही होता है… और आज वो तुम हो।

रमेश ने मिरर में देखा। पीछे की सीट पर वही आदमी बैठा था… लेकिन अब उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था। सिर्फ एक शांत मुस्कान।

मैं लेने आया था… हिसाब बराबर करने।

बस का इंजन अपने-आप स्टार्ट हो गया। इस बार स्टीयरिंग खुद घूम रहा था।

और सामने… वही पुराना मोड़ दिखाई दे रहा था।

बस तेज़ रफ्तार से उसी मोड़ की ओर बढ़ रही थी। रमेश चिल्लाया, ब्रेक दबाए — लेकिन इस बार उसने समझ लिया था… ये रोकने के लिए नहीं था।

मोड़ के ठीक पहले सब कुछ स्लो हो गया। जैसे समय थम गया हो।

अचानक रमेश को एक झटका महसूस हुआ — और उसकी आँखें खुल गईं।

वह अस्पताल के बेड पर लेटा था। आसपास मशीनों की बीप-बीप। एक डॉक्टर कह रहा था, हादसा बहुत गंभीर था… पर ये बच गया।

रमेश को याद आया — आज रात सच में बस का एक्सीडेंट हुआ था। ब्रेक फेल नहीं थे… उसने खुद जानबूझकर स्पीड बढ़ाई थी।

क्यों?

क्योंकि पाँच साल पहले जिस आदमी की मौत हुई थी… वह दरअसल उसकी कल्पना थी। अपराधबोध ने उसके दिमाग में एक झूठी कहानी बना दी थी।

असलियत यह थी — पाँच साल पहले रमेश ने किसी को नहीं मारा था।
लेकिन आज… उसने सच में एक यात्री की जान ले ली।

दरवाज़े के पास एक नर्स खड़ी थी। उसने धीमे से कहा,
आख़िरी पैसेंजर नहीं बच पाया…

रमेश की आँखों से आँसू बहने लगे।

तभी खिड़की के शीशे में उसे अपना प्रतिबिंब दिखाई दिया…
और उसके पीछे — वही शांत मुस्कुराता हुआ आदमी।

अब सच में मेरा स्टॉप आ गया, वह फुसफुसाया।

मशीन की बीप अचानक सीधी लाइन में बदल गई।

इस बार… आख़री पैसेंजर सच में उतर चुका था।

 

 

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